शिय़ों पर मिथ्यारांप

 

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भूमीका

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मोहर पर सजदह करना

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इमामबाड़ा और ज़रीह निर्माण करना

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औलियाओं के मज़ारों को ख़ूबसूरत निर्माण करना

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ज़रीह का चूमना

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औलिया ख़ुदा से (साधना) सहायता मागंना

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क़ब्र की ज़्यारत (दर्शन) करना

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महिला के साथ मुतआ (विवाह) करना

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पूस्तक परीचित



بسم الله الرحمن الرحیم

पैग़म्बर अकरम (स.अ.) ने इर्शाद फ़रमाया हैं

يا علي ، أنت و شيعتک هم الفائزون يوم القيامة(1).

ऐ अली तुम और तुमहारे शिआ, क़्यामत के दिन विजय हो।

भूमीका

समस्त प्रकार प्रसंसा उस पालने वाले के लिये मख़सूस है, जो इस पृथ्वी को सृष्ट किया है. और उस ख़ालिक पर दरुद व सलाम, जो इंसानों को अपना कार्य का प्रतिकार देने वाला और इस के साथ साथ होशियार वाणी उच्चारण करने वाला है। और हमारे पथ प्रदर्शक के चिराग़ व महान नेता हज़रत मोहम्मद (सा0) व ख़ान्दाने पाक मासूमीन (अ0) उन के दुश्मनों पर अल्लाह के ग़ज़ब नाज़िल हो ( विशुमार)।
मात्र एक सम्प्रदाय ऐसे है, की जिस की अक़ीदा और विश्वास सही व सठिक हिसाब से माना जाता है लेकिन दुःख़ के साथ कहना पढ़ता है कि हम सब अपनी हक़ीक़त को प्रचार करने से इस पृथ्वी के समाज से अधिक दूर है. यह व्यतीत शिया के निकट इत्नी शक्ति भी है कि अपना शक्ति और दलील व प्रमाण के माध्यम, अक़ली, नक़्ली, मन्तेक़ी व्यतीत जिस के मन और दिल में रोग-व्यधी और पथभ्रष्ट विश्वास उपस्थित है उन व्यक्ति के व्यतीत समस्त प्रकार व्यक्ति इस हक़ीक़त को क़बूल करते है। लेकिन बड़े दुःख़ और हज़ारों अफ़सुस के साथ कहना पढ़ता है कि इस तरह के समय हमारे शक्ति से बहुत दूर है. इस का मूल कारण यह है कि पथभ्रष्ट चिन्ता और उन के प्रचार हमारे ऊपर अधिक से अधिक प्रभाव किया है, जिस में से एक हत्यकाडं, हत्या, कुफ़्र, सख़्ती, और अपर सम्प्रदाय को क़बूल ना-करने का मूल कारण है. और ऐसे व्यक्तियों ने इस्लाम से बहुत दुरी का रास्ता निर्वाचन किया है. और अपने पथभ्रष्ट विश्वास-अक़ीदा को यक़ीनी विश्वास पर परिवर्तन कर रहा है, इस्लाम एक ऐसा सम्प्रदाय और धर्म है कि इस धर्म में मुहब्बत, प्रेम, ममता, प्रेती, नर्मी, मेंहेर्वानी, पेशक़द्मी अपर सम्प्रदाय से बहुत आगे है.
इस परीस्थिथी में उम्मते इस्लामी के लिये अधिक से अधिक ज़रुरी है कि अपनी हक़्कानियत को प्रमाण करे, जैसा कि रसूल ख़ुदा (साः) ने हज़रत अली (अ0) के संम्बधित इर्शाद फरमाया है।(2)

(علی مع ا لحق والحق مع العلی)

(अली सच्छे के साथ है और सच्छे अली के साथ है ( और सब समय सच्छे अली के साथ है) कहीं भी अली हो हक़ वहाँ वहाँ है) मुहक्क़ बहरानी।(3) और यह भि फ़रमाया हैः

يا علي ، أنت و شيعتک هم الفائزون يوم القيامة.

पैग़म्बरे अकरम (साः) ने फ़रमाया हैः
ए-अली तुम और तुमहारे शिया, क़्यामत के दिन कामीयाबी में हो। (4)
सब समय के लिये हक़ अली के साथ है, हमें इस विषय को भूलना नहीं चाहिए कि कुछ मुसलमान ऐसे है कि वहाबी के साथ साथ मिल जुल कर अपना इसलाम-धर्म के विपरीत विप्लब-इंक़्लाब का काम कर रहै है। और ऐसे ऐसे काम कर रहै है कि समस्त प्रकार शिया के चेहरा को बदनाम करके रख़ा है जो शिया पृथ्वी के मुस्लमानों में से अधा मुस्लमान शिया है, जिन व्यक्तियों पर एक झूटी अपवाद व अपमान दिया जा रहा है और दे भी रहा है।
ऐसे व्याक्ति के सम्पर्क ख़ुदा बन्दे आलम क़ुरआन मजीद में ऐसे जनता को ख़िताब करते हूए इर्शाद फ़रमा रहा हैः कि अपनी अक्ल़ को मन्तेक़ी के साथ, और दलील व प्रमाण को अपना अक़ीदा व विश्वास के साथ, प्रमाण करों, और इस चीज़ के लिये अल्लाह ने भी अमंत्रण भी दि हैः इर्शाद होता हैः कि

(قل هاتوا برهانکم إن کنتم صادقين)

ए- रसूल कह दोः तुम सब अपनी अपनी दलील व प्रमाण- को ले आओ (या उपस्थित करो)।(5)
अपर तरफ़ ऐसे व्यक्ति उपस्थित है कि जो इस्लाम के ज़रुरत को ना-जानने पर विशेष करके तफ़्सीर की झान, हदीस, अतित इतिहास, और इमाम मासुमान व पैग़म्बरे अकरम (साः) के पवित्र जीवन पर सठिक परिचय न रख़ने पर एक नई नई फ़िक्र व विश्वास सृष्ट कर रहे है।
लिहज़ा हम सब के लिये ज़रुरी है या इसलामी समाज के लिये अपने धर्म को पथभ्रष्ट व्यक्तियों से संरक्षण और आमान में रख़ने के लिये अपनी शक्ति भर जान-प्राण व चिन्ता के माध्यम ऐसे व्यक्तियों को पर्वरिश करे ताकि किसी क़िस्म के पथ भ्रष्ट और गुमराही के शिकार न-हो. जैसा कि ख़ुदा बन्दे आलम इर्शाद फ़रमाते है किः

(...وجدلهم بالتي هی أحسن...)

(ए रसूल) अप अपने पर्वरदिगार के पथ की तरफ़ आमंत्रण प्रदान करे ज्ञान व उत्तम निर्देश के माध्यम, और उन व्यक्तियों के साथ उत्तम पद्धती के साथ मुनाज़रा व पर्या लोचन करें।(6) (और सब समय के लिये जई हो कर मैदान से लौट आएं)
अल बत्ते यह समस्त प्रकार संस्कृत महोल का सृष्ट व निर्मान करना और जन साधारण व्यक्तियों को फिक्र को परिवर्तन करना उन व्यक्तियों का कार्य-काम है जो इस्लाम और सठिक हक़ को संरक्षण करने के लिये दायित्व पर (या निभाते) है। अर्थात यह सब पवित्र अक़ीदा व विश्वास हज़रत मोहम्मद (साः) व उन के पवित्र ख़ान्दान उन महान व्यक्तियों पर दायित्व है, अल्लाह के दरुद व सलाम उन महान व्यक्तियों पर जो इन तमाम प्रकार कठिन दायित्व और समस्या को अपने काधें पर लिये हूए है, ताकि सही व सठिक अक़ीदा और हक़ाएक़ को अपनी प्रीय उम्मत-मुसलमान के लिये विबरण प्रदान करे।
अपर तरफ़ दूसरी उम्मत व सम्प्रदाय के लिये उचित है कि अपने समस्त प्रकार चेष्टा व प्रचेष्टा को शिया कि हक़ीक़त और उन के विश्वास को जानने के लिये जान-प्राण दे कर चेष्टा करे तो इस अबस्था में एक व्यक्ति के लिये संम्भब हो सकता है कि शिया की अक़ीदा और विश्वास मात्र पैगम्बरे अकरम (साः) और उन के ख़ान्दाने पाक अहले बैत (अः) पाक से मिरास के तौर पर आया है। और यही विश्वास व अक़ीदा इंसान के गुणावली में साज़गार व मुनासिब है । ख़ुदा बन्दे आलम ने भी अपने सृष्ठ बन्दा के लिये पछन्द भी किया है।
जो पूस्तक अपके हाथ मे उपस्थित है, यह पूस्तक (हक़ाइके़ अनिशे शिया) का एक तर्जूमा है, जो ख़ूब सूरत और गभींर ज्ञान के साथ बयान किया गया है, लेकिन यह पूस्तक संक्षिप्त के तौर पर है और इस पूस्तक में चेष्टा किया गया है. कि कुछ बातिल सम्प्रदाय जो शिया पर झूटी तोहमत व अपबाद जो शिया के ऊपर मिथ्यारांप (आरोप) किया है (इस पूस्तक में चेष्ट कि गई है) कि सठिक दलील और प्रमाण के माध्यम उस अपवाद व अपमान वाला प्रश्वों को विबरण के साथ उत्तम तरीके से व्यख्या प्रदान किया जाये।
हमारे मुल्यवान ग्रन्थकार व प्रसिद्ध मर्जाए तक़लीद हज़रत आयातुल्लह अल् उज़मा सैय्यद सादिक़ शीराज़ि इस पूस्तक में बढ़े चिन्चा और पुरी कोशिश के साथ पूस्तक में पर्या लोचन किया है और सरल भाषा में तफ़सीर के साथ व्यख्या दी है. ताकि प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक स्तर के ज्ञानार्जन करने वाले जनता इस पूस्तक को पढ़ कर अधिक से अधिक झान अर्जन कर सके और अपनी जीवन को सही तरीके से सवांर कर फ़ायदा अर्जन कर सके।
इस पूस्तक को लिख़ते के काल प्रत्येक प्रकार के पाठ करने वालें के कष्ट और तक़लीफ़ को दूर रख़ा गया है. ताकि वह सब व्यक्तियों अध्ययन करते के काल अपना कष्ट अनुभव न कर सके। बल्कि अपनी हक़ीक़ति ज्ञान को इस पूस्तक में अपना प्रमाण और दलील को एक मूल केन्द्र क़रार दे कर अपने पाठ करने वालों के लिये एक हदिया व पुरचकार उन की सेवा मे प्रदान किया है और यह पूस्तक इस कद्र प्रसिद्ध अर्जन किया है कि मालुम नही कि कितमी बार मुद्रित हूई है।(7)
इस पूस्तक के अख़िर मूल्यवान कई पूस्तकों का नाम जो शिया धर्म सम्पर्कित में है. और प्रसिद्ध सून्नी सम्पर्दाय के नाम जो हज़रात शिया धर्म को क़बूल किया है यहाँ मात्र उनके परीचय और सठिक राह को पहचाना है. इस लिये बयान किया गया है।
अपने ख़ुदा बन्दे आलम से आशा व्यक्त कर रहा हूँ कि वह हमारे समस्त प्रकार चेष्ठा और कोशिश को क़बूल करके इमामे ज़माना (अः) को जल्द से जल्द ज़हूर फ़रमायें ताकि हम सब उनके आसहाब और अनसार में शामिल हो सकें और उनके सहायता करने पर हमको मदद करें ।

