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फूरुअ-ए दीन

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समाज और इस्लामिक विधान

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राजनिती-सियासी

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इस्लाम शान्ति पसन्द है

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(1) - इस्लामिक बिमा का नमूना

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अर्थ-धन

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इस्लामी चार बिषय

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इस्लाम में बैतूल माल

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पूलिस व विधान

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समाज की ख़राबी

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न्याय बिचार मगंना

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स्वाधीन

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आज़ादी तिजारत-व्यापार

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आज़ादी के साथ ख़ेति-वाड़ी करना

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आज़ादी ज़िन्दगी व आबादी

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आज़ादी व्यापार व उत्पत्ति

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आज़ादी के साथ बैठना व भ्रमण करना

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समाज में आज़ादी पद्धति के साथ राजनीति करना

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समाज

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परिष्कार

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परिवार का संगठन

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इस्लाम मानव जीवन को चलाया करता है


फूरुअ-ए दीन

फूरुअ-ए दीन में प्रवेश करने से पहले हम सब पर अवश्यक हे कि हम जान लें, जो इस्लाम के उसूल व विश्वास इंसान के फ़िक्र के साथ सम्पर्क रख़ता हे, इस लिए हमारा विश्वास व प्रमाण इज्तेहाद के साथ होना चाहीए, लेकिन फूरुअ-ए दीन का विषय इस से और अधिक हे. चीज़ में इंसानों की समस्त प्रकार ज़िन्दगी, जैसे चलना-फिरना, बैठना-उठना जन्म होने से पहले व जन्म के बाद के भी समस्त प्रकार के वक़्या उपस्थित है।
साधारण जनता के लिए संम्भब नहीं है कि उस समस्त प्रकार विषय पर ज्ञान अर्जन करे। लिहज़ा इस समय हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम जाम-ए शारायेत एक मुज्ताहिद को तक़्लीद करे।
फूरुअ-ए दीन (तथा इस्लाम के फुरु) बहुत अधिक हैं, लिहज़ा सार के तौर पर हम सब दस चीज़, जो मशहुर व प्रसिद्ध हैं ऊन में से तक़्लीद करें, उस के बाद ऊन में से कुछ विषय ऐसे है चीज़ में तफ़्सीर व तशरीह देना बहुत अवश्यक है।
1- नमाज़
2- रोज़ा
3- हज्
4- ज़कात
5- ख़ुम्स
6- जिहाद
7- अमर बिल मारुफ़ (अच्छी बातों का आदेश प्रदान करना)
8- नहीं अनिल मुनकिर (बुरी कथाएं से निषेध प्रदान करना)
9- तवल्ला (अल्लाह् रसूल और इमामों से मोहब्बत करना)
10- तबर्रा (अल्लाह् रसूल और इमामों के दुश्मनों से दुश्मनी पैदा करना)
कथा परिष्कार व रौशन होनी चाहिए कि यह गूरुत्वपूर्ण दस चीजों के व्यतीत और भी फुरुअ है जैसे ख़रीदना, बेचना, निकाह, तलाक़, क़्सास, दिआ, के सम्पर्क में इसि ग्रन्थ में (मासाएल के अध्यय में बयान किया जाए गा, लेकिन कुछ फुरुअ ऐसे है जो उस से भी मोहिम व गूरुत्व है, जो प्रत्येक दीन काम में आता है जैसे समाज और निज़ामें इस्लामी, अर्थ व्याबस्था व सियासत, सैनिक बाहिनी व इस्लाम कि मुक़र्रिरात, हकुमत और बिचार, आज़ादी व अज़ादी, परिष्कार, समाज, वगैरह सब इस भाग में सार के तौर पर बयान किया जाए गा, ईन्शा आल्लह।

