بسم الله الرحمن الرحيم

الحمد لله رب العلمين والصلاة والسلام علی اشرف الخلق اجمعين محمد و آله الطيبين الطاهرين واللعنة غلی اعدائهم اجمعين

अम्मा बादः प्रत्येक मुस्लमान के लिए आपने को एक मुस्लमान कहना काफ़ी नहीं हैं, जब तक वह इस्लाम के समस्त प्रकार अच्छे और उत्तम विधानों से अच्छी तरह वाक़िफ़ न हो, और उस के मुताबिक़ अमल न करें। क्योंकि समस्त प्रकार मुस्लमानों पर दायित्व है कि इस्लाम के समस्त प्रकार विधान से वाक़िफ़ होना और आपने को विजय के लिए उस विधान पर अमल करना। (समस्त प्रकार मुस्लमान पर दायित्व है) उस के बाद अपनी फ़िक्र वसूल व यक़ीन पर मज़बूत अटल रहना, ताकि आपने को पृथ्वी में एक मुस्लमान प्रमाण करके एक विजयी ज़िन्दगी और इसके साथ साथ आख़ेरत की ज़िन्दगी में एक विजयी दिलाएं ताकि स्वर्ग मिल सके।
और इस वजह से समस्त प्रकार मुस्लमानों पर दायित्व है कि इस्लाम की समस्त प्रकार वसूल व यक़ीन अक़ीदा व विश्वास, और उत्तम बिधानें को अर्जन के बाद अपना यक़िनों को सठीक करना और उस बिधानें पर अमल करना ज़रुरी है।
जो व्यक्ति पवित्र इस्लाम के यक़ीन पर ईमान लाया और साथ साथ उसके जूयीयात पर अमल किया और आपने को इस्लाम के अदाब व अख़लाक़ की सून्दर पद्धति से सजाया वह पृथ्वी और स्वर्ग में विजयी होगा।


प्रथम अध्याय

उसूल व अक़ाइद इस्लाम का सूची पत्र या (फिहरिस्त)
पवित्र इस्लाम धर्म में पाँच मौलिक विषय है जिस को उसूले दीन कहा जाता है। (1)
1- तौहीद
2- अद्ल
3- नबूवत
4- इमामत
5- क़यामत

1- तौहीद

तौहीद के सम्पूर्ण व परिपूर्ण प्रसंसा यह है किः इंसान को जान लेना चाहीए, कि ख़ूदा वन्दे आलम इस पृथ्वी को सृष्ट किया है. और इस पृथ्वी को अनुपस्थित से उपस्थित में लाया है। और उस पृथ्वी को समस्त प्रकार के निर्देश उस अल्लाह के हाथ में है, रुज़ी, ज़िन्दगी, मौत देना, सही व सालिम रख़ना, व्याधि वगैरह.... उस के हाथ में है। कभी उसके इरादे और इख़तियार में ख़ल्ल वाक़े नहीं होता। ..... इस पृथ्वी के समस्त प्रकार मख़लूक़ पर चाहे वह छोटे हो या बढ़े (समस्त प्रकार मख़लूक़ पर) निर्देशन करता है और अक़्ल भी यही कहती है, कि पृथ्वी को उपस्थित में लाने वाला ख़ूदा वन्दे आलम है. जो हाकिम व आलिम है। और इस सम्पर्क क़ुरआन में अधिक से अधिक आयतें उपस्थित है जो इंसानों के अक़्ल की ताईद करती है।
हाँ, यह सब प्रमाण पर्वरदिगार की अज़मत का पहचान है, और हम सब अपनी अक़्ल व गुणावली के बुनयाद पर यक़ीन करते है (कि वह अल्लाह इस पृथ्वी को वजूद में लाया है) हम सब को चाहिए उनका पैरुवी करे, उस से सहायता मागें, उस पर यक़ीन करें।

सिफाते जमाल व कमाले ख़ुदा

ख़ुदा वन्दे आलम एक व एकताई है और समस्त की समस्त अच्छी गुणावली उस के भीतर उपस्थित है, उदाहरणः
ज्ञानः ज्ञान का अर्थ है, कि अल्लाह समस्त जहान के मख्लूक़ को चाहे वह बड़ा हो या छोटा या कहीं भी हो हत्ता इंसानों के दिलों में वह उस चीज़ को भी ज्ञान रख़ता है।
शक्तिः शक्ति का अर्थ हैं, कि वह समस्त चीजों पर शक्ति रख़ता हैः पृथ्वी को ख़ल्क करना, रुज़ी, मौत दिलाना और ज़िन्दा करना उस कि ताक़त की उदाहरण हैं. और समस्त मख्लूक़ को वजूद में लाया है।
हायातः उसकी ज़िन्दगी सब समय से है और सब समय रहेगी, और यह संभव नहीं है कि गैर हयात के कोई भी चीज़ ज़िन्दगी का मज़ा चाखे. उसके ज्ञान व क़ुदरत उसकी हयात के साथ है और शक्ति व क़ुदरत के बगैर हयात के कोई अर्थ नहीं रख़ता. और क़ाबिले क़बूल भी नहीं है।
चाह- ईरादाः अल्लाह के लिए किसी चीज़ को चाहना व ईरादा करने का प्रमाण यह हैं की वह समस्त कामों में मजबूर नहीं है, वह एक फ़ूल के उदाहरण नहीं है की वगैर ईख़तियार व ईरादह के ख़ूश्बु दें।
ईद्राकः यानी वह समस्त चीजों को दिख़ता और प्रत्येक शब्दों को सूनता है, चाहे वह शब्द अहिस्ता क्यों न हो।
क़दीमः वह सब समय से है और सब समय रहेगा क्योंकि यह पृथ्वी वजूद में नहीं थी लेकिन वह वजूद में लाया, हदस व इस्तेक़लाल नहीं थी, लेकिन हर हदस व इस्तेक़लाल आपरों के नियाज़मन्द है, और हर वजुदे ज़िन्दगी अल्लाह से सम्पर्क रख़ता है, और यही वजह है कि समस्त वजुदे ज़िन्दगी अल्लाह के मोहताज है, वह क़दीम है हमेंशा से है और हमेंशा रहेगा।
तकल्लूमः यानी किसी चीज़ में शब्द पैदा करना, औरं जिस समय व जिस पाक व ख़ालिस बान्दों में चाहे, पैग़म्बरे या फरिश्ते से बात करता है यानी अवाज़ को पैदा करता है।
सादिक़ः जो कुछ वह फरमाता हैः वह सच-मूच और सही होता हैं. और किसी समय आपने वादे की ख़िलाफ़ वर्ज़ि नहीं करता, किसी चीज़ को पैदा करना, रुज़ी देना, वजूद में लाना, किसी को क्षमा करना-माफ़ करना, करीम, व मेंहैरबान........है।

सिफ़ाते जलाले ख़ुदा

ख़ुदा हमेंशा से है और हमेंशा रहेगा वह समस्त नुक़्स व ऐब से पाक व पवित्र है। प्रत्येक कम व बेशि से दूर है, वह उपस्थित जैसी उपस्थित नहीं है कि शरीर का मोह्ताज हो या विभिन्न प्रकार किसी आज ज़ा से पैदा नहीं है कि किसी स्थान को पुर करे या क़ाबिले लम्स या दिख़ाई देता हो वह न पृथ्वी में दिख़ाई देगा और न आख़ेरत में।
वह कोई उपस्थित चीज़ नहीं है की क़ाबिले परिवर्तन या परिवर्धन हो, और उस में कोई मद्दि शैई प्रवेश कर नहीं सकती, और यही वजह है की वह व्याधि में नहीं पढ़ता, उस को भूक नहीं लग्ती, निन्द नहीं अती, अल्लाह पर बूढ़ापे व जवानी का कोई प्रभाब नहीं होता।
वह ला-शरीक है यानी उस का कोई शरीक नहीं है, बल्कि वह एक है, जो उस के सिफ़ात है वही उस की ज़ात है, वह हमारे जैसा मख़लूक़ नहीं है अल्लाह प्रत्येक चीज़ से पाक व पवित्र है। और उस को किसी चीज़ की जरुरत नहीं पड़ती और न परामर्श की ज़रुरत और न सहायता, उज़िर, न लश्कर, माल, सर्वत की ज़रुरत पड़ती है।

2- अद्ल

पर्वरदिगारे जहान अदिल है, और इंसानों के समस्त अधिकार उनके निकट संरक्षण है वह किसी के अधिकर को नष्ट नहीं करता, और न किसी एक को बगैर कारण के पार्थक करता हैं।
सार के तौर पर कहा जाएं ख़ुदा वन्दे आलम समस्त जाहानों पर अद्ल के माध्यम हुक़ूमत करता है (वह किसी के उपर अत्याचर नहीं करता)।
अद्ल के लिए प्रथम शर्त हैं कि उदाहरण के तौर परः किलासों में अद्ल तक़ाज़ा करता हैं कि समस्त छात्र को अद्ल के मुताबिक़ सब छत्र को नम्बंर दिया जायें, नाकि सब को बराबर नम्बंर मिल जाये।
हक़ीक़त में बिअदालती की प्रसंसा यह है की किसी को आपने हक़ से दूर करना या बचींत करना या समस्त मौजुदाते जहान अल्लाह के उपर कोई हक़ नहीं रख़ते इस का अर्थ यह हुआ कि अल्लाह की ख़लक़ में पार्थक हैं। और यह भी अदालत का नतीजा हैं. और यह काम कुर्सी व मक़ाम तलबी की पहचान हैं, हलाकिं ख़ुदा इन प्रकार के काम-काजों से दूर है, चुकिं वह आलिम व हाकिम है कोई भी काम अपनी मस्लहत के बग़ैर सम्पादन नहीं करता और जो कुछ इस पृथ्वी में उपस्थित है सब कुछ उस की मस्लहत की मुताबिक़ है। अगर हम सब उनकी मस्लहत का फैसला करना चाहे माना यह हुआ की हम सब उनकी मस्लहत से वाक़िफ़ नहीं है। उदाहरण के तौर पर जैसा की हम लोग ज्ञान रखते है कि एक डॉक्टर किसी एक व्याधि मरीज़ को दवा लिख़ा हलाकिं वह डॉक्टर व्याधि की मस्लहत के मुताबिक़ दवा लिख़ा लेकिन हम सब उन मस्लहत से वाक़िफ़ नहीं है या नहीं जानते।
एक रिवायेत में है की हज़रत मूसा (अ)-ने पर्वरदिगार से प्रर्थना कि जिस में प्रकाश के तौर पर कुछ समस्या नज़र दिखाई देता है।
आप पर वही नाज़िल हुई की तुम एक मैदान में चले जाओ और एक पानी के चशमें के कीनारे जा बैठो और उसका प्रदर्शन करते रहो।
हज़रत मूसा (आः) वहाँ गये, जाके देख़ा कि एक घुड़ा सवार ने पानी पर चलना शुरु कि और कुछ देर के बाद वहाँ से चल दिये, और आपने पैसे का थैला उस स्थान पर छोड़ कर चला आया था. एक बालक आके उस पैसे का थैला लेके चले गये. फिर एक बूढ़ा अंधा मर्द आया. चाहा वज़ू करे इस हाल में वह व्यक्ति जो आपने पैसे का थैला छोड़ कर चला गया था वह आके आपने पैसे का थैला ले-लिया, और उस बुढ़े मर्द पर शक किया, बिल अख़र नतीजे में बुड़ा नाबीना मर्द क़त्ल हो गये।
यह सब घटना देख़कर हज़रत मूसा (अ) बहुत असंतूष्ट हुए फौरान आप पर वही नाज़िल हुई, ऐं मूसा असंतूष्ट होने कि कोई बात नहीं क्योंकि वह बूढ़ा नाबीना ने घुड़ा सवार बच्चे के पिता के माल को चूरया था हालाकिं वह माल बच्चे के विरासत में था वह माल अस्ल मालिक के पास लौटा दिया गया है, और यह ना-बिना घुड़ा सवार के पिता को क़त्ल किया था, और यही कारण है कि उस को अस्ल शास्ति में पहंचा गया है।
यही है अद्ल का एक नमूना और पृथ्वी में ख़ुदा वन्दे आलम का फैसला।
लेकिन ख़ुदा वन्दे आलम का फैसला सब इंसानों के लिए क़यामत में ज़ाहिर होगा।

3- नबूवत

इस अध्याय में प्रवेश करने के पहले एक नुक़्ता व विषय कहना ज़रुरी हैं और वह यह है कि इंसानों को खल्क़ करने का फ़लसफा क्या है? किया इंसान फक़त उपस्थित चीज़ और पृथ्वी के लज़्ज़त के लिए खल्क़ हुआ हैं या बितौरे कुल्ली किसी उद्देश्व के लिए खल्क़ हुआ हैं?
जैसा की इस्लाम के अतीत इतिहास में आयत और रिवायेत के माध्यम मालूम होता हैं कि इंसानों को विभिन्न उद्देश्व के लिए अल्लाह ने खल्क़ किया है, और अल्लाह का आख़री उद्देश्व यह है की इंसानों को खल्क़ करना ताकि इंसान तर्तबियत के साये में ज़िन्दगी गूज़ारे कुरआन मजीद में ईर्शाद होता हैः

وما خلقت الجن والانس الا ليعبدون

((मैं ने इंसानों और जिनों को खल्क़ नहीं किया मगर यह हैं की वह सब मेंरी इबादत करे)) (2)
हक़ीक़त में बन्दगी की तारीफ़ यह हैः कि इंसान आपने को सही तरीके से पर्वरिश व सही उद्देश्व पर पहूच जाएं और यही प्रत्येक इबादत का उद्देश्व है, कि इंसान उन्नति करे और आपने को इंसान बनाए. अल्लाह के परीक्षा की बुनयाद इस चीज़ पर हैः (ख़ुदा वन्दे आलम ने जीवन व मौत को खल्क़ की है ताकि आप जैसे इंसानों की परीक्षा करे कि तुम में से कौन नेक काम करने वाला है))। (3)
वह ख़ुदा वन्दे आलम जो अतीत यूग वालों के लिए तुम को धरण पर जान्शीन क़रार दिया और तुम में से कुछ को कुछ लोगों पर बर्तरी क़रार दी ताकि तुम को जो चीज़ प्रदान किया है उस चीज़ से तुम को परीक्षा कर सके))। (4)
एक विषय की तरफ़ ध्यान देना बहुत अबश्यक है। और वह यह है कि इंसानों का परीक्षा अल्लाह व उस के अक़ेबत के सम्पर्क ला इल्म होने के कारण से नहीं है. बल्कि परीक्षा एक अमल का प्रभाब है ताकि इंसान आपने अन्दर शक्ति पैदा करे. और यह परीक्षा का उद्देश्व मात्र इंसान आपने कामों में शक्ति पैदा कर सके इस बिनापर परीक्षा का शब्द बार बार ज़ोर क़रार पाया है. हक़ीक़त में परीक्षा एक माध्यम है। कि जिस के माध्यम से इंसान किसी एक चीज़ में ज्ञानार्ज़न कर सके और इस्के वसीला से आपने सही अधिकार यानी आपने सवाब व अज़ाब जो अल्लाह की विचार मन्त्रालाय में बिचार होने वाला है उस चीज़ का बिचार जो आपने पृथ्वी में सम्पादन की है उस अमल को तुमहारे हवाले कर सके।
मुख़्तसर कथन यह है कि इंसान इस अमल की वजह से आपने असल उद्देश्व तक पहुचता है और आपने अमल के लिए ज्ञान पैदा करता हैं, लेकिन इस असल के लिए भविर्षत में एक राहनुमा और नेता की आएंश्यकता है।

पथ प्रदर्शक कौन है?