ان شاء الله تعالى

नाशिर
वास सलाम

 

मोहर पर सजदह करना

सामीः अली, तुम सब शीया क़ौम गीली मिट्टी को सुख़ा कर उस पर सजदह करते हो और यह काम शिर्क है. इस तरह से ईश्वर के व्यतीत अपर चिज़ की भी ईबादत करते हो।
अलीः अगर निर्देश देते हो तो मै तुम से एक प्रश्न करुँ।
सामीः पूछो
अलीः किया अल्लाह (के शरीर) पर सजदह करना सठिक है।
सामीः तुम्हारा यह कहना कुफ़्र है, क्योंकि अल्लाह का कोई शरीर नहीं, और न आखों से उस को देखा जा सकता है और न उस को हाथ द्बारा स्पष्ट किया जा सकता है। जो व्यक्ति विश्वास करता हो कि अल्लाह का शरीर है बिना संदेह के वह काफ़िर है और सजदह तो फक़त अल्लाह के लिये हो सकता है, अल्लाह पर नही क्योंकि सजदह का मक़्सद अल्लाह के सामने ख़ुज़ू व ख़ुशू के साथ उपस्थित होना है।
अलीः तुम्हारी कथाएं से यह पता चल रहा है कि सजदहगाह पर हमारा सजदह करना शिर्क नहीं है, क्योंकि सजदहगाह को ख़ुदा जान कर उस पर सजदह नहीं किया जा रहा है बल्कि उस मिट्टी के बने हुए सजदहगाह के माध्यम से ख़ुदा को सजदह किया जा रहा है।
फर्ज़ करें अगर ऐसा समझ रहे हैं तो-नउज़ो बिल्लाह सजदहगाह खुदा है, और अल्लाह से हट के उस को सजदह किया जा रहा है। क्योंकि सजदह करने वाला, अल्लाह के लिये सजदह नही कर रहा है बल्कि उस सजदहगाह को सजदह कर रहा है।
सामीः यह प्रथम बार है जो मै ऐसी बाते सुन रहा हूँ, अगर तुम सब सजदहगाह को अल्लाह समझते होते तो निश्चित तौर पर उस सजदहगाह पर सजदह न करते और उस पर अपनी पेशानी न रख़ते, लिहज़ा यहाँ प्रमाण हो रहा है कि तुम सब सजदहगाह को खुदा नहीं जानते।
उस समय सामी ने अली से कहाः अगर निर्देश हो तो मै तुम से एक प्रश्न और करूँ।
अलीः ज़रूर पुछो,
सामीः क्यों तुम लोग सजदहगाह ही पर सजदह करते हो दूसरी चीज़ों पर नही १
अलीः सच तो यह है कि इस विषय पर मुसलमानों का एक नज़रिया है, कि रसूले खुदा (स.अ.) ने इस के समन्धं ईरशाद फरमायाः

جعلت لي الأرض مسجداً و طهوراً؛

हमारे लिये ज़मीन (सजदहगाह) को पाक और पवित्र क़रार दिया गया है।(8)
इस बिनापर पर, ख़ालिस मिट्टी पर सजदह करना यक़ीनन जाएज़ और सारे इसलामी सम्प्रदाय़ इस विषय पर एक नज़रिया रख़ते हैं। इस नज़रिये के अनुसार ख़ालिस मिट्टी पर सजदह करना जाएज़ और क़ाबिले क़ुबूल है, यही कारण है कि हम सब ख़ालिस मिट्टी पर सजदह करते है।
सामीः समस्क प्रकार मुसलमानों का नज़रिया मिट्टी पर सजदह करना किस तरह हासिल हुआ है१
अलीः जिस समय हज़रत रसूले ख़ुदा (स.अ.) ने पवित्र मदीना शहर में प्रवेश करके वहां मस्जिद बनाई, किया उस समय मस्जिद में फ़र्श या चटाई जैसी कोई चीज़ थी१
सामीः नही, उस समय तो मस्जिद में कोई चीज़ नहीं थी।
अलीः रसूले अकरम (स.अ.) के बाद मुसलमान किस पर सजदह करते थें १
सामीः ज़मीन पर,
अलीः इस से पता चला कि पैग़म्बरे अकरम (स.अ.) ज़मीन पर नमाज़ पढ़ा करते थें, और मिट्टी पर सजदह किया करते थें. और उस समय के मुसलमान भी पैग़म्बरे अकरम (स.अ.) की तरह मिट्टी पर सजदह किया करते थें। इस तरह से मानना पड़ेगा कि मिट्टी पर सजदह करना बिल्कुल सही है इसी लिए हम सब पैग़म्बरे अकरम (स.अ.) की पैरुवी व अनुसरण करते हुए मिट्टी पर सजदह करते है, मानो यह बात हम यक़ीन से कह सकते हैं कि हमारी नमाज़ें बिल्कुल सही हैं।
सामीः क्यों तुम (शीया) सजदहगाह को अपने साथ रख़ते हो और इसके अलावा किसी और चीज़ पर सजदह नहीं करते १
अलीः तुमहारे इस प्रश्न का हमारे पास दो उत्तर हैः
1- हदीस के मुताबिक़ शीया ज़मीन से उगने और निकलने वाली (खाने और पहनने वाली चीज़ों के अलावा) चीज़ों पर चाहे वह मिट्टी हो या पत्थर या पत्ते, इन चीज़ों पर सजदह करना जाएज़ और सही समझते हैं।
2- सजदह करने की जगह का पाक और पवित्र होना ज़रूरी है वरना अपवित्र ज़मीन या मिट्टी पर सजदह करने से नमाज़ सही नहीं होगी. इसलिए शीया गीली मिट्टी को सुखा कर अपने साथ रखते हैं ताकि यक़ीन के साथ अपनी नमाज़ को सही तरीक़े से अदा कर सकें।
सामीः जब पाक मिट्टी और ख़ालिस ज़मीन पर सजदह करने का हुक्म है तो अपने साथ गीली मिट्टी क्यों नहीं रखते१
अलीः जहां तक अपने साथ गीली मिट्टी रख़ने का प्रश्न है वह इस लिए कि अपना कपड़ा ख़राब न हो।
दूसरी बात यह कि गीली मिट्टी को सुख़ा कर उस पर सजदह करना, अल्लाह के दर्बार में खुज़ु और खुसु की पहचान है। क्योंकि सजदह, ख़ुजु का स्थान है और मात्र अल्लाह के लिए सजदह करना जाएज़ है, इस बुनियाद पर अगर अल्लाह के सामने सजदह करने का उद्देश्व खुज़ु है और जिस चीज़ पर सजदह किया जारहा है वह भी खुजु है और सजदह जितना ख़ुजु और खुशु के साथ हो उतना उत्तम है।
इसी वजह से मुस्तहब है कि सजदह करने की जगह को नीचे होना चाहिए(9) अगर इस तरतीब के साथ सजदह किया जाए तो अल्लाह के सामने ख़ुज़ु और ख़ुशू बढ़ता है और इस के साथ साथ और मुस्तहब भी है कि सजदह की अबस्था में अपनी नाक को मिट्टी पर मला जाए जिस से अपने को अल्लाह के सामने बेशी से बेशी हक़ीर व नातवां जाहिर किया जा सके, लिहज़ा गीली मिट्टी को सुख़ा कर उस पर सजदह करना जाएज़ और सही है क्योंकि इस अबस्था में अपनी पेशानी को मिट्टी पर मला जाता है जिस से अल्लाह और उसकी अज़्मत के सामने अपने को एक हक़ीर व ज़लील समझा जाता है।
इस अबस्था में अगर कोई व्यक्ति सजदह करे, और अपनी पेशानी को फर्श, जा-नमाज़ या उससे भी क़ीमती चीजों पर रखे जैसे चांदी, सोना, अक़ीक़, या उससे भी बेशी क़ीमती चीज़ पर तो अल्लाह की अज़मत के सामने अपनी ज़लालत और हक़ारत का अनुभब नही होता१ इस बुनियाद पर जो बातें कही गई हैं किया उस चीज़ पर अल्लाह के लिए सजदह करना जिस से ख़ुज़ु व ख़ुशु में इज़ाफा होता है किया शिर्क व कुफ्र है १ और उस चीज़ पर सजदह करना जिस से ख़ुजु व ख़ुशु में कमी होती है किया उस के द्बारा अल्लाह को ख़ुश किया जा सकता है१
सामीः सजदहगाह पर कोई नक़्श या लिख़ी हुई चीज़ का किया हुक्म है१
अलीः हर सजदहगाह पर लिख़ा नहीं होता बल्कि कुछ सजदहगाह ऐसे होते हैं जिस पर कुछ लिख़ा होता है जिस से पता चलता है कि यह सजदहगाह पवित्र कर्रबला कि मिट्टी से बना हुआ है(10) आपकी नज़र में किया यह काम शिर्क है१
सामीः जो सजदहगाह कर्बला की मिट्टी से बनी है उस में कौन सी ख़ूबी और किया फज़ीलत है जिस पर तमाम शीया विश्वाश और यक़ीन के साथ उस पर सजदह करते है१
अलीः इस के लिए एक हदीस है जिस हदास में ईर्शाद होता है किः