समाज और इस्लामिक विधान

इस में किसी प्रकार के शक-संदेह नहीं हे कि इस्लामी शरियत मानव जीवन कि समाज और विजय के लिए एक विशेष क़ानून बनाया है। चीज़ के द्बारा इंसान सदाचर व मानवी को परिपूर्ण कर सकता है, पहले थोड़े बहुत इस्लाम के क़ानून विभिन्न इस्लामी देशों में प्रचलन था, कभी कभी इस्लाम के नमूना भी दिखाई देते थे वह भी बढ़े अश्चर्य व हैरानी के साथ।
इस्लाम-धर्म पृथ्वी के जनसाधारण व्यक्तियों के नियाज़ों को पूरा और समस्या को समाधान करने के लिए है। अगर इस्लामी राष्ट्र सठिक पद्धति से क़ानून को पृथ्वी पर प्रचलन करें तो पृथ्वी स्वर्ग (जन्नत) में परिवर्तन हो जाएगी। और इंसान के साथ सब समय शान्ति रहेगी। तो इस सूरत में इस प्रश्न का उत्तर सरल हो जाये गा. कि ए-कौन सा बिधान है? और वह कौन सा बिधान है कि चीज़ क़ानून के द्बारा समाज के जनता के लिए विजय हो? मानव जीवन में मानव एतम और इनर्ज़ि को अर्जन किया, और उसकि शक्ति इस धर्रण से बाहर निकला अपर तरफ चीज़ ज़माने में मुश्क और नौका, बायू में प्रवेश किया तो अपर तरफ यूद्ध के सितारे उस पर हाकिम रहा, किया इस्लाम समाज को परिचलना और अतीत इतिहास को वापस लाने की शक्ति रखता है? और अगर अपनी शक्ति अर्जन करता है तो किया पृथ्वी के मानव के समस्या को दूर करने के लिए शक्ति रखता है? इस तरह के समस्त प्रकार का प्रश्न का मुहताज है. जिन का उत्तर अने वाले पृष्ठ में उपस्थित है। कि किस प्रकार से इस्लाम समस्त प्रकार मानव समाज का समस्या और विभिन्न प्रकार के बह्तर से बह्तर पद्धति उपस्थित है, और किस तरह ईलाही विधान और इस्लाम के समस्त प्रकार विधान को सठिक पद्धति से राजनिती, समाजी, अर्थ व्यावस्था, पृथ्वी में इंसान के लिए प्रमाण करेगें या उस के समस्या को समाधान करेगें।

राजनिती-सियासी

इस्लाम उत्तम से उत्त्म जीवन पद्धति और अपने राष्ट्र को प्रचलन करने के लिए आज़ादी भित्ती पर उत्तम पद्धति वर्णना किया है। साधारण जनता की रक्षा करना, समाज के लिए न्याय विचार-इंसाफ़ करना। और सब प्रकार व्यक्तियों के लिए समस्त प्रकार के शान्ति और आराम क़रार दिया है। और इंसानों को जीवन बसर करने के लिए भाई-भ्रता दोस्ती का केन्द्र बनाया है। प्रत्येक प्रकार कि क़ौम के दर्मियान सब को समान अधिकार दिया है। एक क़ौम अन्य क़ौम से कोई पार्थक नहीं रख़ती. फरमाया हैः
((प्रत्येक समय सदाचार और परहेज़गारी के साथ अपर का सहायता करों, और किसी अवस्था में पापी व अत्याचारियों को सहायता न करों)) (1)
इस्लाम ने समाज की क़ौमी पूजा, और इच्छा को दूर क़रार दिया है क्योंकि इस चीज़ में कोई लाभ नहीं है।
((तुम में से सम्मानी व्यक्ति वह है जो अल्लाह के निकट परहेज़्गार हो))
पैगम्बरे अकरम (साः) व मासूमीन (अ0) अपनी हुकूमत-राश्ट्र के यूग में उत्तम जीवन बसर करने का पद्धति कि बुनयाद रखे है, और समाज को विभिन्न प्रकार कि इख़्तिलाफ़ को दूर रखे है। दुख, फ़क़ीरी, अज्ञान, और दुष्चिंता को दूर करके साधारण जनता के लिए प्रत्येक प्रकार का शान्ति बिस्तार किया है, और समस्त प्रकार की समाजी ज़िन्दगी को परहेज़गारी के साए में क़रार दिया है।
इस्लाम का अभिप्राय समाज कि समस्त प्रकार के अधिकार को रक्षा करना, प्रत्येक क़ौम के प्रत्येक व्यक्तियों को एक दायित्व है ( इस सम्पर्क फरमाया हैः कि (( तुम सब समाज में एक एक कामों को दायित्व रखते हो)) और (( अगर कोई व्यक्ति इस्लामिक समाज में सुबह करे और मुस्लमानों के कर्मों पर ध्यान न दे वह व्यक्ति मुस्लमान नहीं है)) और यही कारण है स्वाधीन व्यतीत अगर कोई कहेः(( हमारा किया अता-जाता है)) और कोई कहेः (( मैं किस काम का हूँ)) इस्लाम ने इस सब चीजों को पूरी तरीके से निषेध घोषणा किया है।