आया इंसान के लिए संभव है की अपनी अक़्ल के माध्यम आपने अपनी समस्त प्रकार चीजों या कामों को शेष तक पुहचाए, और समस्त प्रकार सही व ग़ैर सही को पैहचान कर आपने लाभ व नूकसान को सही तरीके से अर्जन कर सकें?
समस्त प्रकार मुसल्मान इस प्रश्न का उत्तर में ना देगें। क्योंकि अक़्ल के निकट इतनी शक्ति नहीं है कि ख़ुद आपने को एक रहनूमा क़रार दे, बल्कि अक़्ल के लिए भी एक रहनूमा-नेता की भी ज़रुरत है। क्योंकि संभव है यही अक़्ल कभी अ-साधारण आचरण की तरफ झुक जाये, और सही रास्ते से पथ भ्रष्ट की तरफ़ चले जायें। हज़रत अली (अ) ने फरमायाः कि अम्बिंयाकों भेजने का उद्देश्व यही है की इंसान की अक़्ल को पर्वरिश दें, उस के बाद फरमायाः (( ख़ोई हुई फिक़्र व गुम हुई फ़िक्र को प्रकाश करके उस अक़्ल को कामों में लागाए))
क्या इंसानों का बानाया हुआ विधान व अएडियाल, एक व्यक्ति और एक समाज के सही तर्बियात के लिए उपयुक्त हैं?
समाज को सही के लिए बर्षों की बर्षों विभिन्न आलिम के तरफ़ से विभिन्न प्रश्न व परामर्श अती रहती है। लेकिन विभिन्न मतभेद के साथ, और यह मतभेद इस हद तक पहची है कि इंसान की अक़्ल हैरान हो गई और इंसान की अक़्ल के लिए संभव भी नहीं है कि अपनी विजयी राज़ को अर्जन कर सकें। और कोई इतमिनान बख़्श थीउरी भी नहीं हत्ता कोई क़ानून इंसानों को सही रास्ता के लिए ज़ामिन नहीं लेती।
लेकिन आसमानी सूचीपत्र व मक्तबे आम्बिंया शुरु से लेकर शेष तक प्रत्येक प्रकार के अ-प्रकाश व नाज़ुक क़ानून को जानता है। बिल ख़ूछुछ इंसानों के प्रत्येक स्थान व प्रत्येक व्यक्ति से अच्छी तरह जानते हैं। और इस मक्तबे आम्बिंया के क़ानून में किसी प्रकार की भूल का कोई अबकाश पाया नहीं जाता। और यही कारण है कि मक्तबे आम्बिंया की बहूत सख़्त ज़रुरत है।

पैग़म्बरे कौन और उनकी पेहचान का निदर्शन क्या है?

पैग़म्बरे एक इंसान के उदाहरण जैसे नहीं हैं लेकिन उन में इंसान का कोई दख़ल भी नहीं, लेकिन उन के निकट यह शक्ति भी है. कि फरिश्ते के वहीके माध्यम अल्लाह से एक गंम्भीर सम्पर्क बर्क़रार करे और अल्लाह की विधान को इंसानों तक पहुचा सकें।
सही पैग़म्बरे का पहचान ने का तरीका और झूटी पैग़म्बरे का एलामत इबारत यह हैः
1- वह समस्त प्रकार काम जो इंसानों की शक्ति और क़ूर्दत के बाहर है।
2- समस्त प्रकार क़राइन व प्रमाण को एकत्रीत करना इस से पहले कि उस का अतीत जीवन सम्पर्क उदाहरणः चरित्र, रवानी, रफ़तारी, गूफ़तारी, समाज की ज़िन्दगी, अक़्ल, व ज्ञान किसी की सल्तनत में अर्जन किया है कि नहीं, इन समस्त प्रकार चीजों को पर्या लोचन करना......।
(अगर ज्ञान किसी के निकट से अर्जन किया है उसका अर्थ है कि वह कोई नबी व अम्बिंया नहीं है बल्कि झूटा दावा कर रहा है))।
3- पहले वाले आम्बिंया बाद वाले आम्बिंया के लिए ख़ुश ख़बरी देते है और प्रमाण के लिए समस्त प्रकार प्रमाण-दलाएल बयान करके जाते है।

पैग़म्बरे ईलाही दो प्रकार है

1- ग़ैरे उलुल अज़म वह है जो लोग़ मात्र तबलीग़ करते है, और उन लोगों के लिए कोई आसमानी पूस्तक नहीं है।
2- उलुल अज़मः वह लोग है जिन लोगों को अल्लाह ने दीनि व आसमानी ग्रंथ प्रदान किया है. और इस्लाम को प्रचार किया है, और यह पाँच अज़ीम व्यक्तित्व हैं जिन लोगों को अल्लाह ने प्रत्येक नबी (अ) को विशेष विशेष स्थान व अल्लाह के निर्देश को इंसानों तक पहुचाना और उन इंसानों को पथ प्रदर्शन करने के लिए पश्चिम ता पौरब दायित्व पर थे, जिन लोगों का नाम तर्तीब के साथ बयान हो रहा हैः
1- हज़रत नूह (अ)
2- हज़रत इब्राहीम (अ)
3- हज़रत मूसा (अ)
4- हज़रत ईसा (अ)
5- हज़रत मुहम्मद (स0) जिन के उपर नबूवत (समाप्त घोषणा हो चुकी है) और अम्बिंया ईलाही की मोहर समस्त हो चूकी है, और आप आख़री पैग़म्बार ईलाही है।
आप पर इस्लाम -धर्म की समस्त प्रकार क़वानीन परिपूर्ण हो चूका है. और यह इस्लाम इंसानो के समस्त प्रकार नियाज़ को दूर करेगें, चाहे जिस यूग में क्यों न हो, यह आख़री शरीयत है, और अल्लाह ने दूसरी शरीयत को मनसूख़ किया है। और अपर शरीयत की अनुशरण करने के लिए निर्देश नहीं दिया है।
(( अगर कोई व्यक्ति इस्लाम धर्म के व्यतीत किसी अपर धर्म को क़बूल करे, वह धर्म क़बूल करने के उपयुक्त नहीं है, और वह आखेरत में घाटा उठायेगा))। (5)

पैग़म्बरे गिरामी (स0)

पैग़म्बरे अकरम (स0) की मशहूर व मारुफ़-प्रसिद्ध रुहानी जीवन के सम्पर्क में सार के तौर आपकी मौति वाली जीवन और ज़िन्दगी के सम्पर्क इस अध्याय में कुछ बयान करुँ।
आपके पवित्र नाम मूहम्मद (स0) जिस का शब्दार्थ यह है कि प्रसंसा व पछन्दिदा, आप के सम्मानी पिता अब्दुल्लाह और सम्मनिता माता जो फ़ज़ीलत की मालिका थी, आमिना बिन्ते वहाब। राह्मातूल लील् अलामीन रोज़े जुमआ सुबह सादिक़ से पहले 17 रबिउल अव्वल साले अमले फ़िल नोशिरवान अदिल के यूग में पृथ्वी में क़दम रख़ा। और 27 रजब साले 610 मिलादी 40 साल की पवित्र उम्र में अल्लाह की तरफ़ से रिसालत के मालिक हूए. प्रथम बार जिब्राईल आमीन आल्लाह की तरफ़ से सूरा अल्क़ की 5 आयत लेकर आप पर नाज़िल हूए, जिस में इर्शाद होता हैं किः
पैग़म्बरे तुम आपने पर्वरदिगार का नाम याद करो, जिस ने इंसान को जमा हुआ रक्त से पैदा किया, शुरू करो तुमहारे परवर्दिगार के नाम जो बडा़ करीम है. जिस ने इंसान को क़ल्म के माध्यम लिख़ना व पड़ना सिख़ाया जिस सम्पर्क में इंसान किसी प्रकार का ज्ञान नहीं रखता था .....। (6)
दुश्मनों के सख़्त दुश्मनी व विभिन्न प्रकार के बाधा होने के बावजूद आल्लाह के निर्देशों को लोगों तक पहुचाना शुरू किया और कुछ दिनों के बाद अल्लाह की तरफ़ से वही नाज़िल हुई, पैग़म्बरे सब से पहले आप आपने निकटतम रिश्तेदारों को भय प्रदर्शन करो। (7) फिर दीन इस्लाम की तब्लीग़ करने के लिए जन साधारण को आमंत्रन का पैग़ाम भेज़ो।
((.... पैग़म्बरे (साः) ने जिस चीज़ का तुम को प्रचार करने का निर्देश दिया गया हैं उस को प्रचार करो और मुशरीक़िनियों से भय व परवा न करो मैं तुम को दुश्मनों के शर से संरक्षण करुगाँ। (8)
पैग़म्बरे अकरम (स0) अल्लाह के समस्त प्रकार निर्देशों को पहचाने के लिए मसजिदुल हराम और शहर के समस्त प्रकार जनसाधारण मर्कज़ में सून्दर कलेमा साथ तब्लीग़ करना शुरू क्या

بسم الله الرحمن الرحيم

قولوا لااله الا الله تفلحوا

तौहीद की शब्द ध्वनी की, और सर सख्त दुश्मन का मुख़ालिफ़ में आगये और विभिन्न प्रकार मज़ाक़ में गिरफ़तार हो गये. (इतना आपको कष्ट पहँचाया) कि आपने फरमायाः (( हमारे जैसा कोई पैग़म्बरे नहीं हैं कि कष्ट भोगा हो))।

प्रथम मूमिन व मूमिना

समस्त प्रकार अतीत इतिहास लिख़ने वालों का एकत्रित दृष्ट है कि प्रथम ईमान लाने वाले और पैग़म्बरे अकरम (स0) के इस्लाम को अमंत्रन ग्रहण करने वाले बहादुर व्यक्ति हज़रत अली (अ) है। और नारींयों में प्रथम ईमान लानी वाली पाक व पवित्रा नारी बावफ़ा बीबी हज़रत ख़ादीजतूल कुब्रा (सालाः). सिपासः बहूत कम हि लोग थें कि आपकी आस्मानी अमंत्रन व इस्लाम को दिल व जान से ग्रहण किया था, लेकिन इसके बावजूद, कष्ट, अर्थव्यबस्था का मुहासिरह करना और मुशरिकीन समाज की तरफ़ से आप लोगों पर दबाउ सृष्ट करना वगैरह......।

मदीने की हिज़रत

आपकी तेरह साल की बेसात, मक्के के काफिर व मुशरेकीन लोगों ने नीयत किया था कि आप को इस शहर से बाहर किया जाए, यही कारण था कि आपके उपर इतना अत्याचर व सितम डाया गया, आख़िर में अल्लाह की तरफ़ से पैग़ाम पहुचा, आप मक्के को परित्याग़ करके मदीना की तरफ़ हिज़रत करे। और यह हिज़रत मुस्लमानों के लिए एक पुर बर्कत व पुर रहमत में परिवर्तन हो गया था. कि समस्त प्रकार आने वाली घटनाओं को इसी हिजरी साल में नाम रख़ा गया था।
और मदीना के मुस्लमानों में अधिक से अधिक होने लगा, और इस्लामी राष्ट्र और शक्ति में बेशि होने लगी, इस्लाम की सम्मान दीन वा दीन बड़ती गई, हत्ता पृथ्वी के समस्त प्रकार समाज और तमद्दुन इस्लाम के तमद्दुन में परिवर्तन हो गया.
पैग़म्बरे अकरम (स0) मदीना की ज़िन्दगी में, मुशरिकीन, यहूदी, मसीह और उन लोगों के सहायता करने वालों ने मुस्लमानों पर चड़ाई करके चेष्टा की, कि किसी प्रकार से इस्लाम व तौहीद को अनुशरण करने वालो को निस्त व नाबूद किया जाए। इन समस्त प्रकार झगड़ों चाहे यह छोटी हो या बड़ी रसूल (स0) के साथ थे, लेकिन रसूल (स0) इन समस्त प्रकार झगड़ा, यानी शिर्क व अधर्म को बाहर करने के लिए सब समय काफ़िर के सम्मूख़ीन थे, हज़रत अली (अ) फ़रमाते हैः (किसी युद्ध में कोई व्यक्ति रसूल (स0) के सामने अने का शक्ति नहीं दिखाई,)) हालाकिं रसूल (स0) के सदाचार व्यबाहर सब समय सुल्ह व शान्ति के लिए था और बा अख़लाक़, नरमी, मेंहैरबान, व क्षमा के साथ.... उन लोगों के साथ सदाचार करते थें)) (( और लोगों ने इस सदाचार को बुरे कर्मो में लगाया)) इस कारण की वजह से हर दो तरफ़ बहुत सारे लोगं क़त्ल, और 80 बार मुसललहाने के मुक़ाबिल, एक हज़ार चार सो जनसाधारण व्यक्ति ने चड़ाउ की जीस में अक्सर लोग मृत के घाट उतार गये।

दीन व दुनिया के नेता

पैग़म्बरे अकरम (स0) मदीना की ज़िन्दगी में, अल्लाह के वही और क़ुरआन के विधान मुताबिक़ दीन व दुनिया के समस्त प्रकार के कार्य-काम करते रहे, कि किसतरह बड़े छोटे के साथ, पिता अपनी संतान के साथ, संतान आपने पिता के साथ, बीबी आपने शौहर के साथ, शौहर आपने बीबी के साथ, प्रतिवासी आपने प्रतिवासी के साथ, एक हाकिम जनसाधारण के साथ, जनसाधारण एक हाकिम के साथ, मुस्लमान अपर सम्प्रदाय के लोगों के साथ सदाचार करे। बिचार कानून, समाज को कैसे चलाया जाए, राजनिती, इक्तेसाद, इबादत, वन्दगी, यह सब कामों का नियम-पद्धती सब अल्लाह के वही के मुताबिक़ लोगों के दर्मियान बयान फ़रमाते थें।
आप का पवित्र जीवन कि उपस्थित और सूचीपत्र ईलाही अपरों के लिए कोई कष्ट का कारण नहीं था, और आप सब समय अल्लाह के निर्देशनुसार से भाई चारा की ध्वनी बुलन्द करते थें, और क़ौम अनुशरण और उसकी परिस्तिश को समाप्त करते थें, वह धोका, ज़न्जीर कै़दी का जीवन बस्र करना और अज्ञानों वाली जीवन को समाप्त करके मानव जीवन के लिए एक स्वाधिन का पूरष्कार पेश किया है। वह एक पथ प्रदर्शक और दीन व दुनिया के लिए एक नेता और धर्मगुरु व निरपेक्षता व्यक्ति थें। और एक मज़हरे रह्मतूल लिल आलामीन थें, इस्लाम न्याय क़ायेम करना, अत्व्याचारी के अत्याचार को विरत करना, अपरों को अच्छा परामर्श देना, नसीहत करना, क्षमा करना, यह सब आपके भीतर मौजूद थी, और न किसी प्रकार का प्रतिशोध लेना और ना बुग्ज़ व हस्द आपके अन्दर उपस्थित थी। वह बख़शिश का एक नमूना था, और पृथ्वी में एक इस्लामी नेता थें, सब समय आप अपरों कों बड़ा समझते थें, आपने ख़ूर्मा और पानी के माध्यम जीवन बस्र किया, और माँस व गन्दुम अपरों को प्रदान किया, सूती का मोटा कपड़ा ख़ुद परीधान किया और नरम व नाजुक मख़मल का कपड़ा दूसरों को प्रदान किया। आपकी सदाचार एक दूसरों के साथ समान था, हत्ता बैठने का स्थान में भी, आपकी दृष्ट मुबारक सब के लिए समान थी।