السجود علی تربة الحسين (ع) يخرق الحجب السبع؛

तुरबते इमाम हूसैन (अः) पर सजदह करना सातों आसमान के परदों को हटा देता है।(11)
इस हदीस का मतलब यह है कि कर्बला की मिट्टी पर सजदह करने से नमाज़ क़ूबूल होती है और उस नमाज़ की फज़ीलत आसमान पर चली जाती है, इस लिए इस मिट्टी की एक विशेष ख़ूबी है जो दूसरी मिट्टी में नही है।
सामीः किया इमाम हूसैन (अ.स.) के तुरबते पाक पर सजदह करने से बातिल नमाज़ भी अल्लाह के निकट क़ुबूल हो जाती है१
अलीः शीया के धर्म शास्त्र (फिक़्ह) में है कि जो नमाज़ सही शर्तों के साथ न हो वह नमाज़ बातिल और वह अल्लाह के यहां क़ाबिले क़ुबूल नहीं है, लेकिन जो नमाज़ समस्त प्रकार शर्तों के साथ हो वह नमाज़ अल्लाह के निकट मक़बूल है। और उस का सवाब भी मिलेगा लेकिन जो नमाज़ मक़बूल न हो उस नमाज़ का सवाब नहीं मिलेगा लेकिन जो नमाज़ सही शर्तों के साथ और इमाम हूसैन (अः) के तुर्बत पर पढ़ी जाए वह क़ाबिले क़बूल और उस का सवाब भी बेशी है इसी लिए नमाज़ का क़बूल होना अन्य विषय है, और सही होने का अन्य विषय और है।
सामीः किया सर ज़मीने कर्बला मक्का और मदीना से विशेष स्थान रखता है जिसके कारण उस पर सजदह करना बहुत बेशी फज़ीलत और सवाब रख़ता है१
अलीः तुमहारे कहने का किया मतलब है१
सामीः किया सर ज़मीने मक्का आदम (अ.स.) के नाज़िल होने से पवित्र स्थल बना और मदीना जो रसूल खुदा (स.अ.) का पवित्र क़दमों से मुबारक बना, किया तुमहारी नज़र में मक्का और मदीना का विशेष मक़ाम कर्बला से कम है१ किया हूसैन इब्ने अली रसुले ख़ुदा (स.अ.) से बड़े और सम्मान में बिशेष स्थान रखते हैं१ यह अश्चर्य का विषय है !
अलीः ना, इस तरह नहीं है. इमाम हूसैन (अ.स.) का मक़ाम, महानता (अज़मत) और (शराफत) हज़रत रसूले खुदा (स.अ.) से है, और यही कारण है कि इमाम हूसैन (अ.स.) अपने नाना रसूले ख़ुदा (स.अ.) के दीन (इसलाम) की संरक्षण करने के लिए शहीद किए गए, वरना इमाम हूसैन (अ.स.) का मान-सम्मान हज़रत रसूले खुदा (स.अ.) के सम्मान और इज़्ज़त का एक हिस्सा है। इस के अलावा इमाम हुसैन (अ.स.) ने अपने नाना के दीन की संरक्षन के लिए अपनी क़ुरबानी के साथ साथ अपने साथियों, भाई, भतीजों और दूसरे रिश्तेदारों की क़ुरबानी दी यहां तक कि औरतों का असीर होना भी गवारा किया जिस के माध्यम से दीने इसलाम को मज़बूती मिली, इस्लाम को तो यज़ीद ने मिटाने की ठान ली थी और अगर कहीं इमाम हुसैन (अ.स.) ने क़ुरबानी न दी होती तो आज इस्लाम का नाम व निशान भी न होता यानी आप ने क़ुरबानी दी तो दीने इसलाम बचा, जिस की वजह से आप अल्लाह की तरफ़ से तीन चिज़ों को विशेष सम्मान का अधिकार प्राप्त है और वह यह है किः ( जिस को तरतीब के साथ बयान किया जा रहा है)।
1-अगर कोई व्यक्ति इमाम हूसैन (अ.स.) के मज़ारे शरीफ़ पर प्रार्थना करे तो उसकी प्रार्थना ज़रूर क़ुबूल होगी।
2-समस्त प्रकार सम्मान इमाम (अ.स.) आप के पबित्र नस्ल से है।
3- समस्त प्रकार दर्दों और व्यधीयों की दवाएं आप के तुर्बते पाक में अल्लाह ने शेफ़ा क़रार दिया है(12). इस बुनियाद पर ख़ुदा बन्दे आलम ने आप को एक अज़मत और इज़्ज़त का बिशेष स्थान प्रदान किया है, क्योंकि आप पबित्र दीने इसलाम को संरक्षण करने के लिये अल्लाह के राह में शहीद हो गए. बालक-बालिका और पूत्र पूत्री असीर हो गएं और आपके यावर व नासिर यूद्ध के मैदान में शहीद हो गए, एक जुमले में कहना काफी है, कि आप इसलाम को संरक्षण करने के लिये हर मुशकिल और मसाएब को बर्दाश्त कि, इस तरह तमाम प्रकार मूसिबतों-असहायों को सह करने के बाद आपकि तुर्बते पाक और आपके मक़ाम व फज़िलत में बाधा सृष्ट देख रहे हो१ या तुर्बते कर्रबला को एक स्थान प्रदान करना और दूसरी सर ज़मीन से इज्ज़तदार समझना, उधारण के तौर पर मदीना, इस का माना ये है कि इमाम हूसैन (अ.स.) को हज़रत रसूल (स.अ.) से बड़ा समझना है १ ये विषय सम्पूर्ण तरीके से उल्टा है. इमाम हूसैन (अ.स.) के तुर्बते पाक को सम्मान प्रदर्शन करना तथाः इमाम हूसैन (अ.स.) का सम्मान प्रदर्शन करना बराबर है. और आप को सम्मान प्रदर्शन करना तथा अल्लाह और उस के रसुल (स.अ.) को सम्मान प्रदर्शन करना बराबर है।
सामिः तुमहारा कहना सही है, लेकिन इस से पहले मै सोचता था कि तुम सब इमाम हूसैन (अ.स.) को रसुले अकरम (स.अ.) से अधिक स्थान पर जानते होगे, लेकिन मुझे अभी हक़ीक़त मालूम हुई. आपका धन्यवाद कि आप ने मुझे सही बात बताई, अब इस के बाद से मै सब समय के लिये तुर्बते कर्बला को अपने साथ रखूँगां और दूसरी चीज़ों पर सजदह करने से बिरत रहूगां ।
अलीः मै इस चिन्ता में था कि दुशमनों ने हमारे विपरीत जो झूटी बातें उड़ाई हैं उस से तुम को कैसे आगाह करुँ। जो लोग अपने को असली मुसलमान कह कर दूसरे मुसलमानों के विपरीत झूटी बातें मशहूर करते हैं सछ तो यह में कि वह मुसलमान नही बल्कि मुसलमानों के दुशमन हैं, आप से निवेदन है कि इस के बाद से जो बातें शियों के सम्बन्धं सुनिए उसकी हक़ीक़त मालूम किए बग़ैर क़बूल न कीज़िए. और सब समय हक़ीक़त और सच्ची कथाएं मालूम करने की चेष्टा करते रहिए।

 