इस्लाम शान्ति पसन्द है

इस्लाम अत्याचर-ज़ूल्म-सित्म को दूर करने व एक वेरासती हुकूमत, और सल्तनती हकुमत को दूर व किनार रखने, और राष्ट्र कि तक़दीर को संम्भलने के लिए मासूमीन (अ0) व्यतीत एक कमेटी ( शुरा) का बन्दो बस्त किया है। चीज़ में समस्त प्रकार के जनता अपना समर्थन पेश कर सकता है। इस स्थान पर एक मात्र फुकहा व मराजे तक़्लीद है. जो मासूमीन (अ0) के बाद राष्ट्र प्रचलन का अधिकार क़रार पाए हैं।
अपर तरफ़ प्रत्येक इस्लामी क़ौम, अपने अपने समर्थन में अज़ाद थे और हैं, चीज़ समय तक राष्ट्र चलाने के लिए कोई एक व्यक्ति समस्त प्रकार की शराएत उस में ना पाए जाते हो, इस समय तक राष्ट्र, मराजे के रहब्री में बाक़ी रहेगी, इस सूरत में उस स्थान को सम्पूर्ण करने के लिए किसी एक को निर्वाचन करे. जो समस्त प्रकार शरायेत के मालिक हों. और उसी तरह उम्मते इस्लामी सम्पूर्ण पद्धति से अपने समर्थन में आज़ाद है एक शूरा बनाने के लिए ताकि सभ इस्लामी क़ानून के मुताविक़ इमाम ज़मान (अ0) के गैबत तक एक फुकहा अदिल व मराजा-ए तक़्लीद के द्बारा जो सम्पूर्ण पद्धति से इस्लाम के क़वानीन से वाक़िफ हो और इस्लामी समाज को क़ुरआन और मासूमीन (अ0) के सुन्नत अक़्ल व इजमा पर अधिक से अदिक ज्ञान रखता हो, जो समस्त प्रकार के निर्देश जारी कर सकता हो, और इस सूरत में अगर कोई क़ानून पास हुआ हो तो उस क़ानून को इस्लामी दायित्व कर्मोंचारों के निकट भेज दे, ताकि वह सठिक पद्धति और न्याय के साथ व आज़ाद पद्धति से जनता के लिए प्रचलन करे और जनता की शान्ति के लिए शान्तिपूर्ण विधान जारी-सारी करे।
अपर तरफ सब का अधिकार नहीं पहुंचता, कि वह किसी एक क़ानून जो क़ानून धर्मानुसार के मुताविक़ हो उस क़ानून को परिवर्तन करे, या कम बेशि करे, (क्योंकि हलाले मुहम्मदी हलाल है क़्यामत तक और हरामें मुहम्मदी हराम है क़्यामत तक)) इस्लाम में सब का काम व दायित्व महदुद है। जब तक एक हाकिम धर्मानुसारके मुताबिक़ कोई अच्छा क़ानून निर्दृष्ट न दें।
जैसे शरीयत निर्दृष्ट किया है कि तिजारत जनता के हाथ में होना चाहीए, इस स्थान पर सब का अधिकार नहीं पहुंचता कि वह इस व्यापारी को किसी राष्ट्र व्यक्ति के निकट दे, या किसी एक विशेष व्यक्ति को दे दें। लेकिन शरए ने निर्दृष्ट नहीं किया कि गाड़ी दाहने हाथ की तरफ से चले अथवा बाएं हाथ की तरफ से, इस स्थान पर मंत्रालाय परिषद अधिकार रखता है कि इस क़ानून में परिवर्तन करें।
उस के बाद शारए उत्तम क़ानून निर्दृष्ट करने के बाद इस्लामी राष्ट्र पर फ़र्ज़ है कि वह उस क़ानून को प्रचलन के लिए चेष्टा-प्रचेष्टा करे. और समस्त प्रकार कि सामान जो समाजिक और समाज के फ़िक्र कि उन्नति के लिए है उस को प्रदान करे। और जनता को शान्ति बिस्तार करने के लिए वह कानून को व्यबाहर करे, ताकि जनता उस से आज़ादी अनुभव कर सकें।