आख़री हज और उस के बाद की घटना

सिपासः विधान के लिहाज़ से इस्लाम परिपूर्ण व समाप्त हुआ, रसूले ग़ेरामी हूज्जतूल विदा में हज्ज के समस्त प्रकार बिधान को मुस्लमानों के उद्देश्व तालीम दी, जिस समय आप आख़री हज करके वापस आरहे थें ग़दीरे ख़ुम के मैदान में हज़रत अली (अ) को अपना जानशीन निर्वाचन करके अपना हिदायेत को बर्क़रार रख़ा आयाते मुबारक नाज़िल हूईः

اليوم اکملت لکم دينکم واتممت عليکم نعمتي ورضيت لکم الاسلام ديناً

((आज के दीन तुम सब के लिए तुमहारे दीन को परिपूर्ण क़रार दिया हूँ। और आपनी तेअमत को तुमहारे उपर समाप्त घोषणा की, और दीन इस्लाम को तुम सब के लिए पछन्द व भक्ति क़रार दिया हूँ। (9) ))
ग़दीरे ख़ुम की घटना बेशि दीन अतीत नहीं हो पाया कि नबी करीम (स0) की पवित्र देह मुबारक पर व्याधि का प्रभाब शुरु हुआ और बिस्तरे मरीज़ में मश्गूल होगए. घन्टे की घन्टे आपकी मरीज़ी की सिद्दत बड़ती गई नतीजे में अल्लाह का भेजा हुआ रसूल पवित्र देह मुबारक लेकर ग्यारह हिजरी 28 सफ़र सोमवार को पृथ्वी को परित्याग करके अल्लाह से मुलाक़त की। और आपकी वसियत व निर्देश मुताबिक़ हज़रत अली (अ) पवित्र देह मुबारक को गुस्ल व कफ़न देकर नामाज़े जानाज़ा पड़ी।
सिपासः पैग़म्बरे (स0) की सब दोस्त व बन्धू दल व दल बनकर आपके पवित्र व मुबारक देह पर नमाज़ पड़ते रहें. हत्ता शनिवार तक इस तरह चलती रहि लेकिन पवित्र देह उसि कमरे में पड़ा रहा आख़िर में मदीना मनौवरह में हज़रत अली (अ) आपने हाथ मुबारक से आप को दफ़न किया। (10)
पैग़म्बरे ग़ेरामी हज़रत मुहम्मद (स0) आपने पवित्र ज़िन्दगी में कमाल का एक मज़हर थें उदाहरणः अमानतदारी, इख़लास, दोस्ती, सदाचार, ज्ञान, बूर्दबारी, क्षमा, बख़शिश, शूजाअत, परहेज़गारी, फज़ीलत व रादमर्दि, इफ्फ़ात व पाकदामन, अद्ल, ख़ूज़ु व ख़ूशु, जिहाद, और समस्त प्रकार कामों को अंजाम देने में एक वेनज़ीर थे.......आप देख़ने में भी चाँद दिखाई देते थें, और आसमान के तारा जैसे चमकते थें, ख़ूलासा यह हुआ की आख़री पैग़म्बरे (स0) में समस्त प्रकार सदाचार गुणावली उपस्थित थें आपके जैसा कोई उदाहरण नहीं था और न अएगा, ग्रन्थों में से आपकी अच्छी ग्रंथ थी, धर्मों में से अच्छा धर्म था, ((बातिल इस ग्रंथ में प्रवेश कर नहीं सकता और न करेगा क्योंकि यह अल्लाह की तरफ़ से नाज़िल हुआ है)) (11)

प्रत्येक यूग के लिए क़ूरआन मुज़ेज़ा है ((पैग़म्बरे अकरम साः के लिए))

पाक-पवित्र क़ुरआन मजीद पैग़म्बरे अकरम (स0) के लिए प्रमाण और प्रत्येक यूग के लिए अश्चर्च मोज़ेज़ा है। इस क़ुरआन मजीद में मानव जीवन के लिए समस्त प्रकार ज़िन्दगी की बिधानें उपस्थित (मौजूद) है। जो बीस साल में विभिन्न प्रकार मूनासिबात और विभिन्न घटना पर नाज़िल हूई है. बिसात से लेकर हिज़रत की यूग तक जो आयतें नाज़िल हूई है उन समस्त प्रकार आयातों को मक्कि कहा जाता हैं। और हिज़रत की यूग से लेकर आपकी मौत तक जो आयतें मदीना या उसके चारों तरफ़ नाज़िल हूई है उस को मदीना कहा जाता है।
सिपासः पैग़म्बरे अकरम (स0) की पवित्र निदेश और उनकी देख़ भाल के माध्यम से पवित्र क़ुरआन को एकत्रीत किया गया था. उसी प्रकार से कूरआन अभी तक चलता हुआ आरहा है (जिस में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं आया)।
हाँ, हाज़ारों साल पहले इंसान का बना हुआ ख़ूदा और बनी हुई राष्ट्र, अज्ञानों यूग में बुत की अनुशरण. हिजाज़ की बूत पूजारी, और विभिन्न प्रकार कौमों की पथ भ्रष्ट फ़िक्रे, और नस्ल, रगं और जात-पात की इख़्तिलाफ़ इस हद तक बड़ गई थी, कि एक बेगूनाह जीवित पूत्री को जिन्दा गूर -दफन करता था और सब आपने को गौरब व फख़्र अनुभव करता था। यह सब हलचल मची हूई इन समस्त प्रकार शरायेत के साथ एक अल्लाह के शूजाअत व बहादुर बन्दा, और अल्लाह का भेजा हुआ रसूल इन समस्त प्रकार पथ भ्रष्ट और गुमराही को दूर करके अल्लाह के निदेश और उनके निदेश को प्रचार करने में सफलता अर्जन की। और मूरदे हूए क़ौम के अन्दर एक रुह फूक दी. जेहल व अंधेरों को ईमानी हिदायेत व ईमानी मशअल के माध्यम उस को निस्त व नबूद करके जाहिलियत को हिदायेत में, और बिदअत को अल्लाह के निदेश में इन समस्त प्रकार भ्रष्ट आचरण को एक भक्ति व विजयी में परिबर्तण करने में सफलता अर्जन की।
हाँ, रसूल व क़ुरआन मजीद की समस्त प्रकार के समस्त विधान क़यामत तक जीवित रहेगा, और क़ुरआन रसूल के लिए एक गवाह व हक़्क़ानीयात है. की लोगों के लिए दीन व दूनियावी की सफलता दिलाने के लिए नाज़िल हूआ है।

कूरआन की फ़साहत व बलाग़त

अल्लाह के पवित्र कूरआन मजीद, और प्रसिद्ध ग्रंथ एक ज्ञान व हुनर, फ़िक्री व अक़ली, मददी व मानबी के व्यतीत एक आसमानी मोज़ेज़ा भी है, क्योंकी कूरआन मजीद बूलन्द ध्वनी के साथ जनसाधारण को अमंत्रन किया है. कि हमारे उदाहरण एक पवित्र कूरआन को ले आएं, इस का कारण यह है की अरब के लोग एक विशेष लतीफ़ बयान में जौक़ व शौक़ रख़ते थे, और उन लोगों के ज़बान की फ़साहत व बलाग़त एक विशेष स्थान व उन्नती पर थी. लेकिन इस के बावजूद कूरआन के सम्मुख़ और उस का उत्तर लाने में कोई शक्ति नहीं रख़ता था, अगर वह लोग कूरआन की विरुद्ध में कोई शक्ति रख़ता यक़ीनन युद्ध के मैदाने में प्रवेश करता। और विसात व कूरआन के प्रकाश के यूग तक, इस का विरुद्ध करता, क्योंकि ख़ूद कूरआन मजीद आपनी विरुद्ध दल को उसी तरह एक प्रसिद्ध और ग्रंथ लाने के लिए दवत की है ताकि हमारे जैसा एक प्रसिद्ध ग्रंथ लेके अएं। लेकिन अरब के दर्मियान समस्त प्रकार कविता कहने वालें और उस समय के अपनी ज़बान में फ़साहत व बलाग़त रख़ने वालें जो उस यूग से लेकर आज के यूग तक अरब ज़बान पर एक हल-चल मचा के रख़े है. उन लोगों ने भी क़बूल किया हैं कि कूरआन की ज़बानी और रसुल की बयानी में कोई पार्थक नहीं है। कूरआन उन सब अदबीयात और भाषा की मिठी को दफ़न कर दिया है।
अतीत इतिहास लिख़ने वालों और अरब के इतिहास लिख़ने वालों ने क़बूल करके बयान दिया हैः कि कूरआन प्रत्येक यूग के लिए मोज़ेज़ा व वेनज़ीर है। कोई उस के विरुद्ध नहीं कर सकता और सब समय और सब यूग के लिए मोज़ेज़ा है।
हाँ, कूरआन एक ऐसा प्रसिद्ध ग्रंथ है जो सब समय के लिए जीवित और इंसान को इंनसानीयत की तरफ़ उन्नती कराता है। ख़ूश वख्ति, साआदत, परित्राण को एक भीत्ति क़रार दिया है (( यक़ीनन पवित्र कूरआन इंसानों को एक ऐसा सही पथ का निर्देशना करता है जो मूस्तक़ीम और सीधा रास्ता है। और इमान्दार व्यक्तियों को खूश ख़बरी देते है. कि उन लोगों को अच्छे पूरष्कार मिलेगा)) (12) इस विनापर पवित्र कूरआन मजीद पैग़म्बरे अकरम (स0) के लिए सब समय मोज़ेज़ा और सूरज की किरण कि तरह चमकने वाला है। और अल्लाह के वही है, और अल्लाह के वही कभी ख़ामोश होने वाला नहीं है। अल्लाह का फ़रमान है ((मैं ने इस पवित्र कूरआन को नाज़िल किया हूँ और मैं उस को संरक्षण करुऊँगा))। (13)

कूरआन तर्हीफ़-परिवर्तन नहीं हुआ

इस चीज़ में कोई शक नहीं है, कि पृथ्वी के समस्त प्रकार मुस्लमान प्रसिद्ध व पवित्र ग्रंथ कूरआन मजीद पर एक विशेष यक़ीन रख़ते है।
वेसात शुरु होने से पहले विभिन्न क़ौम और दल के अन्दर एक फ़साहत व वलाग़त का एक विशेश चर्चा था, या विशेश स्थान था और यह इस स्थान तक पहूच गई थी की अरब के समस्त प्रकार फ़साहत व वलाग़त वालों ने कूरआन मजीद की फ़साहत व वलाग़त की ताईद व तौसिक़ की। और यह कहने पर असहायाय़ हो गये की क़ुरआन मजीद की यह दिल्नशीन कथाएं क़ाविले क़्यास नहीं है। कूरआन मजीद की ज़ाहैंरी न कविता है और न उसकी क़ाफिया हमारे जैसा कविता के उदाहरण है। बल्कि वह लोग समझते थे कि कूरआन मजीद की कथाएं वेनज़ीर है, अज्ञान व अनपढ़ अरब मूशरिकीन, कूरआन मजीद को रसूल (स0) के तरफ़ जादु कहकर संमधं दिया करता था ताकि लोगों को उन से पथ भ्रष्ट किया जाए ताकि उन के चारों तरफ़ लोग भीढ़ न-लागाए, लेकिन इन समस्त प्रकार विहूदा तब्लीग़ करने के बावजूद पैग़म्बरे अकरम (स0) की अमंत्रण व क़ूरअने मजीद प्रसिद्ध व मारुफ़ होते गये, और दीन बा दीन उन के अनुशरणकारी में उन्नती होने लगे, हत्ता जो लोग पैग़म्बरे अकरम (स0) को अनुशरण करते नहीं थे वह लोग भी कूरआन मजीद को दिल्नशीन शब्दो की ध्वनी को सूनने के लिए पैग़म्बरे अकरम (स0) के गृहों के चारों तरफ़ छिप छिप कर पैठ के वपित्र कूरआन पाक की ध्वनी को सुता करता था।

क़ूरआत व हिफ़्ज़े कूरआन

समस्त प्रकार मुस्लमान नारी व पूरुष क्यों न हो, चाहे वह छोटे हो या बडे़। पवित्र कूरआन को हिफ़्ज़ करते थे और उस आसमानी आयातों को पाठ करके आपने विताब क़ल्बों को अराम व अनन्द पहँचाते थें। और आयत के माध्यम ख़ूश व ख़ूशी जीवन कि पाठ अर्जन करते थे। नतीजे में विसात की ज़िन्दगी शुरु से लेकर पवित्र कूरआन के दोस्त व दुश्मन, बिरुद्ध व अबिरुद्ध आयाते कूरआन को सूनते थे और उन में बहूत सारे लोग पवित्र कूरआन को हिफ़्ज़ करते थे। इस विनापर पवित्र ग्रंथ किसी एक विशेष कौम और न जात के लिए निर्दष्ट नहीं था. नाज़िल होने के समय से लेकर आज तक सब प्रकार के मुस्लमान इस पवित्र कूरआन को अटल से पकढ़ कर रख़ा है। और पवित्र कूरआन की आयतों को नमाज़ व गैर नमाज़ में भी पाठ करते है। इस पवित्र कूरआन की आयातों के ज़रीए इस्तिदलाल करके एक अपरों को परामर्श देते थे इस सूरत में कि आयत नाज़िल होने के एक दो दीन के बाद वेशि भाग पैग़म्बरे (स0) के असहाब उस को हिफ्ज़ करते थे।
अपर तरफ़ एक दल जो कहने का उपयुक्त है, कि पैग़म्बरे (अ) के असहाब और उन के दोस्त कूरआन पाठ करने में मश्गूल थे और वह लोग समस्त प्रकार मुस्लमान के अन्दर (क़ूर्रा) के नाम से प्रसिद्ध व माअरुफ़ थें।
दितीय तरफ़ एक दल ऐसे थे जिन व्यक्तियों के नेता हज़रत अली (अ) थें वह लोग ( कूत्ताबे वही) पवित्र कूरआन लिख़ने के नाम से प्रसिद्ध थें। जो कुछ पवित्र कूरआन में नाज़िल होता था, पैग़म्बरे अकरम (स0) के निदेश से आपकी पवित्र सेवा में आयाते कूरआन को परष्पर व सजा के लिख़ा जाता था. जिस तरह आप निदेश फ़रमाते थे उस निर्देश के मुताविक़ एक विशेष कागज़ के उपर लिख़ते थे। और यह सब काज-काम आपकी निज़ारत में सम्पादन हुआ करता था। हत्ता लिख़ने के बाद आप उस लिख़े हुये विशेष कागज़ों को पढ़ने के लिए निदेश फ़रमाते थे ताकि सही तरीके से उस आयत को चाँच-पर्ताल की जायें।
इस में कोई शक नहीं कि बेशि भाग कूरआन मजीद के सूरा जो पैग़म्बरे अकरम (स0) के समय प्रसिद्ध थे, ख़ुद पैग़म्बरे अकरम (स0) सूरा और उसकी नाज़िल होने का स्थान और आयत को निर्वाचन फ़रमाते थे, हत्ता बहूत सारे सूरों मिसालः तुअल, मिअएन व माछानी वगैरह उस समय में नाम रख़ा गया था, पैग़म्बरे अकरम (स0) उन समस्त प्रकार सूरों को पढ़ते थे और उस सूरों को पाठ करने का सवाब भी बयान भी करते थें, अब्दुल्लह इब्ने मसऊद, अबि कअब व अपर महान वक्तित्व पवित्र कूरआन मजीद को रसूल (स0) के पवित्र सेवा में पाठ करके समाप्त किया. और उस की तिलावत फ़रमाई ।
दितीय कथा यह है कि जब पवित्र कूरआन की आयतें नाज़िल होती थी, उस के साथ साथ पुल्तकत करते थे, ताकि उस को मसजिद में किसी एक विशेष स्थान पर संरक्षण किया जा सके, ताकि समस्त प्रकार मुस्लमान उस को लिख़े और पढ़े, इस तरीके से पवित्र कूरआन सब के निकट पहुँचा है।