इमामबाड़ा और ज़रीह निर्माण करना

फुयादः जाफ़र, अगर निर्देश प्रदान करते हो तो शिया और सुन्नी सम्पर्क जो इख़्तिलाफ़ व (मतादर्श विपद) है तुम से कुछ प्रश्न करुँ १।(13)
जाफ़रः प्रश्व करो, मै दोस्त रख़ता हूँ किः एक ऐसा व्यक्ति हो जो समस्त प्रकार विषय सम्बंधिंत ग्रन्थें पर्या लोचन करने के बाद सही व यक़ीनि व अक़ीदा को क़बूल करें. और अज्ञानों के उधारण और ना-इल्म होने कि वजह से जो पथ भ्रष्ट रास्ता समाज पर हाकिम है उस पर कभी ईमान ना लाएं और क़बूल करने से परहेज़ करें।
फुयादः अगर हमारे अहले सुन्नत वल जमाअत का कहना सम्पूर्ण तरीके से सहीं हो किया उस (विषय) को क़बूल करोगे१
जाफ़रः में एक मात्र उन लोगों में से हूँ, जो सही और हक़ीक़त को पहचानने के बाद बग़ैर संदेह व्यतीत अपने को कुरबान कर देता है और यही कारण है शिया सम्प्रदाय को मै ने क़बूल कर लिया है। और सही हक़ीक़त को पाए है. तुम हम से अधिक ज्ञान रख़ते हो कि हमारे पिताजी, माताज़ी, व भाई ब्रादार सब के सब अहले सुन्नत वल जमाअत मे से है.... इस विना पर अगर तुमहारा कहना पूरी तरीके से सही व सठिक हो तो मै प्रथम व्यक्ति व मोमिन हूगां कि तुमहारी कथाएं को क़बूल करुँ।
फ़ुयादः तुम सब शीया पैग़म्बरे इलाही, इमामाने, सालेहीन, व ज्ञानी आलिमों के कब्रास्थानों पर रौजा व गुम्बंद बना कर उस कब्र में जो व्यक्ति मदफून है) उस के किनारे नमाज़ अदा करते हो यह तुमहारे कार्य यक़ीनि तौर पर शिर्क है जैसा कि मुशरिकीन बुतों को परस्तिश करते थे, तुम लोग भी क़ब्रस्थ व्यक्तियों व औलिया-ए ख़ुदा को भी परस्तिश करते हो।
जाफ़रः उचित यही है कि दुश्मनी को दूर करो, और हम सब हक़ीक़त को पैरुवी करे और इसके-उसके कहने पर कान ना-दें और शक व शुबह को, व सठिक व रौशन दलील प्रमाण को पवित्र ग्रन्थ कुरान (क़ूरआन) माध्यम, और अतीत पैग़म्बरे व सालेहीन के सुन्नत को दृष्ट आकर्षण क़रार दें।
फ़ुयादः सही है, मै भी इस तरह के अक़ीदा रख़ता हुँ व दोस्त रख़ता हूँ ताकि ज्ञान व अक़्ल के साथ तक़्लीद करुँ नाकि अज्ञानों के बातों और चिन्ता पर तक़्लीद ना- करुँ।
जाफ़रः यहाँ दो विषय बयान करना प्रयजन समझता हूँ।
प्रथम यह है कि फक़त हम सब शीया नहीं है कि सालेहीन बन्दों के क़ब्रों पर, मिनार बनाया करते है, बल्कि समस्त प्रकार मुस्लमान पैग़म्बरे इलाही के क़ब्रें पर व अतीत व्यक्तित्व के क़ब्रों पर रौज़ा बनाया करते है. उधाहरण के तौर पर कई उधाहरण आपकी सेवा में पेश करता हूँ।
1- हज़रत रसूले अकरम (स0) और दो ख़लीफ़ा की क़ब्रों पर एक महान मिनार उपस्थित है।
2- कुछ पैग़म्बरे इलाही, जिस में से हज़रत ईब्राहीम (अ0) की क़ब्र अल (ख़लील) शहर उर्दुन में उपस्थित है, जो मिनार भी रख़ती है और एक बढ़ा क़स्र भी।
3- हज़रत मूसा (अ0) की क़ब्र जो उर्दुन में दो शहर के दर्मियान (बैतुल मुक़द्दस) और (अम्मान) में अबस्थान पाया है और एक रौज़ा के अधिकार के मालिक है।
4- क़ब्र (अबु हनीफ़ा) जो बग़दाद (ईराक़) शहर में उपस्थित है और उसी तरह अपर शहर व स्थान भी है जहाँ आबादी भी है और मिनार भी उपस्थित है।
5- क़ब्र अबु हुरैरह.जो मिस्र देश में उपस्थित और ज़ियारत के स्थान और उस की क़ब्र के ऊपर मिनार भी है।
6- और क़ब्र ((अब्दुल क़ादिर ग़िलानी)) बग़दाद में उपस्थित है जो एक बढ़ा सहन और ज़रीह और मिनार भी रख़ता है।
अपर दुसरे मुस्लमान देशों में भी, पैग़म्बराने इलाही की क़ब्रे भी उपस्थित है व अतीत सम्प्रदाय के नेता व पेश्वा भी. इन लोगों की क़ब्रों के ऊपर मिनार उपस्थित है। और यह सब पवित्र स्थान मौक़ूफ़ है उन रौजे़ के नाम से उस से जो कुछ आमदनी होती है या जो कुछ हासिल होता है सब कुछ उस रौज़ा के नाम से और उस रौज़ा को नए निर्माण करने के लिए वही मौक़ूफ़ के पैसा से ख़र्च किया जाता है (या करता है)। प्रत्येक सम्प्रदास मुस्लमान इस वपित्र कार्य को अंजाम देने के लिए अतीत व्यक्तियों लोग उन लोगों को तशविक़ भी किया है, लेकिन एक बार भी इस कार्य निशेध घोषणा नहीं किया है१ इस बिनापर हम सब शीया नहीं है कि फक़त पैग़म्बरे अकरम (स0) की क़ब्र के ऊपर मात्र रौज़ा बनाते है बल्कि अपर मुस्लमान भी हमारे साथ है जो अपने अतीत व्यक्तियों की क़ब्र के ऊपर मिनार व रौज़ा बनाया करते है और उस की ज़ियारत की ग़र्ज से तशरीफ़ भी ले जाते है।
दूसरी बात यह है किः हम सब शीया मुस्लमान जब पैग़म्बरे अकरम (स0) के हरम शरीफ़ के नज़दीक नमाज़ अदा करते है हक़ीक़त में हम सब अल्लाह के लिए नमाज़ अदा करते है न-उन औलिया-ए ख़ुदा के लिए। क्योंकि ( जब प्रत्येक पवित्र स्थान पर) नमाज़ अदा करते है अपनी नमाज़ के लिए क़िब्ला कि तरफ़ चेहरा करके नमाज़ अदा करते है, अगर हमारी नमाजें उस पवित्र स्थान के लिए हो यक़ीनन हमारे चेहरे नमाज़ कि अबस्था में उस क़ब्रे मुबारक कि तरफ़ होना ज़रुरी हैं (या होनी चाहिए)।
फ़ुयादः क्यों क़ब्र के पीछे नमाज़ अदा करते हो और नमाज़ कि अबस्था में उस क़ब्र को अपना क़िब्ला क़रार देते हो १
जाफ़रः जिस समय हम सब क़ब्र के पिछे नमाज़ अदा करते है हमारी नीयत फक़त उस अल्लाह के लिए होती है (लेकिन आम तौर पर यह क़ब्रे हमारे सामने हुआ करत हैं) लेकिन हमारी नीयत व्यतीत हमारे सामने रहती हैं लेकिन हमारी नीयत कभी उस क़ब्र के लिए नहीं होती, चाहता हूँ इस से भी रौशन दलील के साथ बयान करुँ, उचित यह है कि जब हम सब नमाज़ अदा करते हैं तो बहुत सारी ऊँचाई गृह हमारे सामने उपस्थित रहती है तो किया हमारी नमाज़ उस ऊंचाई गृह के लिए या उस काबा गृह के लिए नमाज़ अदा हूई है। और क़िब्ला भी हमारी नमाज़ की अवस्था में सामने रहता है तो किया इस का माना यह हूआ कि नमाज़ पढ़ने वाले की नमाज़ उस ऊँचाई गृह के लिए परस्तिश किया है (या उस क़िब्ला के लिए) १!
इस से भी बहूत सारे उधाहरण हमारे सामने हैं कि समस्त प्रकार मुस्लमान सम्प्रदाय के व्यक्तित्व फ़रमाते है किः क़िब्ला की तरफ़ (हत्ता) मुशरिकीन के मअबद में भी नमाज़ अदा करना जाएज़ व शुद्ध है, अगरचे नमाज़ पढ़ने वाले का चेहराये मुबारक उस बुत की तरफ़ है लेकिन उस की नीयत बुत व्यतीत अल्लाह के लिए है क्योंकि नमाज़ पढ़ने वाले की ध्यान उस अल्लाह की तरफ़ है ना बुत कि रपफ़। किया इस अबस्था में नमाज़ पढ़ने वाला, बुत की पूजा की है १!
फ़ुयादः जिस तरह तुम कह रहे हो क़ब्रों पर रौज़ा बनाना शिर्क नहीं है, क्योंकि हिजाज़ के आलिम सम्प्रदाय के फ़त्वा, इमामत, और अतीत सालेहीन और औलिया-ए ख़ुदा के रौज़े पर मिनार बनाना यह एक बहाना शिर्क है और अल्लाह के व्यतीत इबादत करने के बिनापर उस को वीरान व नष्ट किया है १!
फ़ुयादः समस्त प्रकार हिजाज़ के आलिमें दीन इस शिर्क पर फ़त्वा प्रदान नहीं किया है, बल्कि उस में से कुछ व्यक्ति फ़त्वा प्रदान किया है, और वह भी उस यूग में फ़त्वा प्रदान किया है कि कोई एक मदीना के बृद्ध पुरुष हमारे लिए नक़्ल किया है। कि (जिस समय हिजाज़ के आलिमेंदीन हरम शरीफ़ को (अर्थात) जान्नतुल बक़ी विरान व नष्ट करने के लिए फ़तवा प्रदान किया था, कुछ ज्ञानी व्यक्तियों ने इस क़ब्र पर मक़बिरा बनाने के लिए शिर्क क़रार नहीं दिया था बल्कि इस्लामी के दृष्ट से उस को जाएज़ और शुद्ध क़रार दिया मुस्तहब और पछनदीदा क़रार दिया था क्योंकि ख़ुदा बन्दे आलम इर्शाद फ़रमाता है।

(... ومن يعظم شعئر الله فإنها من تقوی القلوب)

जिस व्यक्ति ने अल्लाह के निशान और उस के चिन्ह को सम्मान प्रदर्शन किया हक़ीक़त में उस का दिल पवित्र दिल वालों में से है।(14)
(इस आयत द्बारा मालुम होता है कि) कब्रों पर रौज़ा या मिनार बनाने वालो का दावा करने वाले का शिर्क बातिल हो गया, और यह कार्य बिल्कुल उल्टा है, और इस फ़त्वे के कारण से सबब यह हूआ कि कुछ आलिम व्यक्तियों तिरष्कार पाया और कुछ ने (सामाजिक और दौलती अफ़िस में) कार्य-काम परित्याग किया इस बिनापर कुछ हिज़ाज़ के आलिम व्यक्तियों ने इस शिर्क का फ़त्वा प्रदान किया था।
फ़ुयादः मै भी इस फ़िक्र में था कि रौज़े पर मिनार निर्माण करना शिर्क व हराम है, तो क्यों मुस्लमान सदरे इस्लाम हज़रत मोहम्मद (सा0) के यूग से लेकर आज तक ज्ञान हासिल नहीं किया और उस काम के लिए निषेध घोषित नहीं कि१ और यह अतीत व लम्बा 13 सदि तक नहीं समझा कि यह कार्य हराम व अ-शुद्ध है१
जाफ़रः हमारे लिए ध्यान देना बहुत ज़रुरी है कि पैग़म्बरे अकरम (स0) ज़रीह को निर्माण कराने के लिए ख़ुद भी कहा हैः और इस कार्य-काम से निषेध भी घोषणा नहीं किया है १ (हजरे इस्माईल) कि हज़रत इस्माईल (अ0) का (दफ़न) का स्थान है और उसकी माताज़ी (हाजेर) इस दलील व प्रमाण पर उत्तम दलील है, पैग़म्बराने इलाही के क़ब्रास्थानों पर जैसा कि इब्राहीम (अ0) व मूसा (अ0) व अपर दर्बार भी है कि पैग़म्बरे अकरम (स0) के यूग से आज के यूग तक हरम शरीफ़ और बारगाह के हिसाब से सम्मान प्रदर्शन किया जाता है. लेकिन उन के समस्त प्रकार ख़लीफ़ा और साहाबा इस निर्माण पर कोई प्रतिदन्डी नही की, लिहज़ा अगर हराम व अ-शुद्ध होता बिना शक व शुबह पैग़म्बरे अकरम (स0) फ़रमान देते कि उस कब्रों को नष्ट करो और उन क़ब्रों के परिदर्शन मत करो लेकिन पैग़म्बरे अकरम (स0) इस काम से निषेध नहीं किया इस का माना यह हूआ और इस से पता चलता है कि इमाम और अतीत सालेहीन और व्यक्तित्व व पैग़म्बरे अकरम (स0) की क़ब्रों पर मिनार और जरीह निर्माण करना जाएज़ और उस पाक स्थान पर नमाज़ अदा करना जाएज़ और शुद्ध भी है।
दूसरी तरफ़. हज़रत रसूले ख़ुदा (स0) के बाद स्वींय कक्ष में मदफ़ून हुए और कक्ष के दर्वाजह बन्द हो गए, इस तर्तीब के साथ उन की क़ब्र चार दिवारी के अन्दर और छत भी क़रार पाया. और अगर उन के एक साहाबी उन से सुनता कि यह काम हराम व अ-शुद्ध होता यक़ीनन कोई एक साहाबी-ए पैग़म्बरे अकरम (स0) इस कार्य-काम से निषेध घोषित करता और बगैर संदेह व शक व शुबहा के इस काम को प्रकाश करता और रसूल (स0) को उस कक्ष में दफ़न ना- करता, और अगर दफन करना हराम होता यक़ीनन उस कक्ष को नष्ट करना वाजिब होता, ताकि उस कक्ष में उन को दफ़न ना- किया जाए हलाकि वहाँ अपर साहाबा भी उपस्थित थे इस काम से निषेध घोषित नहीं की और ना- हराम जाना।
दूसरी बात यह है किः क़ब्रों पर रौज़ा निर्माण करना शिर्क नहीं है, और हराम भी नहीं है।
फ़ुयादः इस हक़ीक़त विषय सम्पर्क मुझ को परिचय किए हो जिस बिनापर हम ने सही हक़ीक़त को समझा कि क़ब्रों पर रौजा निर्माण करना हराम नहीं है और शिर्क भी नहीं है। और समस्त प्रकार इस सम्पर्क जो कुछ बयान हूआ है इस्लाम के दृष्ट में शुद्ध नहीं है, अधिक से अधिक आपका धन्यवाद, अदा करता हूँ।
जाफरः मै भी इस तरह हूँ कि तुम सही और हक़ीक़त को पहचान कर सही पथ पर क़दम रखे हो और पथ प्रदर्शक के मंतेक़ी और अक़्ली बातों पर अनुसरण कर रहे हो, अधिक से अधिक अपका धन्यवाद अदा करता हूँ।
इस हिसाब से मै तुम से एक अंतर भर अवेदन कर रहा हूँ, कि तुम को सही व हक़ीक़त अधिक से अधिक बृद्ध करने में प्रचेष्टा करुगां, लिहजा अगर तुमहारे पास समय है मै तुम से अधिक से अधिक पर्यालोचन करना चाहता हूँ।
फ़ुयादः मै हक़ बात पर अपने को बलिदान व त्याग कर देता हूँ. और हमारे समस्त प्रकार अस्तित्य व त्याग इस सही और हक़ बात पर है कि कर्णपात करुँ और किया कह रहे हो सुनूँ।
जाफरः हमारी पर्यालोचन प्रमाण हो गया कि क़ब्रे औलिया-ए इलाही पर रौज़ा बनना किसी प्रकार का कोई मुश्किल व समस्या दिख़ाई नहीं दे रही है।
फ़ुयादः हाँ, मै भी इस बख़्श व अध्यय में तुमहारे अक़ीदे जैसा हूँ।
जाफ़रः यह है कि मै कुछ कहना चाहता हूँ और वह यह है कि औलिया-ए ख़ुदा की क़ब्रों पर ज़रीह निर्माण करना यह समस्त प्रकार काम-कार्य मुस्तहब कामों में से है(15) और जो व्यक्ति इस काम को अंजाम देगा अल्लाह उस के फल और सवाब में बृद्ध करेगा।
फ़ुयादः किस तरह१
जाफरः ख़ुदा बन्दे अलम इर्शाद फरमाया है किः