(1)- इस्लामिक बिमा का नमूना

पैग़म्बर अकरम व मासूमीन (अ0) के यूग से बिमा का क़ानून उन्नति पर है, और बड़े ध्यान के साथ उस को ततबिक़ भी किया है।
1- अगर कोई व्यक्ति पृथ्वी से जा रहा हो, कोई माल सरवत छोड़ के जा रहा हो वह समस्त प्रकार का माल समस्त शर्तों के साथ उस के वारीस को मिले गा. और उस के माल से किसी प्रकार का मालियात लिया नहीं जाए गा, पृथ्वी के बहुत सारे देशों में भी इस प्रकार का अमल सम्पादन किया जा रहा है।
2- अगर कोई व्यक़्ति मर जा रहा हो. और कोई क़र्ज़ उस पर बाक़ी हो, और उस के नारी, बच्चे, संतान वग़ैरह वि सर्प्रस्त के हो गए हो, तो ऊन के समस्त प्रकार का क़र्ज़ इस्लामी सरकार पर फ़र्ज़ है कि उस को किसी प्रकार व पद्धति से अदा करे लेकिन यह काम पृथ्वी में किसी स्थान पर किया नहीं जाता है.
3- ऊपर दो चीज़, जो बयान किया गया है, बैतुल माल (ख़ज़ाना) समाज के समस्त प्रकार इंसान के लिए है, और इसी माल से समस्त जन साधारण के क़र्ज़ को दूर करना चाहिए. इस सम्पर्क में इक़्तेसाद की अध्यय में बिस्तारीत के साथ पर्यालोचन की जाएगी । (इन शा आल्लाह).

(2)

अली इब्ने ईब्राहीम क़ुम्मी अपने तफ़्सीर में रसुल (स0) के हदीस के मध्यम प्रमाण किया हेः कि किसी भी मक़रुज़ को अपने तलब कारी या किसी दौलत या किसी वली के निकट मत ले जाओ ताकि उस के लिए प्रमाण व रौशन ना हो. मगर यह है कि साहेबे मक़रुज़ अपना क़र्ज़ छोड़ के गए हो और अपना क़र्ज़ किसी वली या मुस्लमान के दायित्व में दिया गया हो। उस सुरत में जो कुछ बैतूल माल में है तलब्कार को अपना तल्बी दे दें। (2)
इमाम जाफ़र सादिक़ (अ0) एक हदीस में फ़रमाते हैः ((यहूदियों को मुस्लमान होना नहीं था मगर यह है कि पैग़म्बर अकरम (स0) के फ़रमाईश के बाद सब इस्लाम की तरफ़ झुक गए और अपने नारी, पुरुष, संतान सब के सब इस्लामी बीमा में प्रबेश हो गए।

(3-)