कूरआन परिवर्तन होने से पवित्र है

हाँ, पवित्र क़ुरअन मजीद परिवर्तन से पाक व पवित्र रहने के बहूत सारे कारण है, जिस में से एक कारण बयान किया जा चूका हैं. क्योंकि पवित्र क़ुरअने मजीद रसूले अकरम (स0) की रह्बरी में एकत्रीत किया गया है। और इस कूरआन पर मुस्लमानों को एक विशेष यक़ीन व ईमान है और कूरआन ऊन मुस्लमानों के इख़तियार में है, यह पवित्र आसमानी पुल्तक हक़ीक़त में हमेंशा के लिए मोज़ेज़ा है. क्योंकी तौरात हूदुदान दोहज़ार साल, इंज़िल तीन सौ साल तक जनसाधारण व्यक्तियों के दर्मियान उपस्थित नहीं था, और विभिन्न प्रकार सियासी व राजनिती उस पुल्तक में प्रवेश करने के बाद जमा किया गया था. लेकिन क़ुरअने मजीद नाज़िल होने के समय से लेकर आज तक उसी तरह बाक़ी है और किसी प्रकार के नुक़्च व ऐब, कम व बेशि नहीं है. पैग़म्बरे अकरम (स0) के यूग में भी इस तरह एकत्रीत किया गया है. उलमाएं शीया हज़रात इस अतीत इतिहास में सम्पूर्ण यक़ीन के साथ परिष्कार भाषा में बयान किया है. की पवित्र कूरआन किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं हूई है. मिसालः मुहद्दिस बुज़ुर्ग शैख सुदूक़, आपने यूग के बुज़ुर्ग मर्जए तक़्लीद शैख मूफ़ीद, और अपर बुज़र्गान जैसे सैय्यद मूर्तज़ा, शैखूत्ताएफा शैख तुसी, मूफस्सिरे कबीर शैख ताबर्सी, और अपर शिया सम्प्रदाय के उलामाएं बुज़ुर्ग सम्पूर्ण यक़ीन के साथ बयान किया है कि पवित्र कूरआन तह्रीफ़ नहीं हुई है।

इस बहस का नतीजह्।

कूरआन, एक ऐसी आसमानी ग्रंथ और पैग़म्बरे अकरम (स0) के लिए हमेंशा मोज़ेज़ा है, और बिना परिवर्तन व किसी प्रकार के बातिल चीज़े प्रवेश किये बगैर हमारे दर्मियान उपस्थित है, यह वही क़ुरअने मजीद है जो पैग़म्बरे अकरम (स0) पर नाज़िल हूई थी और किसी परिवर्तन होने से पाक व पाकीज़ह है। और हमारे मासुमीन (अ) ने भी इसी कूरआन जो मुस्लमानों के हाथ में है इस को अपना हक़ व बातिल की पह्चान का मियार क़रार दिया है, और जो कुछ कूरआन के मुताबिक़ नहीं है उस को बातिल घोषना किया है। और जो कुछ कूरआन के मुआफ़िक़ है उस को अपना जीवन के समस्त प्रकार निर्देश बयान किया हैः और इस के साथ साथ ताकीद के साथ बर्नना किया है किः पवित्र कूरआन को बेशि से बेशि अनुराग करो, उस के क़ावानीन के उपर अमल करो, उस को सम्मान प्रर्शन करो, इस के साथ साथ और भी फ़रमायाः कूरआन पाठ करने का सवाब और उस को रक्षा करने के सम्पर्क, जिस समय कूरआन पाठ हो ध्यान से सुन ना, और समस्त प्रकार क़ावानीन के ऊपर कूरआन मजीद की अइन को बर्तरी देना, कोई भी इंसान आपनी ज़िन्दगी में खुश बख़्ति देख नहीं सकता जब तक वह कूरआन पर अमल न करे. मगर यह हैं की वह कूरआन के साये में जीवन बस्र करे चाहे वह क़ानून फ़र्दि हो या समाजिक, मद्दि हो या मानबी, सियासी हो या इक़्तेसादी वगैरह......विजयी उस समय अर्जन करना संभव है, जब उस के बिधानें पर अमल करें।

4- इमामत

इमामत का शब्दार्थ है, कि कोई किसी के सामने था और वह उन लोगों को सही पथ निर्दशन कर रहा था। या उन लोगों को दिनी, राजनिती, या एक समाजिक़ काम का दायित्व लिया था और दूसरों ने उन को अनुशरण किया था।
इस कथा पर ध्यान देना बहूत अबशक है, कि इमाम शब्दार्थ (इमाम) शियों के दृष्ट में एक मंसवी है, यानी इसका ततपर्य अल्लाह की तरफ़ से इन्तेसाब, ना लोगों की तरफ़ से। इन्तेंख़ाब. जैसा ख़ुदा वन्दे आलम पैग़म्बरे अकरम (स0) को परिचित किया है। और यह विशेष स्थान अल्लाह की तरफ़ से आपने विशेष वन्दे को दायित्व देता है। इस अध्याय में मात्र दो विषय की तरफ़ इगींत किया जाए गा।
1- इमाम का होना ज़रुरी है।
2- इमाम अल्लाह की तरफ़ से निर्वाचन होता है।
इमाम का होना ज़रुरी है
बड़ी दिक़्कत और गौर फ़िक्र करने के बाद मालूम हुआ है कि अमंबिया व नबीयों को भेजना बहूत ज़रुरी है। और इस के साथ साथ हम सब को इमाम (अ) की अबशक के लिए आगाह कराता हैं।
क्योंकि यह कथा परिष्कार है कि प्रत्येक चीज़ को चलाने के लिए चाहे वह मद्दि हो या मानबी, एक नेता का होना बहूत ज़रुरी है। और वह नेता व इमाम समस्त प्रकार चीजों के सम्पर्क में ज्ञान रख़ता हो, क्योंकि एक चीज़ चलाने के लिए अगर सही तरीके चलाने ना पाए या सही रह्बर न हो. संम्भव है की एक ख़राब और पथ भ्रष्ट की रास्ते की तरफ़ लोगों को पथ प्रदर्शन करे जिस कारण पर एक कौमी शक्ति को ख़ुबैठे और आपने अस्ल मक़सद में पहूँच ना पाए। अगरचे ख़ुदा वन्दे आलम आपने वन्दों को एक क़ुवती फिक्र के माध्यम इंसान को तैयार किया है। और पैग़म्बरे व आम्बिंया को उस इंसान के लिए भेजा गया है। लेकिन इंसानों को आपने सही रास्ते से हट जाना और उस के उपर किसी चीज़ का प्रभाब फ़ैलना एक विशेष शर्त व शरायेत के साथ होता है. ज़मान व मकान, और ज़ालिम व जाबिर हाकिम का एक कारण बनना है। जिस कारण से वह आपने सही रास्ता को ख़ो बैठ कर साअदत व कामियाबी का पथ भूल कर एक पराजय पथ को क़बूल करने पर असहाय हो जाता है। (14)
फक़त व फक़त मासूम (अ) के लिए संभव है कि एक समाज को गुमराही से परीत्रान दिला कर सही पथ की तरफ़ निर्देश प्रदान करे।
इमाम व मासूम (अ) का उपस्थित होना मिसले पैग़म्बरे अकरम (स0) की तरह एक मुकम्मल खल्क़ है। छोटे श्बदों में यह कहा जाएं कि इमाम एक ऐसा नेता और रह्बर है जो समस्त प्रकार मुस्लमानों के नेता, दीनी रह्बरी, राजनिती और समाज व मुआशिरा के लोगों के लिए एक उलगू और इंसानों के लिए पृथ्वी व आख़रत की उन्नती का कारण है। चूकीं इमाम (अ) का उपस्थित होना मद्दि व मानबी का उन्नती की पहचान है, और पृथ्वी व आखिरत में साआदत व विजयी का दायित्व है, क्योंकि इमाम (अ) अल्लाह के फै़ज़ से सम्पर्क रख़ते है।

इमाम (अ) का निर्वाचन करना किस का दायित्व है?

मुस्लमान के दर्मियान गल्त फह्मि के कारण से शिया और सुन्नी में दो प्रकार भाग हो गये। शियों के अक़ीदा व यक़ीन है, कि पवित्र क़ुराने मजीद और अहले बैत (अ) की हदीस के मुताबिक़ इमामत रिसालत की समस्त प्रकार की दायित्व सम्पूर्ण करेगें। पैग़म्बरे अकरम (स0) अल्लाह के निर्देश से आपने स्थान पर किसी को बैठाके गये और समाज व इस्लाम की समस्त प्रकार दायित्व उन के उपर छोढ़ गये । ताकि इस्लाम की समस्या और उस के कठिन विषय को समाधान करे, इस विनापर शिया हज़रात इमामत के बहस को अपना अस्ल अक़ीदा समझते है। और मसाएले नबूवत को आपने जीवन का एक हिस्सा क़रार देते है। इमाम और नबूवत की बहस तक़्लीद जैसा नहीं है, बल्कि हर व्यक्ति पर वाजिब है की उस विषय को दलील और प्रमाण के साथ क़बूल करे।
हाँ! नबूवत और इमामत एक अपर से पृथक नहीं हो सकती। बल्के यही दो चीज़ इस्लाम के गुरुत्व और मोहिम बर्नामे में शरीक है, सिपासः इन दोनों में पार्तक यही हैं कि पैग़म्बरे अकरम (स0) अल्लाह के निर्देश और वही के माध्यम से इस्लाम की बुनयाद रखा है. और इमाम मासूम (अ) उस इस्लाम को पूरे तरीके से बयान और उस के समस्त प्रकार के अध्याय को तफ़सीर के साथ बयान किया है। चूकिं पैग़म्बरे अकरम (स0) का ज़माना और शरायेत निर्देश नहीं दिया था की आप इस्लाम को बयान करें।
इमाम मासूम (अ) इस्लामी रह्बरी के व्यतीत, इस्लाम के क़ावानीन और मक्तब के नेता भी है। ताकि लोगों को पथभ्रष्ट और गुमराही फ़िक्र से परित्राण दिलाएं, समाज के समस्त प्रकार मद्दि व मानबी को परिपूर्न करे, यह समस्त गूणावली प्रमाण करता है कि पैग़म्बरे अकरम (स0) की जान्शीन समाज के समस्त प्रकार दायित्व और रह्बरी उन के हाथों में है। मिसालः जिस तरह पैग़म्बरे अकरम (स0) समस्त प्रकार गुणावली में एक व्यक्तित्व रखते थें, और समस्त प्रकार की गुनाह व भूल चूक से पाक व पवित्र थें, और इस्मत व तहारत के मालिक थें, इल्म व ज्ञान में दीन व दुनियावी में वेनज़ीर थे, उचित यही हैं कि समस्त प्रकार की आलूदगी से पवित्र रहे ताकि इस्लाम को मज़बूत करें उसी तरह इमामत का स्थान भी है।

एक विषय जिस को हमें भूलना नहीं चाहिए

बड़े ध्यान और गंभीर फ़िक्र के साथ इमाम (अ) की गुरुत्व व महा गुफ़्तगु वर्णना हुआ है. क्या पैग़म्बरे अकरम (स0) के लिए यह मुमकिन है कि जान्शीन और समस्त प्रकार मुस्लिम उम्मत की रह्बरी को फरामोश करे?
कभी संभव नहीं है क्योंकि इमाम-मासूम (अ) का सम्पर्क अल्लाह से है. और वह अल्लाह इस स्थान को कभी अत्याचारी व्यक्ति को प्रदान नहीं करता।
अपर तरफ़ पैग़म्बरे अकरम स0 आपने जीवन में बहूत कष्ट और दुख़ उठाएं, इस के बाद आप से संभव हो सका कि मक्तबे इस्लाम को बुनयाद रखे। आया हिकमत और वसूल व अक़्ल यही कह रही है कि अपनी प्यारी उम्मत को बगैर जान्शीन और रह्बर के परित्याग़ करके चले जाएं? आया अक़्ल भी यही कहती है कि पैग़म्बरे अकरम (स0) इस गुरुत्व व महतपूर्न विषय के सम्पर्क में खामोश रहें?! आया यह क़ाबिले क़बूल के उपयुक्त है. कि पैग़म्बरे अकरम (स0) कई दीन के लिए मदीना के बाहर जाए और लोगों के लिए महा इस्लामी राष्ट्र में अपनी स्थान पर किसी एक को ना बैठाएं। और लोगों को अपनी अबस्था पर छोढ़ दे?! आया क़बूल के उपयुक्त है. कि इस्लाम एक अइन व विधान है जिस के लिए ज़मान और मकान निर्दष्ट नहीं, पैग़म्बरे अकरम (स0) ने इस इस्लाम और उम्मत के सम्पर्क में कुछ चिन्ता नहीं की और महा रह्बरी को आपने अबस्था में छोड़ के भूल कर चले गये ?!
थोड़ा ध्यान व गंभीर फ़िक्र करे तो मालूम हो जाए गा, कि अक़्ल की दृष्ट में इमाम (अ) का निर्वाचन करना बहूत ज़रुरी और लाज़िम है। समस्त प्रकार इस्लामी ग्रन्थें पर्यालोचन से प्रकाश हो जाए गा कि पैग़म्बरे अकरम (स0) ने आप स्पष्ट शब्दों के साथ बयान फरमायाः ( जो व्यक्ति आपने यूग के इमाम (अ) को मारेफ़त के बगैर मृत कर जाए उस की मौत अज्ञानों की मौत है)) इस हदीस में सख़्त के साथ इमाम मासूम (अ) की रह्बरी को पहचानने के लिए बड़ी ताकीद किया है। अगर कोई इमाम मासूम के मारेत रखे बगैर मर जाएं उसकी मौत कूफ़्र और जाहिलीयत की मौत क़रार दी गई है। इन समस्त प्रकार शर्तों के साथ पैग़म्बरे अकरम (स0) कैसे राज़ी होगें कि अपनी प्यारी उम्मत को जाहिलीयत में छोड़ कर चले जाएं?!
हाँ, पैग़म्बरे अकरम (स0) प्रथम रिसालत की मजलिस में जब अल्लाह के निर्देश से आपने निकट रिश्तेदारों को चचा अबुतालिब के घर बुलाया उस समय आपने इर्शाद किया ((-- अल्लाह ने मुझ को निर्देश दिया है कि मैं तुम सबों को उस के विधानों की तरफ़ अंमत्रन करुँ, तुम में से कोई है जो हमारे जान्शीन और वसी बने?)) हज़रत अली (अ) व्यतीत कोई व्यक्ति प्रश्न का उत्तर नहीं दिया, उस के बाद रसूल (स0) अपनी स्थान पर हज़रत अली (अ) को अपना ख़लीफा और जान्शीन क़रार दिया।

ग़दीरे ख़ुम की घटना

पैग़म्बरे हज़रत मुहम्मद (स0) जब आप आख़री हज् प्रसिद्ध व मारुफ़ (حجةالوداع) हुज्जतूल बिदा अंजाम देकर शहरे मदीना सर ज़मीन (ग़दीरे ख़ुम), जो जूग़राफिया की दृष्ट से मदीना जाने के लिए विभिन्न प्रकार का रास्ता है. यमन, ईराक़ व हबशह का रास्तों का सीमा था उस स्थान से समस्त लोग एक दूसरे से अलग हो कर सब आपने आपने घर की तरफ़ वापस जाते थें। अल्लाह की तरफ़ से फरिश्ते वही लेकर पैग़म्बरे अकरम (स0) को उद्दश्व करके फरमायाः

( يا ايهاالرسول بلغ ما انزل اليک من ربک.......)