(... ومن يعظم شعائر الله فإنها من تقوی القلوب)

जिस व्यक्ति ने अल्लाह के निशान और उस के चिन्ह को सम्मान प्रदर्शन किया हक़ीक़त में उस का दिल पवित्र दिल वालों में से है।(16)
इस बिनापर जो कुछ अल्लाह के (निशान) में शुमार आएगा उन सभों का सम्मान प्रदर्शन करना इस्लाम के दृष्ट में मुस्तहब है।
फ़ुयादः सही हैः लेकिन किस तरह औलिया-ए इलाही की क़ब्रों पर ज़रीह बनाना (अल्लाह के निशान) में शुमार होता है१
जाफ़रः (शुआर) अर्थात निशान उन सब चीज़ों को कहा जाता है कि (दीने) इस्लाम पृथ्वी के दृष्ट में एक अज़मत और उस के नस्सी दलील पर हुरमत होने का कोई हराम दलील व प्रमाण अस्तित्य न-हो.
फ़ुयादः इस रौजों के ऊपर मिनार बनाना और ज़रीह निर्माण करना इस्लाम-धर्म के लिए कोई अज़मत प्रदान करता है १
जाफ़रः हाँ,
फ़ुयादः किस तरह १
जाफ़रः विना शक व शुबह के अतीत इस्लाम-धर्म गुरु के क़ब्रों पर कोई निर्माण पैदा करना और नष्ट होने से संरक्षण पैदा करना उन व्यक्तियों को सम्मान प्रदर्शन करना बराबर है। उधाहरण दे कर अपना कथा और परिष्कार करुँ। अगर कोई व्यक्ति क़ब्र के क़रीब एक गढ्डा ख़ोदे इस का माना यह नहीं है कि उस मृत व्यक्ति को सम्मान प्रदर्शन नहीं किया है १
फ़ुयादः सही इस तरह है.
जाफ़रः इस अवस्था या इस हाल में अगर कोई अतीत ओलिया-ए ख़ुदा और इस्लमाम धर्म के व्यक्तित्य के ऊपर कोई रौज़ा निर्माण करें बिना शक व शुबहा के यह काम उन व्यक्तियों के लिए सम्मान प्रदर्शन करने का कारण बना है. लिहज़ा सम्मान प्रदर्शन करना अतीत इमामो और सालेहीन और धर्म गुरु को सम्माम प्रदर्शन करना यानी इस्लाम धर्म को सम्मान प्रदर्शन करना है क्योंकि यह सब व्यक्तित्वपूर्ण व्यक्ति इस्लाम धर्म की तरफ़ दावत प्रदान करता था और जन साधारण व्यक्तियों को उस इस्लाम की तरफ़ अमंत्रन देता था. तुमहारे दृष्ट में अगर कोई व्यक्ति अपनी दल के नेता को या किसी सम्प्रदाय के नेता को सम्मान प्रदर्शन किया इस का माना यह हूआ कि वह व्यक्ति उस दल और क़ौम को सम्मान प्रदर्शन किया है १
फ़ुयादः सही है जिस तरह तुम कह रहे हो।
जाफ़रः इस बिनापर अतीत पैग़म्बराने इलाही की क़ब्रों को सम्मान प्रदान करना तथा इस्लाम-धर्म को इज़्ज़त व अबरु और सर्बुलन्द करना है एक कथा मैं कह दू, प्रत्येक चीज ज़ो अल्लाह के लिए सर्बुलन्दी का निशान हो वह काम इस्लाम की सर्बुलन्द और अल्लाह की अज़मत का निशान है जैसा किः ख़ुदा बन्दे आलम इर्शाद फरमाया है किः

(... ومن يعظم شعائر الله فإنها من تقوی القلوب)

जिस व्यक्ति ने अल्लाह के निशान और उस के चिन्ह को सम्मान प्रदर्शन किया हक़ीक़त में उस का मन पवित्र दिल वालों में से है।
फ़ुयादः इस सूरत में अगर कोई (अतीत) पैग़म्बराने इलाही और ओलिया-ए ख़ूदा व इमामों की कब्रों को बेहुरमती करे इस का माना यह हूआ कि दीन-इस्लाम की बेइज़्ज़त करने के बराबर है, क्योंकि उन व्यक्तियों का बेइज़्ज़त करना तथा इस्लाम-धर्म की तौहीन व बेइज़्ज़त करना बराबर है और हक़ीक़त में मक़ामे इस्लाम को पैमाल करने के बराबर है।
जाफ़रः यही कारण था कि शीया सम्प्रदाय को क़बूल किया और शीया हूआ, और अपने नाम (वलीद) को परीवर्तन करके जाफ़र रख़ा, जिस समय दूसरे के कहने और दलील व प्रमाणों पर अमल अंजाम देता था मै अपने को एक सहीं पथ पर दृढ़ जानता था लेकिन जिस समय सही और हक़ीक़त को पहचान लिया और उस के रास्ते में पहूँच गया (तो मै अपने को कुछ और समझा)।
अगर ( जनसाधारण व्यक्ति व जनता) सम्प्रदाय दुश्मनी को अपने मन से बाहर निकाल कर किनारे रख़े और सही व सठिक पथ को पाने के लिए अपने अस्तित्य को पूरी तरीके से आमादा करें यक़ीनन वह सहीं पथ को पाके छोड़े गा।
फ़ुयादः इस के बाद से मै अपनी हक़ीक़त के पीछे दौढ़ता रहूगां और किसी स्थान व हर व्यक्ति के निकट आयुँ, उस की हक़ीक़त की पैरवी करने में असहाय हो जाऊगां. इस बिनापर तुम ने जो मुझे सही पथ के लिए ज्ञान दिया है मै सब समय के लिए अप को धन्यवाद अदा करता हूँ।
लेकिन मै ख़ुदा हाफिज़ करने के लिए अनुमती चाहता हूँ क्योंकि मै ने अपर व्यक्ति से दर्शन का वादा किया है।
जाफ़रः अल्लाह तुमको हिफ़ज़ व अमान मैं रखे।
फ़ुयादः अल्लाह हाफ़िज़।
जाफ़रः अच्छे व सलामत रहो।

 

औलियाओं के मज़ारों को ख़ूबसूरत निर्माण करना

साबिरः सलामुन अलैय कुम.
बाक़िरः अलैय कुम अस् सलाम.
साबिरः तुमहारे आने का ख़ुश व अभिनन्दन कहता हूँ.
बाक़िरः हमारे चचाज़ाद भाई यहाँ रहते है उनका का परिदर्शन करने के लिए आया हूँ।
साबिरः आप मुझे सम्मान और गौरब प्रदान किए है. कि मै आज आप की सेवा ( ख़िदमत) में रहूँ.
बाक़िरः हमारे निकट अधिक से अधिक कार्य-काम है(17) मात्र (सिलाह रह्म) आपने परिवार को प्रदर्शन करने के लिए सब कुछ आपना कार्य-काम त्याग करके चला आया हूँ. लेकिन मै तुम से क्षमा चाहता हूँ.
साबिरः यह कभी संम्भब नहीं है कि, दो दोस्त एक मुद्दत व कई बर्ष के बाद एक आपर को दर्शन के लिए उपस्थित हूआ हूँ. लेकिन एक घंटा आपनी गुफ़्तगु से दूर रहूँ १ यह व्यतीत तुमहारे ऊपर आपना द्बीनी भाई का अधिकार रख़ता हूँ. आपर तरफ़ हमारे और तुमहारे दर्मियान एक मोमिन भाई जो शिया और सुन्नी संम्बधमें गुफ़्तुगु हूई है इस हिसाब से तुमहारे ऊपर एक यक़ीन रख़ता हूँ. मै चाहता हूँ कि इस संम्बधमें तुम से कुछ गुफ़्तगु करुं. और इस विबरण से हमारी कथाएं परिष्कार हो जाएगी और मेरी निमंत्रण को भी त्याग कर नहीं सक्ते हो।
बाक़िरः खोदा हाफिज़, आऊगां.
उस समय दो दोस्त साबिर के गृह पर चल दिए. और दोनों के दर्मियान नई नई कथाए और बातें व विभिन्न प्रकार रदीबदल होने के बाद बाक़िर साबिर से प्रश्न कियाः
तुमहारे और उस शिया द्बिनी भाई के दर्मियान जो कथाएं हूई थी किस सम्बधं में थी १
साबिरः पैगम्बर, इमाम, और सालेहीन, अलिम, व मोमेंनीन को क़ब्र को सोना, चांदी के द्बारा ख़ूबसूरत करके निर्माण करने के प्रसंग में था.
बाक़िरः इस में किया समस्य देख़ाई दे रहा है.
साबिरः किया यह कार्य-काम हराम व निषेध नहीं है१
बाक़िरः क्यों हराम व निषेध हो१
साबिरः किया मृत व्यक्ति इस ख़ूबसूरत निर्माण चीजों से कुछ लाभ-नफ़ा-फ़ैदा अर्ज़न करता है १
बाक़िरः न.
साबिरः इस कारण पर, यह काम आपव्यय और इस्राफ़ है. इस प्रसंग खुदा बन्दे आलम ईर्शाद फ़रमाते हैः

(... ولا تبذر تبذیراً * إن المبذرين کانوا إخوان الشياطين...)