शैख़ मुफ़ीद स्वींय ग्रन्थ मजालिस में इमाम जाफ़र सादिक़ (अ0) के हदीस के मध्यम प्रमाणित कि है (अगर किसी व्यक्ति का माल किसी व्यक्ति के पास था, लेकिन क़र्ज़दार उस से किसी गुनाह या किसी ऐसे काम में ख़र्च नहीं किया. और उस से मुमकिन भी नहीं है कि उस क़र्ज़ को प्रदान करे। इस सूरत में माल वाले पर फ़र्ज़ है कि उस को एक समय दे ताकि ख़ुदा वन्दे मुताल उस को तौफ़िक़ दे उस के क़र्ज़ को वह अदा कर सकें।
अगर उस समय कोई आदिल व्यक्ति राष्ट परिचलना कर रहे हो। तो उस पर फ़र्ज़ है कि उस के कर्ज़ को अदा करे) और यह निर्देश पैग़म्बर अकरम (स0) कि तरफ़ से है। आप फ़रमाते है (अगर कोई व्यक्ति मर रहे हो और स्वींय माल उस के वरेसा को है या कोई व्यक्ति धरती से जा रहा हो और अपने ऊपर क़र्ज़ हो और उसके नारी, संतान वग़ैर विसर्परस्त के हों, वह हमारे निकट आए मैं उस का क़र्ज़ अदा करुगाँ और उस के औलाद के लिए सर्परस्त बनुंगा और माल भी ऊन के इख़्तियार में क़रार दूगाँ।
एक हादीस में इमाम जाफर सादिक़ (अ) इर्शाद फरमाते हैः (इमामे मुस्लिमीन पर उस तरह फ़र्ज़ है चीज़ तरह हज़रत रसुल (स0) अपने दायित्व पर लिया था))(3)
शैख़ कुलैनी, शैख़ तूसी अपनी ग्रन्थों में इमाम जाफर सादिक़ (अ0) के हदीस के माध्यम नक़्ल करके फरमाते हैः कि इमाम ने फरमायाः हुकुमत करने वालों पर फ़र्ज़ है कि समस्त प्रकार मोमिन के क़र्ज़ को अदा करें))। (4)

(4)