(ऐं पैग़म्बरे जो कुछ अल्लाह की तरफ़ से तुमहारे उपर नाज़िल हुई है, उस वाणी को जनसाधारण व्यक्तियों के निकट पहुँचा दो अगर इस काज को अंजाम ना दिया, तो रिसालत का कोई काम अंजाम नहीं दि, अल्लाह तुम को लोगों के शर से संरक्षण करेगें))। (15)
पैग़म्बरे अकरम (स0) अल्लाह के निर्देश से रुक गये, जो लोग आगे थे वह सब पीछे आए, और जो लोग पीछे थे वह लोग पैग़म्बरे के पास उपस्थित हो गये। सिपास नमाज़े ज़ोहर के बाद आप ऊँट के उपर बने हूए कजावें के उपर तशरीफ़ ले गये, और ग़दीर के ख़ुतबा को ध्वनी शब्दों के साथ तिलावत की, ताकि सब तक मेंरी ध्वनी पहुचँ जाएं।
((ऐं लोगों! नज़दीक़ है की दवाते हक़ का उत्तर दुँ..... मैं तुमहारे दर्मियान दो गिरान कद्र चीजें परीत्याग करके जा रहा हुँ, एक अल्लाह की पुल्तक अपर मेंरी अहले बैत (अ) अल्लाह ने मुझे ख़बर दि है कि कभी यह दोनों एक अपर से अलग नहीं होगा.....) सिपासः रसूले अकरम (सः) अली (अ) का हाथ पकड़ा और उस को बुलन्द करके लोगों के सामने अपनी जानशीन के नाम से पहचानवाया और तीन बार बयान फरमायाः ((मैं जिस का मौला हुँ अली उस के मौला है)) उसके बाद अली (अ) को परवरदिगार के सामने करके फरमायाः (( परवरदिगारा जो व्यक्ति अली (अ) को दोस्त रख़ता हैं तु उस को दोस्त रख़, और जो उससे दुश्मनी करता हैं तु उससे दुश्मनी कर, परवरदिगारा अली को दोस्त रख़ने वालों की मदद फरमा और उन के दुश्मनों को ज़लील फरमा, और अली (अ) को हक़ का मर्कज़ क़रार दें)) उस के बाद फरमायाः अभी फरिश्ते नाज़िल होके इस आएत को लाये हैं ।

اليوم اکملت لکم دينکم و اتممت.......

आज तुमहारे दीन ईसलाम को सम्पूर्ण किया हुँ और अपनी निअमत को तुम पर समाप्त घोषणा किया हुँ. और दीन ईसलाम को तुमहारे लिए एक मुकम्मल दीन क़रार दिया हुँ))। इस इतिहासिक घटना को अलग़दीर ग्रंथ में तफ़सील के साथ बर्णना हूआ हैं और शिया व सुन्नी के दलीलों के साथ बयान हूआ हैं।

इमामतः प्रथम व शेष वही की निर्देश है

पैग़म्बरे अकरम (स0) इस्लाम की तब्लीग़ के लिए पहली मज़लिस में रसूले अकरम (स0) पहली मज़लिज़ के दर्मियान आपने जान्शीन का परिचय कराया था, और इस्लाम की आख़री पैठक में समस्त प्रकार मूसल्मानों के दर्मियान ग़दीरे ख़ुम के मैदान में अपना निर्दष्ट ख़लीफ़ा को बयान फरमायाः और अल्लाह की तरफ़ से मूकम्मल दीन को सही पद्धति से स्पष्ट फरमायाः इन दो घटनायों में पैग़म्बरे अकरम (स0) कई बार व विभिन्न मूनासिबत से हज़रत अली (अ) को इमामत व जान्शीन को लोगों तक पहुँचा दिया ताकि किसी प्रकार का शक व अबकाश न रहे।
जैसा कि अहले सून्नत मूतावतिर रिवाएत के माध्यम इमाम मासूम (अ) के सम्पर्क में हज़रत रसूल अकरम (सः) से हदीस नक़्ल हुई हैं कि प्रत्येक इमाम मासूम (अ) अल्लाह की तरफ से इमाम के स्थान पर मन्सूब है। पैग़म्बरे गिरामी (स0) कभी कद्र उन समस्त इमामों को अपनी ईतरत कहकर पूकारा या कभी उन इमामों को नामों से याद करके फरमायाः ( हमारे बाद बारह इमाम होगें मिसले बनी ईस्राईल के निक़ाब के गिनती के मूताबिक़ या हाव्वारीयून या हज़रत ईसा (अ) उसके चारों तरफ़ के विशेष लोग जैसे. फिर फरमायाः ( हमारे बाद बारह इमाम होगें पहला हज़रत अली (अ) व आख़िर हज़रत क़ायम (अ) अल्लाह इर्शाद फरमाया हैः कि हज़रत क़ायम (अ) के माध्यम इस्लाम पृथ्वी की पूप व पश्चीम को प्रसार करेगें)) हज़रत सलमान फार्सि (अ) से एक रिवाएत बर्णना हूआ हैः फरमाते है मै पैग़म्बरे अकरम (स0) की पवित्र ख़िदमत में उपस्थित हूआ, देख़ा हुसैन इब्ने अली हज़रत रसूल (स0) के पाये मुबारक पर बैठे है, पैग़म्बरे ऊनके आँख़ और दातों को चूम रहे है और फरमा रहे हैः
((तुम महा आक़ा हो व महा आक़ा की औलाद हो, तुम इमाम हो और इमाम के (अ) औलाद हो, तुमहारे पिता इमाम व भाई भी इमाम, तुम हुज्जते ख़ुदा हो, और अल्लाह की हूज्जत के बेटा और नौ इमामों के पिता जो सबके सब अल्लाह की तरफ़ से मन्सूब होगें और नबेम इमाम हज़रत क़ायम (अ) होगें।

तर्तीब के साथ अहले बैत (अ) के पवित्र नाम

1- हज़रत अमिरुल मोमेंनीन अली इब्ने अबि तालिब (अ)
2- इमाम हसने मुज़्तबा (अ)
3- इमाम हुसैन शहीदे कर्बला (अ)
4- इमाम ज़ैनुल अबेदीन (अ)
5- इमाम बाक़िर हज़रत मुहम्मद इब्ने अली (अ)
6- इमाम सादिक़ हज़रत जाफर इब्ने मुहम्मद (अ)
7- इमाम काज़िम हज़रत मूसा इब्ने जफ़र (अ)
8- इमाम रिज़ा हज़रत अली इब्ने मूसा (अ)
9- इमाम जवाद हज़रत मुहम्मद इब्ने अली (अ)
10- इमाम हादी हज़रत अली इब्ने मुहम्मद (अ)
11- इमाम असकरी हज़रत हसने इब्ने अली (अ)
12- इमामें ज़माना हज़रत महदी हुज्जत इब्नुल हसने (अज्जलल लाहू तअला फरजहुश्शरीफ़)

शिया एक आसमानी नाम है

(شيعه) शब्दार्थ कूरआन मजीद में मात्र हज़रत ईब्राहीम खलीलुर रह्मान के लिए व्यबाहर हूआ हैं जैसा कि क़ुरआन मजीद में इर्शाद हुआ हैः

(وان من شيعته لإبراهيم)

यानि शिया पैरुवाने नुह हज़रत इब्राहीम (अ) के थे, और हज़रत मुहम्मद (स0) मात्र शिया का नाम पैरुवाने व दोस्त दराने हज़रत अली (अ) के लिए उल्लेख किया हैं और उलामाएं सुन्नी ने भी इस विषय के सम्पर्क भी कहा हेः कि शिया एक गौरब नाम है जिस नाम को पैग़म्बरे अकरम (स0) ने फरमाया हैः इस सम्पर्क में ज़ाबिर इब्ने अब्दुल्लह इर्शाद फरमाया हेः कि पैग़म्बरे अकरम (स0) के पवित्र सेवा में बैठा था अचानक़ हज़रत अली (अ) प्रवेश किये आपने फ़रमाया हमारा भाई आया है. सिपास काबा घर की तरफ चेहरा करके आपने दोनों मुबारक हाथों को बुलन्द करके फरमायाः
(शफ़थ हैं उस परवरदिगार का जिसके हाथ में मुहम्मद की जान हैं, अली और पैरुवाने अली क़्यामत के दिन सफलता अर्जन करेगें) और यह गौरब अमीज़ उपाधी रसूल (स0) के यूग में हज़रत सलेमान, अबुज़र, मिक़दाद, और अम्मारे यासिर को कहा जाता था. यह सब हज़रात, हज़रत अली (अ) के वफादार पैरुकार में से थें ।

अहले बैत (अ) खा़न्दाने वही है

ज़रुरी है कि सार के तौर पर गुज़ारीश के साथ अहले बैत गिरामी हज़रत फातिमा ज़हरा व अएम्माह अतहार (अ) के इतिहास को बयान करुँ।

पैग़म्बरे अकरम (स0) की पूत्री

हज़रत फातिमा ज़हरा (स0) की, वलीदे गिरामी अल्लाह की तरफ़ से भेजा हुआ बन्दा मुहम्मद इब्ने अब्दुल्लाह, व आपकी सम्मानिता माता बानोये ईस्लाम हज़रत ख़दीजा (उम्मुल मोमेंनीन )) है।
हज़रत फातिमा ज़हरा (स0) आप जानशीने बर हक़ पैग़म्बरे (स0) हज़रत अली अमिरुल मोमेंनीन (अ) की स्त्री और ग्यारह इमामों की माता जो सबके सब हुज्जते ख़ुदा है।
हज़रत फातिमा ज़हरा (स0) ने बीस जमादिउस सानी को विलादत पाई, और तीसरे जमादिउस सानी मगंल के दिन पैग़म्बरे अकरम (स0) के हिज़रत के ग्यारा साल बाद 18 बर्स की उम्र में शाहादत पाई।
आपकी वसीयत के मुताबीक़ गुस्ल व कफन का मरासीम हज़रत अली (अ) के दायित्व थी, आपका जानाज़ह मदीना शहर में ख़ूफिया स्थान पर और मख़फियाने तौर पर मिट्टी दि गई, ताकि आपकी मज़लूमियत ग़ासीबे हक़ के लिए क़यामत के दिन तक प्रमाण रहे। यह पवित्रता महिला, अल्लाह की इबादत, परहेज़गार और फज़िलत में आपने पिता रसूल (स0) के सम्पू्र्ण आयेनाह थीं, जिसके सम्पर्क अल्लाह ने पवित्र ग्रंथ क़ुरआन मज़ीद में कई आयतें नाज़िल किया हैः पैग़म्बरे अकरम (स0) अल्लाह के निर्देश के मुताबिक़ (سيدة نساء العالمين) का उपाधी दिया है। और रसूले ख़ुदा हज़रत फातिमा ज़हरा (साला0) को बहुत प्यार करते थे जब फातिमा ज़हरा (साला0) रसुलूल्लह के पवित्र सेवा में जाती थी तो रसूले ख़ुदा फातिमा के सम्मान के लिए ख़ड़े हो जाते थें और आने के लिए उन को मुबारक पेश करते थें, और आपने बग़ल में बैठाके हाथ को चूमते थे, आपने कई बार फरमयाः
((ख़ुदाया फातिमा की ख़ुशी मेंरी ख़ुशी, और उन की नाराज़ी मेंरी नाराज़ी)) और हज़रत अमिरुल मोमेंनीन अली (अ) के लिए कई औलाद का नाम लिए पूत्रीयों में से हज़रत ज़ैनब, उम्मे कुलसूम और पूत्रों में से हज़रत इमाम हसने और इमाम हुसैन (अ) का नाम फरमयाः और ज़नाब मोहसिन ( ग़ासीबे ख़िलाफत वालों ने ) फातिमा (स0) को कष्ट व दुःख देने के कारण से शहीद हो गये।

1- इमाम अली (अ)

हज़रत अमिरुल मोमेंनीन (अ) अबुतालिब (अ) के पुत्र, माता फातिमा बिन्ते असद, और रसूले खुदा पैग़म्बरे अकरम (स0) के दामाद, और समस्त इमामों के पिता है। एंव रसूले खुदा के बाद समस्त मोमिन के इमाम है, जो तेरह (13) रजब गुरुवार के दिन रसूले खुदा (स0) के जन्म के तीस साल बाद मक्के (ख़ाना-ए काबा) में जन्म लाभ किया, और शबे जुमअ 19 रम्ज़ानुल मुबारक मस्जिदे कूफ़ा के मेंहराबे इबादत में अब्दुर रहमान इब्ने मुल्जि़म ने तलवार मारी और तीन दिन बाद 63 साल के उम्र में दरजे शहादत और विजय प्राप्त की. और परवरदिगार से जा मिले।
हज़रत इमाम हसने व इमाम हुसैन (अ) ने ग़ुस्ल व कफ़न का काम अंजाम देकर मृत देह को नजफ़े अशरफ़ में आपकी वसीयत के मुताबिक उसी स्थान पर पिनहानी तौर पर दफ़न किया ताकि ख़वारिज से शान्ति व संरक्षण रहे, उस के बाद हज़रत इमाम जाफर सादिक़ व इमाम काज़िम (अ) ने उन पवित्र स्थान को बताया।
हज़रत अमीरूल मोमेंनीन अली इब्ने अबी तालिब (अ) के लिए बहुत सारे गुणावली है जो गिन्ती के बाहर है, अली (अ) प्रथम व्यक्ति है जितने हज़रत रसुल (स0) पर विश्वास किया, और आपने जीवन में किसी प्रकार की मूर्ती पूजा नहीं की, और समस्त प्रकार युद्धों में विजय प्राप्त की लेकिन किसी प्रकार के युद्ध से नहीं भागे।