फुज़ूल व अप्व्यय ख़र्च न करो, क्योंकि यह आपव्यय ख़र्च शैतान का कार्य-काम है।
बाक़िरः काबा गृह के प्रसंग समंधं, जो सोना और चांदी से उस का पर्दा लटक रहा है उस प्रसगं तुम किया फ़रमा रहै हो१
साबिरः मै कुछ नहीं जानता हूँ, कि किया कहूँ.
बाक़िरः जाहैली व अज्ञानी यूग से लेकर आज के यूग तक अधिक से अधिक सोना-चांदी विभिन्न प्रकारके स्थान और देश-प्रदेश से काबा गृह के लिए प्रथमभता हूआ है और हो भी रहा है ( इब्ने ख़ल्लदून)(18) अपनी पूस्तक के भुमीका(19) में लिख़ते है कि ( पुरातन- क़दीम उम्मत और सम्प्रदाय क़ौम इस काबा गृह को एक बढ़ा और महतपूर्ण समझती थी और समस्त प्रकार बादशाहों ने विभिन्न प्रकार सोना-चांदी इस काबा गृह के लिए भेजा-दिमाग़ करता ता. एक वक़्या प्रसिद्ध व मश्हूर है, कि जिस समय अब्दुल मुत्तालिब ज़म ज़म का एक कूआं ख़ोद रहै थे उस समय एक दो ग़ज़ाली शमशीर हासिल किया था, लेकिन यह घटना बहुत मश्हूर और प्रसिद्ध है कि उस समय हज़रत रसूले ख़ुदा (साः) मक्के को विजय अर्जन किया था हलाकिं वेह कुए काबा गृह शरीफ़ के निकटवर्ती में उपस्थित था जिस में से दो मिलोयन दिनार का सोना को हासिल किया और उस सोना को काबा गृह के लिए हदिया के तौर प्रदान किया था और उस का वज़न तक़रीबन दो सौ (क़न्तार) प्रत्येक क़न्तार में सौ रत्ल था) हज़रत अली (अः) हज़रत रसूले अकरम (साः) से संदेश दि कि या रसूलुल्लाह, उत्तम होगें कि यह अधिक सर्वात को यूद्ध के लिए मुशरीक़ीन के पीछे ख़र्च किया जाए, पैगम्बर अकरम (साः) इस कार्य से निषेध घोषित किया और अबुबक्र भी इस काम से भी कोई प्रतिदन्द्बी नहीं किया.(इब्ने ख़ल्ल्दून इस विषय में विबरण देते हूए फ़रमाते है) (अबु वाएल (शैयबह इब्ने उसमान से) नक़्ल करके फ़रमाते है मै उमर के निकटवर्ती में था कि उमर फ़रमाते हैः कि समस्त प्रकार सोना और चादीं ( काबा गृह के उपस्तित में) की मुसलमान के अंर्तगत में भाग कर दिया जाएं।
मै ने कहाः किया काम करना चाहते हो१ (इस तरह कार्य-काम करने का तुमहारा कोई अधिकार व निर्देश नहीं है).
उमर ने कहाः क्यों १ मै ने कहाँ पैगम्बर अकरम (साः) और अबुबक्र ( तुम से पहले मुसलमान के पथ प्रदर्शक थें) लेकिन इस काम को परित्याग किया।
उमर ने कहाँ. (पास) हमारे लिए भी उचित है कि उन व्यक्तियों की तक़्लीद करें)(20)
साबिरः अब बताउ, मै तुम से एक प्रश्व करना चाहता हूँ, किया काबा गृह उन समस्त प्रकार सोना चांदी से लाभ हासिल करता था १ या ख़ुदा बन्दे आलम इन तमाम व समस्त प्रकार ख़ूबसूरत और मुनज़्ज़ा पोषाकों चीजों से लाभ हासिल करता था १
साबिरः यह कभी हो ही नहीं सकता १
बाक़िरः इस हाल में पैगम्बर अकरम (साः) इन समस्त प्रकार सरवत से कुछ नफ़ा व लाभ हासिल नहीं किया, हत्ता एक ज़र्रह बराबर भी व्यबहार नहीं कि हलाकिं एक ऐसा समय था कि उस समय इस्लाम-धर्मकी इस तरह के धन-सम्पद की ज़रुरत थी अगर होता यक़ीनन इस्लाम-धर्म सरासर गीति में फ़ैल जाता।
शायेद यहाँ कोई एक प्रश्व करे कि रसूले ख़ुदा (साः) दीन-इस्लाम को प्रचार करने के लिए और आपने अस्ल उद्देश्व तक पहूँच ने के लिए इन समस्त प्रकार माली नियाज़ रख़ते थे, तो आप इन समस्त प्रकार सर्वतों और दिनारों व दिर्हमों को व्यबहार क्यों नहीं किया १
इस उत्तर के जवाब मे परिष्कार है किः यह सब धन-दौलत एक मात्र काबा गृह के लिए मखसूस-विशेष था, ताकि इन तमाम माल द्बारा जनसाधारण के सामने काबा गृह का सम्मान और अज़्मत में बृद्ध पाएं, लेकिन हमे भूलना नहीं चाहिए कि काबा गृह का मान-सम्मान इज़्ज़त अल्लाह के निकट हमारी फ़िक्र से कही ऊपर है. और यह सब तमाम प्रकार सर्वत काबा गृह के लिए मान-सम्मान का बृद्दि में कोई कमि नहीं आएगी और न-सर्वत न-होने के कारण, लिहाज़ा सोने का गुम्बद, और सोने चांदी द्बारा, वली और औलिया के मज़ारे शरीफ़ के दर्वाजे ख़ूबसूरत करके सजाना, जैसा कि इमाम अली (अः) के मजार शरीफ़, इमाम हसन (अः), और इमाम हूसैन (अः) व इमाम रिज़ा (अः) अल्लाह के दरुद व सलाम उन महान व्यक्तियों पर वर्षित हो, अल बत्ते यह सब मक़ाम व मनज़िलत इन तमाम प्रकार ख़ूबसूरत बृद्धि होने के कारण, ना उन व्यक्तियों को सम्मान मे कम और ना- बृद्ध पाएगा। उधारण के तौर पर इमाम हूसैन (अः) के पवित्र मर्क़द व मज़ार शरीफ़ में कई बार दुश्मन का हमला हूआ लेकिन यह सब होने के बावजूद इमाम हूसैन (अः) के रौज़े के सहैन में पवित्र गु़म्बद शरीफ़ उपस्थित है, और प्रत्येक दिन इमाम हूसैन (अः) का पवित्र मज़ार व रौज़ा शरीफ़ सोने और चांदी से खूबसूरत और अधिक से अधिक उत्तम होते जा रहै है।
साबिरः यह सब तमाम प्रकार चीजें अल्लाह के वलीयों को जनसाधारण व्यक्तियों के सामने महान समझना है१
बाक़िरः हाँ, तुम से एक विषय प्रसगं कथा कहना चाहता हूँ ताकि विषय परिष्कार हो जाएं. और वे यह है कि अगर तुम यहूदियीं की कबरस्तान मे जाओगे यक़ीनन परिदर्शन करोगें की उन के व्यक्तित्वपूर्ण आलिम के क़ब्रिस्तान विरान व ख़ालि पढ़ा हूआ है. और ऐसा कोई कम्रा और सक़्फ नहीं है कि उन की ज़्यारत करने वालों के लिए एक पनाहगाह या आपर भाषा में कहा जाएं कि एक हिफाज़त की ज़गह भी नहीं है, लेकिन अगर ईसाईयी की क़बरस्तान पर भ्रमण करोगे या तशरीफ़ ले जाउगे तो अन्व अबस्था परिदर्शन करोगे, और ऊन के आलिम की क़ब्र को सब समय के लिए जाएर उपस्थीत है. और ग़ुम्बद सोने-चांदी और आपर चीजों से सजाया हूआ है, लेकिन इस हाल में कि तुम मुस्लमान हो और प्रत्येक सम्प्रदाय को न-हक़ व बातिल समझते हो, किया यह दो क़ब्रस्थान परिदर्शन करने के बाद यहूदी के क़ब्रस्थान तुमहारे दृष्ट में ख़ूबसूरत या ईसाई के क़बरस्तान १
साबिरः यह एक इंसान का गुणावली है कि आपने ऑख़ से एक ख़ूबसूरत चीज देख़ने के बाद यहूदी के क़बरस्तान से उत्तम ईसाई के क़बरस्तान उत्तम और बेहतर है।
बाक़िरः इस विनापर शिया हज़रात इमामो व पैग़म्बरे अकरम (सा0) के रौज़े मुबारक पर गुम्बद निर्माण करना और उन महान व्यक्तियों की क़ब्रे मुबारक को विभिन्न प्रकार चीजों से सजाना उन व्यक्तियों को महान व मक़ाम व मनज़िलत को महान समझना है.
साबिरः जो कुछ तुम कह रहै हो सब कुछ सही व सठिक है, लेकिन यह तुमहारा मधुमय मुग्ध और आपव्यय ख़र्च करना इन समस्त प्रकार काम को आपव्यय नहीं कर रहै है१
बाक़िरः यह मात्र आपव्यय नहीं है, बल्कि यह कथा प्रमाण कर रही है कि यह समस्त प्रकार काम अल्लाह के औलिया के लिए एक सम्मान और अबरु का स्थान है ( यहाँ एक कथा कहना जरुरी समझता हूँ और वेह यह कि) उन व्यक्तियों को महान समझना तथाः इस्लाम-धर्म को महान समझना बराबर है. क्योंकि प्रत्येक नेक अमल को महान समझना इस्लाम को महान समझना, और यह अल्लाह का फ़रमान भी हैः और इस कार्य के लिए अल्लाह ने भी प्रसंसा भी किया हैः

(ذلک و من يعظم شعائرالله فإنها من تقوی القلوب)