शैख़ हूर्रे अमुली स्वींय ग्रन्थ वसायेलूश शिया में नक़्ल किया है किः (( एक दिन हज़रत अली (अ0) कूफ़े में किसी एक गली से प्रबेश कर रहे थे, अचानक अपकी दृष्ट मुबारक किसी एक व्यक्ति पर अकर्षण की इस सूरत में कि वह व्यक्ति भीक मागं रहा था। अप इस घटना को देख कर बहुत असंनोष्ट हुए, और चारों तरफ़ देख कर कहाः यह सब किया अबस्था है और मैं किया देख़ रहा हूँ? ((ऊन का ईशारा इस्लामिक राष्ट्र पर था कि देख भाल करने वाला कोई नहीं है)) लोगों ने अप के प्रश्न के उत्तर में कहा. वह एक नास्रानी है बृद्ध हो गया किसी काम करने की शक्ति नहीं रख़ता। और उस के निकट ऐसा कोई पैसा नहीं है कि अपनि जीवन को सठीक नियम-पद्धति से चला सकें यही कारण है कि वह भीक के द्बारा अपनि जीवन को परिचलता करता हे।
चीज़ समय अप इस उत्तर को सुना असंतोष्ट के साथ फरमायाः (( चीज़ समय वह जवान था उस से बहुत काम अर्जन किया अभी वह शक़्ति नहीं रख़ता इस कारण पर उस को अपनि हालत में छोड़ दिया है?)) उस के बाद अपने फरमायाः उस के अधिकार को बैतुल माल से अदा किया जाए, और जब तक वह जीवित है सम्मान के साथ जीवन बसर करे ))। (5)
इस हदीस में कई नूकता उपस्थित है,
समस्त प्रकार इस्लामी देशों में फक़ीर मौजूद ना हो, मगर यह है कि अली (अ0) देख़ कर अश्चर्य हो जाएं। इस्लामी राष्ट्र के ज़िम्मेदार लोगों पर फ़र्ज़ है कि वह चेष्टा करे, ताकि फ़क़ीरी को दूर करें। (ताकि जनता सठिक पद्धति के साथ जीवन बसर करें) इस हाल में कि एक फक़ीर भी ना हो. अली (अ0) उस फ़क़ीर को देख़ कर बहुत असंतोष्ट हूए और उस कि फ़क़ीरी को दूर की। जो लोग अपने काम से परित्याग हो गए हो, ऊन जनता के लिए इस्लाम सठिक पद्धति से बीमा का बन्दो बस्त किया है और वह इस सूरत में है कि जो फक़ीर हो, नाकि प्रत्येक व्यक्ति को. अगर फक़ीर ना हो. तो इस हाल में किसी भी एक ऊज़र देख़ कर उस को सेवा करे।
शैख़ कूलैनी अपनी स्वींय ग्रन्थ में हज़रत अली (अ0) का हदीस नक़्ल करके फ़रमाते हैं। चीज़ समय तल्हा व ज़ूबैर जमल यूद्ध से पराजय हो कर, अपनी सैनिक को पिछे हटाने लगे उस समय एक गर्भवती महिला रास्ते से चल रही थी, ऊन सैनिक को देख कर भय पाई और उसके पेट का बच्चा साक़ित और धरती में आने के बाद वह बच्चा हाथ पैर मारते मारते दम तोड़ दिया। उस के बाद साथ ही साथ अपना माता भी पृथ्वी से बिदाय लिया, इस हाल में कि वह दोनों लाशें रास्ते के किनारे ज़मीन पर पड़ा रहा।
उस समय हमारे मौला हज़रत अली (अ0) और ऊन के प्रिय आसहाब के द्रष्ट मुबारक उस रास्ते के किनार पड़ी हूई दो जनाज़ा पर पड़ी।
अप उस घटणा को देख कर रुक गए, और उस घटणा के सम्पर्क प्रश्न करने लगे ( ताकि सठिक पद्धति से इस का कारण मालूम हो जाए)
लोग कहने लगेः या अली (अ0), यह नारी बार्दार थी चीज़ समय तलहा व ज़ूबैर जमल यूद्ध के सैनिक पिछे हटाने लगे सैनिक के भय से उसकी मौत हो गई.
उस समय अप प्रश्न करने लगेः कौन सा माता और उसके संतान जल्दि इस पृथ्वी को परित्याग किया?
उस प्रश्न का उत्तर में कहा गयाः प्रथम बच्छे और उस बच्छे का माता.
उसी स्थान पर हज़रत अली (अ0) उस मूर्दे हूए माता और संतान के वली को बुलाया और दो सोल्स हिस्से (दिए या दिया) जो उस के फ़रज़न्द के इरस में था, और एक सोल्स माता को देकर स्वीकृती अर्जन कि, और दो सोल्स उस कि माता के अधिकार में था उस को दो हिससे में भाग कि, एक भाग उस के शौहर को दि. और अपर भाग उस के नारी कि वारिस को प्रदान कि। (जो बच्छा साक़ित हो गया था उस के भाग से दो भाग करके उस के दो वारीस को दिया गया)
उस के बाद अप, प्रत्येक को अधा अधा कर दिए, कि उसकि नारी मर्हूम को दो हिज़ार और (500) पानसो दिर्हाम थी इरस के ऊनवान से उस के नारी को दि और अधा 2500 दिर्हाम था उसके दो इरसों के दर्मियान तक़्सिम कि, इस क़िस्म के तक़्सिम मात्र इस विनापर था कि वह नारी इस बच्छे व्यतीत दितीय कोई साक़ित बच्छा नहीं रखति थी.
रावी इस घटनाएं के बाद फरमाता है. कि हज़रत अली (अ0) इन समस्त प्रकार कि दिए बसरा के बैतूल माल से प्रदान किया है।
हाँ, बैतूल माल मुस्लमान जनता कि नियाज़ को दूर करते थे, क्योंकि इस्लाम में एक मुस्लमान भाई का अधिकार दुसरे मुस्लमान भाई के लिए बर्बाद होनी नहीं चाहिए। और यही इस्लाम में समाज के जनता के लिए उत्तम पद्धति का बिमा है।