2- इमाम हसने (अ)

हज़रत इमाम हसने (अ) आप अली इव्ने अबितालिब (अ) के एक सुमहान बालक है, माता हज़रत फातिमा ज़हरा (सालाः) रसूले खुदा की एकलौती बालिका है। हज़रत इमाम हसने (अ) हज़रत रसूल (स0) के नवासे और हज़रत अली (अ) के वाद दूसरे इमाम है।
आप पवित्र रम्ज़ानुल मुवारक़ के 15 तारीख मगंल के दिन तीसरी हिज़री मदीना मुनव्वरह में जन्म लाभ किया, और जुमेंरात के दिन 28 सफ़र 49 हिजरी 48 बर्स में ज़हर से शहीद कीये गये।
आप के भाई हज़रत इमाम हुसैन (अ) ने ग़ुस्ल व कफ़न का काम अंजाम दिये आप जन्नतूल बक़ी में मदफ़ून है। लेकिन दुःख के साथ कहना पड़ता है कि इस (जन्नतूल बक़ी को वहाबीयों ने नीस्त व नाबूद कर दिया है।
आप आपने ज़माने में इल्म व ईबादत में हर एक से बड़े आलिम व आबिद और रसूले अकरम (स0) से मिलते जुलते थे और आप आपने ज़माने के दान व खैरात में हर एक से आगे थें।
आपके सम्पर्क में बहुत सारी घटना पाई जाती हैं ज़िस में से एक घटना पेश कर रहा हूं। एक दिन आपकी कनीज़ आपकी सेवा में एक फूल पेश किया आपने फरमयाः मैं ने तुम को अल्लाह की राह में आज़ाद किया उस के बाद फरमयाः अल्लाह ने हम सब को इसी तरह तर्बीयत की है। जैसा की क़ुरआन मजीद में इर्शाद है ( जब कोई तुम्हारी सेवा में पुरुष्कार ले आये उससे अच्छा पुरुष्कार तुम पेश करो )।
आपकी बुर्दबारी के बारे में कहा जता हैः कि एक दिन एक शामीने आप को देखकर गालियाँ देनी शुरु की आप उस को देखकर ख़ामोश रहे ताकि वह ख़ामोश हो ज़ाये। उस के बाद आप उस के निकट हंसते हुए सलाम करके फरमयाः भाई क्या गरीब व मूसाफ़िर हो या कुछ भूल गये हो। (( अगर मुझ से क्षमा चाहते हो तो क्षमा कर दुंगा, अगर कोई चीज़ मागंते हो में प्रदान करुंगा, अगर मुझे अपना समझते हो मै क़बूल करुंगा, अगर भूके हो तो खाना खिलाउंगा, अगर प्यासे हो तो सैराब करूंगा, अगर नंगें हो लिबास दुंगा व अगर मोहताज हो तो ज़रूरत पूरी करुंगा, अगर किसी ने तुम्हें भगा दिया है तो पनाह दुंगा, अगर कोई काम हो उसे अंजाम दुंगा)।
मर्द शामी आपके मुबारक श्ब्दों को सुन कर रोने में मशगूल होगया और दिलही दिल में कहने लगे मुअविया ने झूटी बातें बताईं और मुझे गलत व पथ भ्रष्ट रास्ते में उतारा. उसके बाद कुछ देर के बाद में कहा मैं गवाही देता हूँ आप ज़मीन पर हुज्जते खुदा हैं।

(الله اعلم حيث يجعل رسالته) (17)

(अल्लाह बेहतर ज्ञान रखता है अपनी रिसालत को किस ख़ान्दान में प्रदान करें)।

3- इमाम हुसैन (अ)

हज़रत इमाम हुसैन (अ) अली इव्ने अबि तालिब (अ) के बालक, सम्मानिता माता हज़रत फातिमा ज़हरा (सालाः) रसूले खुदा की एकलोती बेटी है। हज़रत इमाम हुसैन (अ) हज़रत रसूल (स0) के नवासे और आपने भाई हसने (अ) के बाद तीसरे रहबर (धार्मिक नेता) है। आपने तीसरी शअबान चार हिजरी मदीना मुनव्वरह में जन्म लिया और दस मुहर्रम सन 61 हिजरी में (प्रसिद्ध व मअरुफ़ धटना) कर्रबला में हॄदय काँप प्यास के अबस्था में यज़ीदीयों ने शहीद किया। आपके शहादत के तीन दिन बाद, हज़रत इमाम ज़ैनुल अबेदीन (अ) ने खून से सनी हूई पाक लाश को उसी कर्बला में दफन किया, आपकी उम्रे मुबारक मात्र 57 साल थे।
आपके तमाम सिफाते व गुणावली के लिए यही कहना काफ़ी है कि आप रसूले खुदा (स0) के ज़िगर के एक टुकड़े है. पैग़म्बरे अकरम (स0) ने फ़रमायाः

(حسين منی و انا من حسين)

हुसैन मुझ से है और मैं हुसैन से हुँ
और इमाम हसने व इमाम हुसैन (अ) के लिए फरमायाः

هما ريحانتای فی الدنيا

हसने और हुसैन दो फुल हैं जिसमें हमारी खुश्बू पाई जाती है और वह दोनों धरती में उपस्थित है। एक और स्थान में फरमायाः

الحسن والحسين سيدا شباب اهل الجنة

हसने और हुसैन जन्नत के जवानों के नेता है। दूसरी हदीस में फरमायाः

الحسن والحسين امامان قاما او قعدا

हसने व हुसैन दो इमाम है चाहे क़्याम करे या क़्याम ना करें। इमाम हुसैन (अ) आप हर एक से ज़्यादा ज्ञान रखने वाले व ईबादत करने वाले व्यक्ति में से थें और आपने पिता हज़रत अली व रसूले खुदा (स0) के एक आयेनाह थें।
हज़रत इमाम हुसैन (अ) अधिक रातों में आपने काधों पर पैसा का थैला भर कर ग़रीब व बेसहारा व्यक्तियों के लिए ले जाते थे। और यह थैला का असर उस समय मअलूम हुआ जब आप शहादत पाये, इस से स्पष्ट होता है कि आप बहुत करीम व बुर्दबार व मेंहरबान थें। हदीस में आया है कि एक मैदान या बियाबान नशीन अरब कुछ कविता पढ़के आप से क्षमा मांगी, आपने उसके बदले में उस को चार हज़ार दिर्हम देकर उस से कहाः मैने जो कुछ तुमहें दिया है बहुत कम है।
(यहाँ अरवी भाषा थी जिस को तर्जमा कर दिया गया है)
वह व्यक्ति पैसा लेकर रोना शुरु किया, आपने उस्से कहाः शायद पैसा कम होने के कारण तुम नाराज़ी हो? उस ने कहा नहीं हमारा रोना इस लिए है कि यह ज़मीन किस तरह एक दानी व्यक्ति को छुपा के रखेगी।
हाँ! इमाम हुसैन (अ) एक ऐसे व्यक्ति थें जिसने अपना शरीर का ख़ुन देकर आपने नाना के ईस्लाम को अनंत जीवन प्रदान किया। इमाम हुसैन (अ) का इंक़लाब एक ऐसा इंक़लाब था कि उस का उदाहरण अतीत ज़माने में भी नहीं मिला और ना मिलेगा। इमाम हुसैन (अ) आपने भाई के बाद धरती में उत्तम व्यक्ति थे जिसने अपना शरीर का ख़ुन देकर धर्म की मज़बूत जड़ को बचाया है।

4- इमाम हज़रत ज़ैनुल अबेदीन (अ)

हज़रत अली इब्नूल हुसैन ज़ैनुल अबेदीन (अ) इमाम हुसैन (अ) के पुत्र, आपकी माता (शहर बानो) बादशाह यज़्द गिर्द ईरान की पुत्रि थीं, जैसा कहा जाता है कि आप जुमेंरात के दिन 5 शाबान. हिजरी सन 38 या जुमेंरात 15 जमादिउल अव्वल 36 हिजरी सन, जिस दिन हज़रत अली (अ) ने बस्रा को विजय के प्राप्त किया, उसी दिन आपने मदीना मनव्वरह में क़दम रखा और 12 मुहर्रम या कुछ रिवायेत के मुताबिक 25 मुहर्रम 95 हिजरी सन, ज़हर से शहीद कीए गये। (18) हलाकिं आपकी उम्र मुबारक मात्र 57 या कुछ रिवायत के मुताबिक़ 59 साल थे।
आपके मुबारक देह मुतह्हर को इमामें वक़्त, मासूम, हज़रत इमाम बाक़िर (अ) के ज़रीए शहरे मदीना क़बरस्ताने बक़ी में आप के चाचा इमाम हसने मुज़्तबा (अ) के निकट दफ़न किया गया।
आप ज्ञानीयों में ज्ञानी- फज़ीलत व गुणावली में आप आपने यूग के बिनज़ीर थें। हमारे बहुत सारे बड़े बड़े आलिमों ने बहुत सारी रिवायेत व दोआऐं नक़ल की है। (19) कि अन्धेरी रात में अपना चेहरा-ए मुबारक को कपड़े से छुपाते थे ताकि कोई आपके चेहरेए मुबारक को देख़ न पाए। और सोने व चांदी या ख़ाने का थैला भर कर काधों पर उठा कर ग़रीब व नचार व्यक्तियों के दर्वाज़े पर रखके आते थे. आपकी शहादत के बाद मदीने के समस्त प्रकार व्यक्ति व आपके चाहने वाले समझ गये कि चेहरे पर निक़ाब देने वाला और काधों पर ख़ाने का थैला उठाने वाला ग़रीब-दुखी-यतीम के दस्तरख़ान पर बैठने वालें कौन थें।
आपके सदाचार में से एक आचरण यह है. कि आप प्रत्येक महीने में एक बार आपने प्रत्येक ग़ुलामों को बुला कर एक स्थान पर जमा करते थे और उन लोगों से कहते थे, कि अगर तुम में से कोई बिवाह करना चाहे तो उस का बिवाह करा दुँगां, और कोई दूसरों के निकट आपने को बेचना चाहता हो तो बेचं दुँगां, अगर कोई आज़ाद होना चाहता हो तो कर आज़ाद कर दुंगा, अगर कोई आप से आज़ाद होने के लिए अवेदन करता तो आप फरमाते थें शाबास तुम मुझ को जन्नत में पहुंचाओ गे।
हज़रत इमाम ज़ैनुल अबेदीन (अ) सिजदा को इस क़द्र तूल देते थें कि आपकी उपाधी पड़ गया था (سجاد) यानी बहुत ज़्यादा सिजदा करने वाला. और सिजदा करने के कारण आपकी पेशानीये मुबारक पर सिजदे का एक गठ्ठा पड़ गया था और आप के दोनों हाथ की हाथेली और दोनों ज़ानु से सूजनआ फुल गयी थी, आप इस तरह से इबादत किया करते थें कि आप को (زين العابدين) ज़ैनुल अबेदीन कहा जाता था यानी इबादत करने वालों की ज़ीनत।
जब आप नमाज़ पढ़ने के लिए मुसल्ले पर ख़ड़े होजाते थे तो अल्लाह के डर से शरीर काँप लादता था और चेहरा-ए मुबारक लाल हो जाते थे।
एक व्यक्ति आप को कुछ बुरे नाम से पूकारा, आप ख़ामोश रहे और कुछ देर के बाद आप उसकी तरफ गये सभा के उपस्थित रहने वालों ने गुमान किया कि आप उसका उत्तर देगें, लेकिन आपने उस भाषा की विरोध में क़ुरआन मजीद की एक अयेत पढ़ी, जिसमें कहा गया है

والکاظمين الغيظ والعافين عن الناس والله يحب المحسنين

जो व्यक्ति आपने गुस्से को पी जाता है, और लोगों की ग़लतीयों को क्षमा करता है, अल्लाह उन सदाचार काम करने वालों को दोस्त रख़ता है।
उस के बाद आपने उस व्यक्ति से कहाः ऐ भाई तुम हमारे सामने ख़ड़े हो और तुम ने कहा..... और कहा...... अगर तुम सच बोलते हो इस का माना यह है कि यह गुणावली हमारे भीतर उपस्थित है, और मैं ख़ुदा से क्षमा मांगता हुँ। और अगर झूट बोलते हो जो हमारे अन्दर उपस्थित नहीं है, तो मैं तुमहारे लिए ख़ुदा से क्षमा प्रर्थना करता हूँ।

5- इमाम बाक़िर (अ)

हज़रत इमाम बाक़िर (अ) आप इमाम ज़ैनुल अबेदीन (अ) के पुत्र. आपकी पवित्रता व सम्मानिता माता हज़रत फातिमा इमाम हसने मुज़्तबा (अ)-की पुत्री थी, इमाम बाक़िर (अ) प्रथम रजब जुमअ के दिन, और कुछ वर्णण के मुताबिक़ तीन सफ़र सोमवार सन 57 हिजरी शहरे मदीना मुनव्वरह में क़दम रखा. और 7 ज़िलहिज्ज सोमवार सन 114 हिजरी ज़हर मध्ययम मसमुम। (20) हो कर शहीद हो गये।
शहादत के समय आपकी उम्र मुबारक मात्र 57 साल के थे. आपकी क़बरस्तान जन्नतूल बक़ी पिता और चाचा के निकट दफ़न किए गये।
आपकी बहुत सारे किरामतें है जिस में से दियानत, बुर्दबारी, सदाचार खैरात, व ईबादत, फुरुतनी खुज़ु व खुशू है।
आपकी सदाचार चरीत्रों में कहा जाता है कि एक दिन एक इसाई ने आप से कहा आप बाक़्र है अर्थात (तुम गाउ हो) आपने फरमायाः ना मैं बाक़िर हूं, यानी उलूम को चिरने वाला हूँ। वह व्यक्ति कहा आप खाना पकाने वाली महिला कि पुत्र है? आपने फरमायाः यह उस की कथा है. वह व्यक्ति कहाः तुम फलां बदाचरण काली महिला की बेटा हो? आपने फरमायाः अगर तुम सठिक कह रहे हो, तो अल्लाह फलां महिला को क्षमा कर देंदा और झूट बोलते हो, खुदा तुम को क्षमा कर दे।
हज़रत इमाम बाक़िर (अ) के यह खुश आचरण से वह इसाई व्यक्ति तुरतं मुस्लमान हो गया।
इमाम बाक़िर (अ) इल्म में आपने पिता की तरह थें कि प्रत्येक प्रश्न का उत्तर तुरतं दिया करते थे।
इब्ने अता मक्की बयान करते हेः कि बहुत सारे उलामाए बुर्ज़ग आपकी पवित्र सेवा में जाके बच्चे की तरह बैठा करते थें और इस तरह ख़ुज़ू व ख़ुशू से बैठा करते थें कि मैं किसी एक को इस प्रकार देखा नहीं हुँ।
हकम बिन अक़बा, जो जनता के दर्मियाम एक आलिमें बुर्ज़रगवार थे। लेकिन इमाम बाक़िर (अ) के पवित्र ख़िदमत में एक बच्चे की तरह बैठा करता था।
मोहम्मद इब्ने मुस्लिम फरमाते हैः कि जिस समय कोई प्रश्न अता था तो मैं इमाम बाक़िर (अ) से पूछा करता था तक़रीबन तीस हज़ार के क़रीब आप से प्रश्न पूछा हुँ।
इमाम बाक़िर (अ) सब समय अल्लाह के शरण में मशगूल रहते थे, आपके पुत्र इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) फ़रमाते हैः ((जब मैं उनके निकट था. हमारे पिता हर एक समय अल्लाह की याद करते थे, अगरछे जनता के साथ विभिन्न प्रकार की बातों में मश्गूल रहते थे लेकिन अल्लाह को याद से गाफिल नहां होते थें। और परायणता, पारेसा परहज़गारी में हर एक समय आपकी आँखों से आँसू निकलता था।