जो व्यक्ति अल्लाह के विधान को महान समझता है हक़ीक़त में उन का मन (दिल) पवित्र है)।(21)
इस विनापर, अल्लाह के वलीयों के मज़ार व मर्क़द शरीफ़ को सजाना हत्ता अल्लाह के विधान व निर्देश को पालन करने के बराबर है, और जो व्यक्ति इस काम को करने वाला है उस के लिए अल्लाह के निकट अधिक से अधिक सवाब उपस्थित है और वेह एक सवाब एक का हक़दार है।
साबिरः मै तुमहारे मूल्यवान समय को नष्ट किया हूँ क्षमा चाहता हूँ, लेकिन तुम हम को एक जुलमत व अधेंरे से परीत्रान दिला कर एक सही व सठिक राह पर निर्देशना किए हो, लेकिन इस से पहले कि मै उन तमाम प्रकार रौज़ा और पवित्र स्थान को ख़ूबसूरत से ख़ूबसूरत सजाने के लिए चेष्टा प्रचेष्टा करता रहूँगां, और तुमहारा कहना हमारे लिए परित्राण का रास्ता बना है, और आख़री बार तुमहारी परिष्कार व रौशन दलील-प्रमाण हमारे गुम हूए रास्ते को दिख़ला दिया है.
बाक़िरः इस विषय के सम्पर्क समस्त प्रकार शक व संदेह मर्क़द को ख़ूबसूरत करने के प्रसंग को दूर किए हो १
साबिरः हाँ, यह सब नेक काम मुस्तहब होने के प्रसंग क़ुरआन मजीद ने भी निर्देश दिया है. और आपर किसी चीज़ में कोई संदेह व अबकाश नहीं रख़ता हूँ।
बाक़िरः मै सब समय के लिए उपस्थित हूँ कि इस सम्प्रर्क प्रत्येक प्रकार के शक व संदेह सम्पर्क गुफ़्तगु करुँ, ताकि हम सब हर दो हक़ीक़त को क़बूल करे और सही व सठिक प्रसगं को अनुसरण करें।
साबिरः अधिक से अधिक आपका धन्यवाद, अदा करता हूँ, और अल्लाह के निकट तुमहारे लिए तौफ़ीक़ तलब करता हूँ।

 

ज़रीह का चूमना

मालिकः सादिक़, इमामों और पैग़म्बरों के रौज़ों का चुमना कैसा है १
सादिकः क्यौं१
मालिकः कहा जाता है. कि यह काम शिर्क है।
सादिकः कौन ऐसा कहता है १
मालिकः यह मुस्लमानों का कहना है।
सादिकः यह बहुत तअज्जुब की बात है।
मालिकः कहा जाता है कि ये काम शिया लोग अंजाम देते हैं।
सादिकः किया हज करने के उद्देश्व से मक्के गए हो१
मालिकः अल्हमदोलिल्लाह हाँ।
सादिक़ः किया मदीना में क़ब्रे रसूल (स.अ.) की ज़ियारत की है१
मालिकः अल्लाह का शुक्र है कि हां क़ब्रे रसूल (स.अ.) की ज़ियारत की है।
सादिक़ः तो तुमने देख़ा ही होगा कि करोड़ों शिया सुन्नी मुस्लमान, भीड़ में दब कर रौज़ए रसूल (स.अ.) को चूमते हैं, लेकिन कुछ व्यक्ति ऐसे है जो अच्छे काम का आदेश प्रदान करते हैं और उन लोगों की पिटाई करते है (जो रौज़ए रसूल (स.अ.) को चूमते हैं) और इस काम से लोगों को रोकते हैं १
मालिकः हां इसी तरह है।
सादिक़ः तो सिर्फ हम शिया ही नहीं हैं, कि पैग़म्बर अकरम (स.अ.) के रौजे़ को चूमते है बल्कि तमाम मुस्लमान यह काम करते हैं।
मालिकः इस सूरत में कुछ मुस्लमान पैग़म्बर (स.अ.) के रौज़े को चूमने को हराम और शिर्क समझते हैं १
सादिक़ः जो व्यक्ति रौज़ऐ रसूल (स.अ.) के चूमने को हराम और शिर्क समझते हैं, ऐसे लोग कम हैं. कि मात्र अपने को एक सच्चा मुस्लमान और अपनी फ़िक्र को सही समझते हैं, और दूसरे मुस्लमानों को काफ़िर, मुशरिक और अपने को अल्लाह का सच्चा पैरुकार जानते हैं, यही वजह है कि वह लोग दूसरे मुसलमानों को काफ़िर कहते हैं निश्चित रूप से तुम ने देख़ा होगा कि कुछ व्यक्ति ऐसे हैं (जो अच्छे कामों का आदेश प्रदान करते हैं) हिजाज़, मुसलमानों को रौज़ऐ रसूल (स.अ.) को चूमा देते हूए मारे है और उन लोगों को अपबाद व तोहीन-ऐ काफ़िर, ए मुशरीक, ए ज़न्दीक़, ए सुवर, ए कुत्ता, व.... और अपर गाली भी देते रहते है, और न्याय व्यतीत उन लोगों पर हद जारी करते रहते है, उन लोगों के दृष्ट में किसी क़िस्म का कोई पार्थक नहीं है कि मुख़ातब शिया हो या सुन्नी, मालिकी हो या शाफ़ई, हम्बली हो या शिया-ए ज़ैदी, या अपर मुस्लमान कौमें (वगैरह)।(22)
मालिकः हाँ, जो कुछ तुम बर्णण किए हो मै ख़ुद अपनी आँख से देख़ चूका हूँ, और उस से भी अधिक ख़राब पर मै गवाह था. कि अगर कोई व्यक्ति पैग़म्बर अकरम (सा0) के पवित्र रौज़ाए मुबारक को चूमा देने के लिये चेष्टा-प्रचेष्टा करता था, तो पुलिस (अच्छे कृत कर्मों को आदेश प्रदान करने वाला) अपने हाथ में लाठी रख़े हूए उन लोगों के सर-माथा पर मारने लगता था. हत्ता कुछ समय पिटाई की भारी ज़ख्म की कारण से ख़ून बहने लगता था, और कुछ समय रसूल (सा0) को ज़ियारत करने वालों को घुशी द्बारा उन लोगों के सर व सीने में ज़रब लागाता था. और इस ज़रब की कारण से ज़ाएरे रसूल (सा0) को नारहत और असंतोष्ट होना पढ़ता था. मै ये सब हॄदय बिदारक घटना को देख़ कर बढ़ी असंतोष्ट हूआ।
आश्चर्य! विषय है कि ख़ुदा बन्दे अलम हज को समस्त प्रकार मुस्लमानों के लिये एक समय निर्देष्ठ किया है ताकि समस्त प्रकार मद्दी व मानवी व ज्ञानी विषय को अपनी आँख़ द्बारा देख सकें, लेकिन आज के यूग में कुछ व्यक्तियों ने अपने कृतों अमल को अमर बिल मअरुफ़ व नहीं अनिल मुनकर द्बारा नाम घोषणा कर रख़ा है, और इस कारण कि वजह से समस्त प्रकार मुस्लमानों के दर्मियान एक परीवर्तन आगया है।
सादिकः हम सब अपनी अस्ल विषय कि तरफ़ पलट जाएं. किया तुम अपने पुत्र को चूमते हो१
मालिकः हाँ,
सादिक़. किया इस कृत कर्मों के साथ तुम अपने ख़ुदा से शिर्क नहीं करते१
मालिकः न, न, कभी नहीं.
सादिकः क्यों और किस तरह ये कृतकाज शिर्क नहीं है १
मालिकः प्रेम, और मुहब्बत की कारण पर अपने बच्चों को चूमना ये काम शिर्क नहीं है.
सादिक़ कुरआन को भी चूमते हो १
मालिकः हाँ,
सादिक़ किया इस काम से तुम मुशरीक नहीं होगें १
मालिकः न,
सादिक़ किया कुरआन को चूमते हो, वे चमढ़ा और कागज़ व्यतीत और कुछ नहीं है १
मालिकः ख़ैर, ऐसा है.
सादिक़ इस बिना पर, तुम ख़ुदा बन्दे अलम के लिये शरीक के काएल हो गए और ये शरीक चमढ़ा है जो जन्तु के चमढ़े से बना हूआ है, लेकिन ख़ुदा बन्दे अलम इस चीज़ से पाक पबित्र है.
मालिकः न ऐसी बात नहीं है. इस हिसाब से कुरआने मजीद को चूमता हूँ, कि वे अल्लाह के पबित्र वाणी व कलाम है. और ये काम मुहब्बत और प्रेम की कारण से सम्पादान होता है. लेकिन ये बताउ ये काम कहाँ शिर्क है १ पबित्र कुरआन मजीद को चूमा देना तथा सवाब का अधिकार बनना। पबित्र कुरआन को चूमाना तथा अल्लाह सवाब प्रदान करते है. और ये काम किसी तरीके से शिर्क से कोई सम्पर्क नहीं रख़ता, और शिर्क से बहुत दूर है।
सादिक़ः जब ऐसी बात है, पैग़म्बरे अकरम (साः) और इमाम (अः)(23) की ज़रीहह और रौज़ा मुबारक को चूमाने के विषय को क्यों क़बूल नहीं करते १
शायेद तुम कहो गे की जब वे लोग ज़रीहहको चूमाते है, लोहा को ख़ुदा के साथ शरीक क़रार देते है! अगर इस तरह की कथा सही व सठिक हो, तो हर स्थान पर लोहा प्रदर्शन होता है तो उन लोहा को क्यों चूमते नहीं१ हरगिज़ इस तरह कि कोई बात नहीं है (और हो-ही नहीं सकती), वे लोग पैग़म्बर अकरम (साः) और इमाम (अः) की ज़रीहह को इस हिसाब से चुमते है कि तुर्बते पाके पैग़म्बर अकरम (साः) या इमाम (अः) के तुर्बते पाक उस ज़रीहह के भीतर उपस्थीत है, चुकिं वे सब व्यक्तित्वपूर्ण व्यक्तियों हमारे दरमियान उपस्थित न होने के कारण अपनी मुहब्बत और प्रेम को प्रकाश करके उन व्यक्तियों के ऊपर अपने को निसार करते है, इस बिनापर इस कृत काम के लिये अल्लाह के निकट सवाब मौजूद है. क्योंकि ज़रीहह को चूमने से उन महान व्यक्तियों को महान समझना है. हक़िक़त में (अगर देख़ा जाए) उन महान व्यक्तियों को सम्मान प्रदर्शन करना तथा इसलाम-धर्म को सम्मान प्रदर्शन करना बराबर है. वे सब महान व्यक्तियों इस बिधानें पर आमन्त्रन किया करते थें. लिहाज़ा इसलाम के महान व्यक्तियों को सम्मान प्रदर्शन करना अल्लाह के समस्त प्रकार आदेश व निषेध को सम्मान प्रदर्शन करना है, ख़ुदा बन्दे आलम इस विषय सम्बन्ध में ईर्शाद फ़रमाता हैः (जो व्यक्ति अल्लाह की आयतों को सम्मान प्रदर्शन करते है हक़ीक़त में वे लोग पबित्र मन वाले है)।
मालिकः अगर ऐसी बात है तो कुछ लोग तुम सब को मुशरीक क्यों कहते है १
सादिक़ः हदीस में बर्णना हूआ हैः कि
إنما الأعمال بالنيات؛ काज-क्रमों का फ़ल अपनी नियत पर है ( और इस बुनयाद पर अपने अमल की जज़ा व सज़ा दी जाएगी)।(24) अगर इस हिसाब से ज़रीहह को शिर्क की नियत से चूमा जाये, वे यकीनन मुशरीक है। हाँ, अगर कोई व्यक्ति मुहब्बत और प्रेम के कारण ज़रीहह मुबारक और अल्लाह की आयातों को सम्मान प्रदशर्न, और सवाब कि ग़रज़ से करे यक़ीनन वे सवाब के अधिकार के अधिक हक़दार है, अब तुमहारे लिये सम्भंब है कि शिया व सुन्नी से ज़रीहह के चूमाने सम्पर्क इस विषय सम्पर्क पूछे यक़ीनन तुम सुनोगे कि मुहब्बत और प्रेम व सवाब के कारण से ज़रीहह मुबारक को चूमना यहां तक की इस सम्पर्क जो कुछ कहा गया है अब कभी इस के बिपरीत नहीं सुनोगें ।
मालिकः सहीं है.
सादिक़ः अगर कोई ज़रीह मुबारक को बोसा दिये बिगैर शिर्क के, और इस कारण के बिना पर इंसान को मुशरीक क़रार दिये, बिना शक व शुबह के हत्ता एक व्यक्ति को मुशरीक व्यतीत कुछ नहीं पाउ गे, क्योंकि मुसलमान ज़रीह या कुरआन को बोसा प्रदान करते है, हर दो अबस्था में तमाम प्रकार मुसलमान मुशरीक है, अब मै तुम से प्रश्न करता हूँ इस अबस्था में किसी एक को मुसलमान पाआगे१
मालिकः अधिक अधिक धन्याबाद, इस विषय को अपने पिताजी के निकट पेश करुगाँ. क्योंकि इस विषय सम्पर्क अन्तर भर बिद्बेष को हमारे अन्दर ढाला है अब जो कुछ मै सुना हूँ सठिक व सही. व हक़ीक़त शि्योंके साथ है और सठिक सही प्रमाण द्बारा हम को परीचित किए हो तुमहारी मन्नत हमारे ऊपर सब समय बाक़ी रहै, मै भी बगैर बर्सी और तहक़ीक़ के कोई भी कथा उल्लेख़ नही करुगां।