6- इमाम जाफ़र सादिक़ (अ0)

हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (अ) हज़रत इमाम बाक़िर (अ) के पुत्र आपकी संमानिता माता फातिमा (उम्मे फरवाह) थीं।
आप 17 रबिउल अव्वल मुताबिक़ हज़रत रसूल अकरम (स0) की विलादत के दिन जन्म लाभ किया साले 83 हिजरी और 25 शव्वाल 148 हिजरी ज़हर के ज़रीए शहीद हुए ।
आपकी शहादत के वक़्त उम्रे मुबारक मात्र 65 थी आप मदीना मुनौव्वरह क़बरस्ताने बक़ी में रसूले अकरम (स0) के किनारे मदफून हैं।
आप विभिन्न प्रकार इल्म- व फ़ज़ीलत, फ़िक़ह व हिकमत, ज़ोह्द व पारेसा, सच व न्याय बिचार, नजाबत व बुर्ज़गी, सख़ावत व बाहादुरी में वेनज़ीर और दूलरे गुणावली भी आपके अन्दर वेनज़ीर थें।
मर्हूम शैख़ सदुक़ (रा0) फ़रमाते हैः कि उलमाए किराम हज़रत इमाम ज़ाफ़र सादिक़ (अ) से इतना ज़्यादा रिवायेत बयान की है, कि किसी एक अहले बैत (अ) से इस प्रकार के हदीस बयान नहीं हुई है. और हदीस नक़्ल करने वाले तक़रीबन चार हज़ार के क़रीब पहुचंता है और हर एक हर एक से विश्वास के उपयुक्त है।
अबु हनीफ़ा, (सुन्नी हनफ़ी सम्प्रदाय के एक नेता व रह्बर है) जो इमाम ज़ाफर सादिक़ (अ) के छात्रों में से था. और नेता भी है. लेकिन उन में से कुछ बग़ैर वस्ते के थे. जिन जनता ने इमाम ज़ाफर सादिक़ (अ) से बहुत ज़्यादा इल्म व ज्ञान अर्जन किया है उन इल्म में से शीमी व फ़िज़िक, सितारेह शानासी, मअदान कश्फ़ व इस्तेख़राज करने का तरीक़ा वगैरह यह ज्ञान हज़रत इमाम ज़ाफर सादिक़ (अ) का ज्ञान के एक प्रकार का प्रभाव है।
आप इस क़द्र परायणता, मुत्ताक़ी, व परहेज़गार थे कि आपकी ख़ुराक हर समय के लिए सिरका और ज़ैतून का तेल रहता था, और आपकी पोशाक में बहुत ज़्यादा पैवन्द (जोड़) थे आप इस क़द्र पारेसा थे कि खुद बाग़ में काम करते थे।
आप नमाज़ को बहुत तुलानी करके पढ़ा करते थे. और आपकी नज़र में दोस्त व दुश्मन सब एक जैसे थें। अल्लाह के लिए दीन इस्लाम को बयान करना और इस्लाम व शरीयत के अह्काम को प्रचार व प्रसार करना क़ाबिले बयान नहीं था. आपकी पैरुवी करने वालों को (جعفری) सम्प्रदाय कहा जाता है।

7- इमाम मूसा काज़िम (अ)

हज़रत इमाम मूसा इब्ने जाफ़र (अ) आपका उपाधि काज़िम है, और आपकी माता हामीदह ख़ातून मुसफ्फ़ह है।
आप सात सफ़र रवीवार 128 हिजरी आपने अब्बा के घर में जो मक्के व मदीना के बीच में वाक़े है धरती पर क़दम रख़ा। और 25 रजब सन 183 हिजरी में ज़ालिम व जाबिर हारुन के जेलख़ाने में आप को प्रवेश किया गया और इसी जेलख़ाना में 55 साल की पवित्र उम्र मुबारक में ज़हर से शहीद किया गया। आप के गुस्ल व कफ़न का रसम आपके बेटे हज़रत इमाम रिज़ा (अ) ने अंजाम दिया. अभी जो स्थान है उसी स्थान पर मदफून है।
आप आपने यूग में ज्ञान, फज़्ल, शूजा, में हर एक से अधिक थे, और नेक व ख़ुश सदाचार में वेनज़ीर थे, आपके इल्म हर एक के लिए प्रकाशित व ज़ाहिर है, आपकी बुज़र्गी का स्थान एक ऊंचे स्थान पर था।
अल्लाह की इबादत में इमाम काज़िम (अ) का सिजदा बहुत लम्बा था और आप इस क़द्र गुस्से को पी जाते थे कि आपको (کاظم) कहते थे और इस क़द्र सालेह थे कि आप को (العبدالصالح) कहते थे।
आप विभिन्न प्रकार फ़न में प्रसिद्ध और आपका विभिन्न प्रकार-इल्म समस्त क़रनों में हर एक के इल्म के उपर भारी था. प्रसिद्ध हदीस (بريه) है कि एक इसाई बुज़ुर्ग, जब आपके मुक़ाबिला में पराजय हुआ उस समय वह इसाई इस्लाम क़बूल कर लिया और एक अच्छा मुस्लमानों में खुद को परिवर्तन कर लिया।
आपकी सख़ावत के बारे में कहा जाता हैः कि एक व्यक्ति आप से एक सौ दिर्हम का प्रश्न किया इमाम (अ) उस व्यक्ति के शर्मन्देगी को विरत करने के लिए उसे इल्म व ज्ञान अर्जन करने के लिए हिम्मत बढ़ाई ताकि वह विभिन्न प्रकार ज्ञान अर्जन के बाद आपने को हर एक के सामने ज्ञान प्रकाश करे, ताकि जनता उस्से प्रश्न करे और वह उस प्रश्न का उत्तर दे ताकि जनता उस को दो हज़ार दिर्हम इनाएत करें।
आप क़ुरआन पाठ करने में हर एक से ज़्यादा सूर रख़ते थे, और अल्लाह की ईबादत में गिरिया व ज़ारी में हर एक से ज़्यादा और अल्लाह से भय रखते थे।

8- इमाम रिज़ा (अ)

हज़रत अली इब्ने मूसा रिज़ा (अ) की माता हज़रत नज्मा ख़ातून, आप ग्यारह ज़ीकाद 148 हिजरी मदीना मुनव्वरह में जन्म लाभ किया और आख़री सफ़र 203 हिजरी 55 साल की उम्र में ज़हर से शहीद हूए।
आपका गुस्ल व कफ़न के समस्त प्रकार काम आपके बेटे हज़रत जवाद (अ) ने सम्पादन की आपका मज़ार शरीफ़ शहर मुक़द्दस (मशहद) में उपस्थित है।
आप की ज्ञान व फज़ीलत, नजाबत व सख़ावत, नेक सदाचार व फ़ुरुतनी, इबादत व वन्दगी में प्रसिद्ध थे लेकिन यह बयान करने की कोई ज़रुरत भी नहीं है।
मामून, अब्बासी ख़लीफा दूसरों को धोका देने में प्रसिद्ध व मशहूर था उसने एक सोचे समझे हुए नक़्शे में इमाम (अ) को कई बार फंसाने की कोशिश की. ताकि आप ईस्लामी ख़िलाफ़त को आपने दायित्व पर ले लें लेकिन इमाम (अ) ख़िलाफत की स्थान को क़बूल नहीं किया, क्योंकि आप मामून अब्बासी के धोके से आगाह थे और यही कारण है कि आप ईस्लामी ख़िलाफत को क़बूल नहीं किया। मामून ने कई बार आपको धमकियाँ दीं, ताकि आप ईस्लामी ख़िलाफत को क़बूल कर लें हज़रत रिज़ा (अ) ने इस शर्त के साथ क़बूल करना चाहा कि तुम इस ख़िलाफत में किसी प्रकार का दख़ल नहीं कर सकते इस शर्त के साथ क़बूल करुगाँ।
मामून बदबख़्त हर समय आपकी ज़लील और आपकी हत्या करने के चक्कर में था, कभी क़द्र जलसा रख़ता था और कभी कभी समस्त सम्प्रदायों के आलिम को बुलाता था, और आप से भी आवेदन करता था कि आप भी इस सम्प्रदायक सभा में आऐं आप उस सभा में आकर समस्त प्रकार के धर्मों ईलाही के जनता को ला उत्तर कर देते थे और मामून को पराज्य का पानी चखाते थे।
इमाम रिज़ा (अ) आप हर समय इश्वर की ईबादत में मसरुफ़ रहते थे और रातों को जग जग कर अल्लाह की ईबादत करते थे, हर तीन दिन के बाद एक बार पवित्र क़ुरआन की तिलावत करके समाप्त करते थे, और आप अक्सर रातों में हज़ार हज़ार रिकातें नमाज़ पढ़ा करते थे, कभी क़द्र घटों घटों सिजदा तुलानी करके अल्लाह के साथ राज़ व नियाज़ की बात किया करते थे।
आप बहुत रोज़ा रख़ते थे, सदक़ा, प्रदान, ख़ैरात बख़शिश पिनहानी तौर पर अंजाम दिया करते थे, विशेष करके अंधेरी रातों में गरीब दुखियों जनता की सेवा में पहुंचाँ करते थें।
आप समाज में इतने सदाचार थें कि कभी अपनी ज़बान के माध्यम किसी व्यक्तियों को कष्ट नहीं पहुंचाया, और क़ौल व गुफ़तार में कभी भूल नहीं की अगर किसी एक सभा में आप के चारों तरफ़ जनता रहते तो आप कभी दिवार का सहारा लेकर टेक लगा कर बैठते नहीं थें। और कभी ऊंची ध्वनी साथ बात नहीं किया करते थें और उसी प्रकार हँसा भी करते नहीं थें।
जिस समय ख़ाना ख़ाने का दस्तरख़वान बिछया जाता था. या आप ख़ुरासान शहर में उपस्थित होते थें समस्त गृहों के परिवर को बुलाकर समस्त प्रकार के नौकरों को बुलाकर एक दस्तरख़वान पर ख़ाना ख़ाया करते थें।

9- इमाम मोहम्मद तक़ी (अ)

इमाम मोहम्मद तक़ी (अ) इमाम मूसा रिज़ा (अ) के महान व पवित्र बालक है. माता सबीका ख़ातून. आप 10 रजब 195 हिज़री मदीना शहर पृथ्वी में क़दम रखे. और आख़री ज़िल्क़द 220, 25 साल की उम्र में शहीद प्राप्त हूए। आपका पवित्र जनाज़ा हज़रत मूसा इब्ने जाफर (अ) के निकट जो काजमैन में उपस्थित है।
आप आपने यूग में अधिक से अधिक ज्ञानी, और दान, खैरात, सदाचार ण चरीत्र, और विषेष व्यक्तित्व रखते थें, जब किसी एक में सवार होते थे तो आपने साथ सोने और चांदि की थैली साथ लेते थे ताकि प्रश्न कारी करने वालों को प्रदान करें। जब कोई व्यक्ति प्रश्न करता था, आप 50 दिनार से किसी एक को कम प्रदान नहीं करते थें।
आपकी पवित्र जीवन का एक अजीब घटना यह है कि पवित्र 9 साल कि उम्र में अधिक से अधिक लोग आपके पवित्र सेवा में उपस्थित हो गये और एक हि बैठक में तिस हज़ार से अधिक प्रश्न किया आपने उन समस्त प्रकार प्रश्न का उत्तर विना देरी के प्रदान किया। अलबत्ते यह समस्त प्रकार प्रश्न का उत्तर एक ख़ान्दाने ईलाही के विना कोई दे नही सकता. और आप को उस यूग के ख़लीफा विभिन्न प्रकार का प्रश्न करता था और उसी तरह आप उत्तर भी दिया करते थें।

10- इमाम अली नक़ी (अ)

हज़रत इमाम अलीयून नक़ी (अ) आप इमाम जवाद (अ) के सम्भ्रान्त पुत्र है, आपकी माता समाना ख़ातून हैं. आपने 15 ज़िलहिज्ज या पांच रज़ब सन 212 हिजरी मदीना में क़दम रखा और तिसरी रजब सन 254 हिजरी 42 साल की उम्र में ज़हर से मसमूम हो कर शहरे साम्रा में धरती को अलविदा कहा अभी जो स्थान है उसी स्थान में मदफून है।
आप आपने ज़माने में फज़ीलत, सख़ावत, इल्म, ख़ूश ज़बान, आबिद, और सदाचार में प्रत्येक व्यक्तियों से अधिक व उत्तम थें। (अर्दबेली) आपका एक ख़ुश वाक़्या व सख़ावत के बारे में एक रिवायेत नक़्ल की है। जिस में लिखा है कि एक दिन ख़लीफ़ा-ए ज़मान तीस हज़ार दिर्हम आपकी पवित्र सेवा में भेजा लेकिन आप उस तीस हज़ार दिर्हम को लेकर एक अरब सहरा नशीन को प्रदान करके कहाः यह सभी पैसों को ले लो, और आपने कर्ज़ को पूरा करने के बाद बाक़ी पैसे को आपने परिवार में ख़र्च करना, और कम पैसे होने के कारण मुझे क्षमा करना।
अरब व्यक्ति कहने लगाः ऐ-रसूल (स0) की संतान, हमारी ज़रूरत इस से कम और एक तिहाई है लेकिन इश्वर बेह्तर जानता है कि आपनी रिसालत को किस ख़ान्दान में प्रदान करुँ, उस के बाद अरब व्यक्ति ख़ुशी से सब पैसे को लेकर चल दिया।

11- इमाम हसने असकरी (अ0)

हज़रत इमाम हसने असकरी (अ) आप इमाम अलीयून नक़ी (अ) के पुत्र है, आपकी माता हदीसा ख़ातून. 10 रबिउस सानी जुमअ के दिन 232 हिजरी मदीना में क़दम रखा और 8 रबिउल अव्वल जूमअ के दिन 260 हिजरी 28 उम्र में ज़हर से मसमूम हो कर शहरे सामरा में शहीद हो गये।
आपका गुस्ल व कफ़न का काम आपके पुत्र हज़रत इमाम मह्दी (अ) ने अंजाम दिया और आपने पिता के निकट उसी बार्गाह में दफ़न हुए।
आपकी ज्ञान व फज़ीलत, शर्फ़ व नाजाबत, ईबादत व बूज़ुर्गी, सदाचार व फूरुतनी किसी एक व्यक्तियों से पिनहान नहीं है।
आप कम उम्र में बहुत ख़ूश अख़लाक़ व नूरानी चेहरा व अज़मत के मालिक थें. और अख़लाक़ व सदाचार में रसूल (स0) से बिल्कुल मुशाबेह मिलते जुलते थे। आपके करम के बारे में हज़रत ईसमाईल ने रिवायेत की हैः फ़रमाते है मै एक रास्ते में बैठा था जब आप किनारे से गुज़रने लगे मै ने उनके लिए क़सम ख़ाई और अपनी हाजत को बताया, आपने फ़रमाया अल्लाह के नाम से झूटी क़सम अपनी ज़बान में जारी कर रहे हो. हालाकिं 200 दिर्हम भी छुपाए हो? इसके बाद फ़रमायाः हमारे शान के बिपरीत है कि मैं तुम्हें आपने बख़्शीश से दूर करुँ उस समय आप आपने ग़ुलाम को ईशारा करके फ़रमायाः जो कुछ तुमहारे पास है उस को प्रदान करो ग़ुलाम ने एक सौ दीनार प्रदान किया।
दुसरे व्यक्ति 500 सौ दीनार का नियाज़ प्रकाश किया हलाकि आपका पुत्र भी तीन सौ दीनार का मोहताज था, इससे पहले कि आप के सख़ावत व बख़शिश के बारे में सुना और आपकी पवित्र सेवा में पहुंचा इन लोगों को कहने से पहले आप ग़ुलाम को इशारा किया और उस व्यक्ति को 500 दिर्हम और उस के पुत्र को तीन सौ दिरहम प्रदान किया।
आपकी बुज़र्गी व बख़शिश मात्र मुस्लमान सम्प्रदाय के लिए मह्दूद नहीं थी, बल्कि मुस्लमान के व्यातीत ग़ैर मूस्लमान के लिए भी थे। और यही कारण है कि उस यूग के ईसाई भी गवाही देते थे कि आप फज़ीलत, बुज़ुर्गी व ज्ञानी हमारे मसीह (अ) जैसा है. आप अल्लाह की ईबादत में सब समय रातों को जगा करते थे।

12- इमाम मह्दी (अ)

हज़रत इमाम मह्दी (अ), मोहम्मद इब्नूल हसने असकरी (अ) व आपकी कुन्नियत अबुल कासिम, यानी आपका नाम भी हज़रत रसुल अकरम (स0) के नाम से है, सम्मानिता माता हज़रत नर्जिस ख़ातून, आपने 15 शाबान सन 255 हिजरी पवित्र साम्रा शहर में धरती में क़दम रखा।
हज़रत इमाम मह्दी आख़ेरुज़्ज़मान (अ) इस धरती के लिए शेष हुज़्जते ख़ुदा व पैग़म्मबर (स0) के आख़री जान्शीन और मुसलमान सम्प्रदाय के नेता व इमाम है।
ख़ुदा वन्दे मुलाल अपनी विशेष ईरादे से आप को लम्बी उम्र के साथ ज़िन्दा व परदये ग़ैब, और जनता के दृष्टि से छिपा रखा है. जब आप अएगें तो इस धरती को न्याय परायणता और सदाचार इंसाफ़ के माध्यम इस धरती को परिवर्तन करेगें और विभिन्न प्रकार के अपराध व अमानविय अत्याचार और ज़ु्ल्म व सितम को नीस्त व नाबूद करेगें।
पैग़म्बरे अकरम व अईम्मा-ए अतहार (अ) ने हम को ख़बर दी है कि मह्दी (अ) ज़िन्दा है. ताकि उस दिन ज़हूर फ़रमाकर पूरे विश्व में अपना निर्देश व अदालत से भर देगें व अत्याचार करने वालों को नाबूद करेगें।

ليظهر علی الذين کله ولو کره المشرکون

((ताकि ख़ुदा वन्दे आलम दीन-ईसलाम को अन्य धर्मों पर विजय देगें अगरचे दुश्मन नराज़ केयों ना हों। (21)

اللهم عجل في فرجه و... وأجعلنا من انصاره واعوانه...

ख़ुदाया ज़ल्दी से ज़ल्दी इमामें ज़माना (अ) का ज़हूर फरमा.....व.... हम को उनके वफ़ादार दोस्त व अंसारों में शामिल फ़रमा....))
क्योंकि इमामें ज़माना (अ) ख़ुद आपने घर से पिनहान हो गये, और मुस्लमान हज़रात ने उनके महल्ले ग़ैबत को एक ज़ियारत गाह में परिवर्तन कर दिया है. जो अभी सर्दावे ग़ैबत के नाम से प्रसिद्ध व मश्हूर है।
अगरचे इमामें ज़माना (अ) के गैबत कि अबस्था में शियों पर बहुत सारे दायित्व बनता है. जैसा कि उन को सही पद्धति से पचन्ना, उनकी सलामती व ज़हूर के लिए दोआ व बहुत सारे समस्या में उन से तवस्सुल करना ताकि उनका फ़ैज़ हमारे शामिले हाल हो. इसके व्यतीत बहुत सारे दायित्वों है लेकिन यहाँ वर्णना करना गुन्जाईश के बाहर है।

5- क़्यामत

इंसानों को अनंत जीवन के लिए वापस जाना है

हक़ीक़त में इंसान मृत के बाद समाप्त नहीं होते, बल्कि इंसान एक धरती से दूसरी धरती में प्रवेश करते है. और हर एक अपना अपना कृत्यों कर्मों का या किये हुए दुष्चरीत्र कर्मों का मज़ा चखेंगे. समस्त प्रकार धर्मों ईलाही व आसमानी सम्प्रदायों ने इस चीज़ को बयान किया है. और समस्त सम्प्रदाय व धर्मों ईलाही इस वपास जाने का अमंत्रण भी किया है। क़्यामत पर यक़ीन भी रखा है. समस्त प्रकार अम्बिया-ए ईलाही इस कथा पर ताकीद व गुरुत्व भी दिया है। कि यह अज़ीब व गरीब धरती मात्र बेहूदा ख़लक़ नहीं हुई है बल्कि इस धरती से जाने के बाद समस्त प्रकार कृत्यों कर्मों का आमाल नामे का ख़ाता उस धरती में जांच-पड़ताल किया जाएगा।
और उस चाँच-परताल के मुताबिक़ अच्छे अमल का सवाब और दुष्चरीत्र का अमल का (अज़ाब) मज़ा चखना पढ़ेगा। ख़ुदा वन्दे आलम क़ुरआन मजीद में फ़रमाया हैः कि (क्या तुम सोचे हो मैं ने तुम को बिहूदा खल्क़ किया हूँ. किया तुम्हें हमारे निकट आना नहीं है?)) (22) क़्यामत को प्रमाण करना मात्र ईलाही धर्मों के मुक़ाबिल में ताअब्बुद व तसलीम होना नहीं है. बल्कि समस्त अक़्ल व अल्लाह की हिकमत व अदालत को क़बूल करने की बुनियाद पर है। और यह बात सही तरीके पर स्पष्ट है. और समस्त अक़ीदा ग्रन्थों में तफ्सील के साथ ज़िक्र हुआ है। याद दिलाना आबश्यक है कि हम क़्यामत व ख़ुदाये हकीम, आलिम, अदिल, को क़बूल करने के बाद तहक़ीक़ पर्या लोचन करें।

मौत के बाद बर्ज़ख़ की धरती

बर्ज़ख़ की धरती के बारे में पवित्र क़ुरआन मजीद में ईर्साद हैः कि जिस दिन समस्त प्रकार लोगों को उठाया जायेगा। (23) मरने के बाद बर्ज़ख़, क़ब्र की धरती है उस क़ब्र में प्रत्येक प्रकार इंसान से सार के तौर पर अपनी धरती की कृत्वियों व दुष्चरीत्रों अचार पर व यक़ीन के सम्प्रर्क प्रश्न किया जाये गा. उसके बाद हर प्रश्न और उसके उत्तर के मुताबिक़ उस को स्थान प्रदान किया जाये गा।
इस संमधं में हज़रत रसूले अकरम (स0) फ़रमाते हैः क़ब्र एक बागीचा का नाम है या स्वर्ग का एक बागिचा या नर्क का एक गड्ढा है। लेकिन ज़िन्दा व्यक्ति उस चीज़ को अनुभव कर नहीं पा रहे हैं, जैसे कि एक व्यक्ति सो रहा हो और एक अच्छा सप्ना देख रहा हो खुशी की आबस्था में, या एक सप्ना देख रहा हो बडे कष्ट अबस्था में, वह जो परेशानी में है. लेकिन उस के चारों तरफ की लोग उस चीज़ को अनुभव कर नहीं पा रहे है. लेकिन यही उदाहरण पूरी तरह स्पष्ट व बयान कर रहा है कि जीवित व्यक्ति किस तरह, एक जिस्मे ख़ुश्क व बी हरकत मुर्दे को देखे. लेकिन ख़ुशी व नाराहती व अज़ाब को दर्क कर नहीं पा रहे है।

क़्यामत व आख़ेरत की धरती

क़्यामत एक ऐसी चीज़ है किः समस्त प्रकार ज़मीन व धरती आसमान दर्हम-बर्हम व बिगड़ जाने के बाद समस्त मुर्दे इंसान हर एक अपनी अपनी क़ब्र से ज़िन्दा होगें. और हर एक जगह जमा होगें. व अल्लाह के एक अज़ीम हाई कोट में उपस्थित होगें और उस हाई कोट की मिअर पैग़म्बाराने ईलाही, इमाम मासूमीन (अ) व नेक व सदाचार काम करने वालें व्य्कती होगें, और हर आदमी का कृत्य कर्मों का आमाल नामे का ख़ाता उस के हाथ में दिया जाये गा। और सभी का अमल नामा का गवाही सभी का अमल ही बताये गा। सार के तौर पर जो व्यक्ति धरती में अच्छा अमल किये होंगे वह विजय प्राप्त होगें और जो व्यक्ति धरती में दुष्चरीत्र और बद अमल किये होंगे वह समस्या व मोसीबतों में गिरफ्तार होगें..... इस कथा से स्पष्ट होता है कि हमें धरती में कौन सा काम करना चाहिए, या कौन सा काम नहीं करना चाहिए हमारे लिए उचित यह है कि आपने को उस दिन के लिए तैयार करना और अपनी शक्ति भर अच्छे काम करना ताकि उस दिन किसी प्रकार के समस्या या गिरफ्तार में फँस न जायें। क्योंकि क़्यामत अनंत जीवन के लिए है. और उस से छुटकारा पाने का कोई रास्ता नहीं है और वह अज़ाब हर समय व अतंत जीवन के लिए निर्धारित है....।

(فمن يعمل مثقال ذرة خيراً يره و من يعمل مثقال ذرة شراً يره)

यानी जो व्यक्ति एक ज़र्रह बराबर अच्छा काम अंजाम देगा उस को अच्छा पुरुष्कार मिलेगा और जो व्यक्ति ज़र्रह बराबर ख़राब काम अंजाम देगा उस का शास्ति भोगनी पढ़ेगी।


1. वह विधान. व तरीका जो इंसानों को पृथ्वी व स्वर्ग में विजयी दिलाते है, उस से इसलाम कहलाते है।
2. सूरऐ ज़ारियात आयत 56.
3. सूरऐ मुल्क आयत नम्बंर 2.
4. सूरऐ अनआम आयत नम्बंर 165.
5. सूरऐ आले ईमरान, आयत नम्बंर 85।
6. सूरऐ अल्क़ः आयत नम्बंर 1-5
7. सूरऐ शूआरा, आयत नम्बंर 214
8. सूरऐ हिजर आयत नम्बंर 95.
9. सूरऐ मायेदा आयत नम्बंर 3.
10. इस बिषय के सम्पर्क मे बेशि जानने के लिये पैगम्बर अकराम (साः) कि ज़िन्दगी नामा मुराज़े करें, जिल्द-2 आयतुल्लह अल उज़मा सैय्द मूहम्मद इब्ने माहदि हूसैन शिराज़ी.
11. सूरऐ फूस्सिलातः आयत नम्बंर 42.
12. सूरऐ आर्सा आयत नम्बंर 9.
13. सूरऐ हिज़र आयत नम्बंर 9.
14. पृथ्बीके उदाहरण ज़ापान और ईराक़ के संबधं मे कहा जाता हैः कि यह दोनों देश इक़्तेसाद कि लिहाज़ से बहुत पीछे थें और दोनों इक़्तेसादि लिहाज़ से समान अधिकार के मालिक थें, लेकिन एक ज़माने के बाद ज़ापान इक़्तेसाद कि पृथ्बी में बहुत चेष्टा कि और ईराक़ को छोड़ कर अग्रसर कि। और ईराक़ ऐसा कि ऐसा पड़ा रहा हत्ता एक सुई भी बनाने में कामियाबि हासिल नहीं कि, राजनैतिक दलों ने ज़ापान की रह्बरि को बड़ि शक्ति व ताक़तवर व अक़्ल मन्द समझा, और ईराक़ कि रह्बरी को बेवक़ुफ़, नतिजे मे पृथ्बी कि उदाहरण यह है और इस से आखरत कि उदाहरण सम्पूर्ण तरीके से परिष्कार व स्पष्ट हो जाता है, क्योंकि पैग़म्बर अकराम (साः) ने फरमाया हैः कि) من لا معاش له لا معاد له) यानिः पृथ्बी कि बदबख़्ति आखरत कि बदबख़्ति को शामिल कर लेती है।. और हज़रत फातिमा ज़हरा (अः) ने फरमाया हैः किः (( अगर हज़रत अलि (अः) के अधिकार को छीन न लेता पृथ्बी में दो व्याक़्ति के दर्मियान सम्पर्क में इख़्तिलाफ़ ना होता))
15. सूरऐ मायेदा आयेत नम्बंर 67
16. सूरऐ मायेदा आयेत नम्बंर 3
17. सूरए निसा अयात नम्बंर 86.
18. वलीद ईब्ने अब्दुल मल्क और उसके भाई ईब्ने हिशाम ख़लीफायें बनी अब्बास के निर्देश से शहीद हो गये।
19. हमारे अइम्मह मासूमीन (अः) हर एक अपने अपने ज़माने मे सख़्त समस्या में गिरफ्तार थे, क्योंकि ख़लीफ़ा-ए बनी उमैया और बनी अब्बास इस्लाम की ख़िलाफत को ग़स्ब करके लोगों पर शक्ति व क़ुदरत के साथ हुकूमत करते थे। और लोगों को ख़ान्दाने रिसालत व आहले बैत व आईम्मा ए अतहार (अः) से दूर रख़ते थे। हमारे इमाम (अः) के पास लोगों के दर्मियान अबस्थान के बावजुद मुराजे करने वाला बहुत कम थे और यही कारण है कि हमारे आईम्मा (अः) ज़्यादा से ज़्यादा समय अल्लह की ईबादत में मशगूल रहते थे।
दूसरी तरफ इमाम (अः) की उलूमे मआरिफ़ एक ...... थी, जो अल्लाह के निर्देश से हर अपने अपने पिता से क़बूल करते थे। जिसकी बिना पर पढ़ना और तहक़ीक़ की ज़रुरत नहीं पड़ती थी, लिहज़ा ईस वक्त को ग़नीमत समझकर अल्लाह के साथ राज़ व नियाज़ की बात करते थे, कुरआन व नमाज़ मे मशगूल रहते थे।
20. ईब्राहीम इब्ने वलीद के आदेश से जो ख़ोलफाये बनी मरवान में से है।
21. सूरए साफ़ आयत नम्बंर 9
22. सूरए मुमिनूनः आयत नम्बंर 115
23. सूरए मुमेंनुन आयत नम्बंर 115