 

औलिया ख़ुदा से (साधना) सहायता मागंना

वह मन भर दुख़ से अपने से कहने लगा, वाए हो इन मुशरिक व काफ़िर व्यक्तियों व ज़न्दीक़.....पर। कि यह सब आप अपने को एक मुसलमान कहलाते है वाए....हो।
मोहम्मदः उस से कहाः किन लोगों को कह रहै हो१
कमालः शिया व्यक्तियों को कह रहा हूँ!
मोहम्मदः उन लोगों का बदनाम न करों, और मुशरिक भी मत कहा करो क्योंकि वह लोग भी मुसलमान है.
कमालः उन लोगों का हत्या करना काफ़िर लोगों से अधिक उत्तम है।
मोहम्मदः यह शैतानी तुमहारे भीतर किस लिए है १ और किस प्रमाण के साथ वह लोग मुशरिक है १
कमालः वह लोग अल्लाह के किनारे अपर ख़ुदा को शरण करते है और जो चीज़ अल्लाह व्यतीत शरण करते है संम्भब नहीं है कि वह उन लोगों को लाभ व नुक़सान पहूँचाए।
मोहम्मदः किस तरह और यह कभी संम्भब नहीं है१
कमालः वह लोग पैग़म्बर, व इमामान व ओलिया-ए खु़दा से सहायता मागंता है. अपर शवदो में कहूः या रसूलुल्लाह, या अली, या हुसैन, या साहेबुज़ ज़मान व..... वह लोग उन व्यक्तियों से अपनी हाजत मागंते है ताकि वह लोग उन की हाजत को पूरी करें, शिया लोग यक़ीन करते है कि वह व्यक्तियां ओलिया-ए ख़ुदा है और उन लोगों से सम्भंब है कि उन की हाजत को पूरी कर दें, क्या तुमहारी दृष्ट में यह प्रकाश्व शिर्क नहीं है, और अल्लाह के व्यतीत किसी एक को शरण करना शिर्क नहीं है १
मोहम्मदः अगर आदेश देते हो तो तुमहारे लिए कुछ बयान करुँ.
कमालः बोलोः
मोहम्मदः मै भी उन व्यक्तियों में से एक था जो व्यक्ति शिया लोगों को बगैर अपराध और भूल-भ्रान्ती के मिथ्यांरोप क़रार देता था, और जब समय मिलता था उन व्यक्तियों के अनुपस्थीत में बदनाम करता था, बिल आख़र एक दिन हज के भ्रमण पर किसी एक शिया के साथी हो गया, और शिया लोगों पर बदगुमान होने के कारण जो कुछ ज़बान (भाषा) पर आया बोल दिया, और कई बर्ष के मन के बिद्बष को अपनी भाषा द्बारा प्रकाश कर दिया, लेकिन वह सब्र के साथ ख़ामोश रहा लेकिन उस के चेहरे से ख़ुश आख़लाक़ का एलामत प्रकाश हो रहा था, किन्तू हमारे यह ब्यबहार देख कर मात्र हसंता था, जितना मै अपनी भाषा पर गालियां में बेशि करता था वह मात्र मुसकुरा के मेंहेरवाणी का दृष्ट हमारे तरफ़ फ़िरया करता था. उस की सदाचार व्यबहार हमारी बद आख़लाक़ व अ-साधआरण व्यबहार को लज्जित कर दिया, मै कुछ समय तक चुप रहा, वह हमारे तरफ़ मूंह करके कहाः ए मुसलमान द्बीनी भाई, मोहम्मदः अनुमति देते हो मै भी तुम से कुछ बात करुँ१ हमारे और उस के दर्मियान विभिन्न प्रकार विषय सम्पर्क बातचीत हुई. उस में एक जो हम को सही और हक़्क़ानियत को कबूल करने पर बाध्य किया वह विषय जो ओलिया ख़ुदा से सहायता मागंना था.
कमालः धोका, और शैतानी, तुमहारे अदंर प्रभाब कर लिया है.... तुम को दीन इसलाम सम्पर्क ज्ञान बहूत कम है!
मोहम्मदः मै उपस्थित हूँ. ताकि कुरआने करीम, और रसूले पाक (साः) के सुन्नत और सालेह मुसलमान, और ओलिया ख़ुदा से सहायता कामना करने के सम्पर्क तुम से कुछ बातचीत करुँ.
कमालः अल्लाह पाक अपने सब बान्दों को ख़लक़ करने के कारण अधिक से अधिक मेंहैरबान है। उस के और बान्दों के दर्मियान एक सम्पर्क बनाने का किसी क़िस्म का कोई पार्थक नहीं है। अल्लाह का बन्दा किसी स्थान और किसी समय में भी हो, और कहीं भी हो उचित है कि मुस्तक़ीम और किसी के सहायता व्यतीत उस से सम्पर्क क़ाएम करें, लेकिन अल्लाह व्यतीत किसी और से सहायता कामना करना चाहै वह लोग पैग़म्बर, इमामान, और फ़रिश्ते या सालेह बन्दा क्यों न हो सहायता कामना करना शरीयत के मुताबिक़ शुद्ध नहीं है. बल्कि ना-जाएज़ है. अगरछे उन लोगों का व्यक्तित्व अल्लाह के निकट एक स्थान पर क्यों न हो.
मोहम्मदः उन लोगों से सहायता मागंना जाएज़ क्यों नहीं है१
कमालः इंसान मृत के बाद अनुपस्थित है (अर्थात मादुम यानी उपस्थित नहीं है) जो चले गए वह किसी कार्य के व्यबहार के उपयुक्त नहीं है. लिहज़ा यह क्यों कर सम्भंब हो सकता है कि जो उपस्थित नहीं है उस से सहायता कामना करे या मागें १
मोहम्मदः किस दलील व प्रमाण के साथ कह रहे हो कि वह सब मृत है, और उपस्थित भी नहीं है १ और कौन व्यक्ति इस विषय को कहा है१
कमालः इमाम मुहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब फ़रमाते हैः कि (जो सालेह और सदाचार, नेककार व्यक्ति इस पृथ्वी से चले गए, उन लेगों से सहायता कामना या सहायता मागंना तथा अनुपस्थित चीजों से सहायता मागंना बराबर है, और यह काम अक़्ल की दृष्ट से अपसन्द और बुरा है. और उनके एक अनुशरण करने वाले ने नक़्ल किया है कि वह (मुहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब) उन के उपस्थित में कहा है, या वह सुना है जिस पर वह राज़ी था जिस को वह ताईद किया है ( मुहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब फ़रमाते हैः कि यह मेंरी लाठी है ( नाउज़ बिल्लाह) यह उस से बहुत बहतर और मदद करने वाला है, चूकि यह लाठी सांप और बिच्छू वगैरह को मारने के लिए काम आते है और इस लाठी को व्बहार किया जा सकता है. हालाकि मुहम्मद (साः) मर गए उस से कुछ फायदा हासिल नहीं होगा।(25) (और न फायदा लिया जा सकता है)।
इस बिना पर, जो विषय कथा हो चुका है या उस के उधाहरण कथाएं अक़्ल के निकट उन मृत व्यक्तियों से सहायता मागंना अ-पसन्द है, अगरचे वह मृत व्यक्ति पैग़म्बर ही क्यों न हो।
मोहम्मदः यह विषय सम्पूर्ण उलटा है, क्योंकि इंसान मरने के साथ साथ वह पर्दा उठ जाता है और वह उस चीज़ को देख़ता या परीदर्शन करता है जो जीवित अबस्था में आदमी देख़ नहीं पाता था, अल्लाह इस विषय सम्पर्क ईर्शाद फ़रमाते हैः

فکشفنا عنک غطآءک فبصرک اليوم حديد

मै तुमहारे पर्दा को (तुमहारे ऑख़ के सम्मुख़ से) उठा लिया हूँ और तुमहारी ऑख़े आज अधिक तेज़ है।(26) उस के बाद ईर्शाद फ़रमाते हैः

ولا تقولوا لمن يقتل فی سبيل الله أموات بل أحياء ولکن لا تشعرون

जो व्यक्ति अल्लाह के राह में मृत पाए है उन व्यक्तियों को मृत मत कहो बल्कि वह जीवित है लेकिन तुम उस को नहीं जानते।(27)
अपर एक आयत में ईर्शाद फ़रमाते हैः

ولا تحسبن الذين قتلوا في سبيل الله امواتاً بل احياء عند ربهم يرزقون

जो लोग अल्लाह की राह में शहीद हुए है, उन लोगों को मृत मत समझो बल्कि वह लोग जीबित है और अपने परवरदिगार की तरफ़ से रुज़ी अर्जन करते है।(28) जनाब बुख़ारी बुख़ारी शरीफ़ में बिवरण के साथ लिख़े हैः कि पैग़म्बरे अकरम (साः) किनारे क़लीबे बद्र में आया (जहाँ सैनिक क़त्ल होके पढ़ा हूआ था) आप ने मुशरिक़ीन मृत व्यक्तियों से ख़िताब करके फ़रमायाः ख़ुदा बन्दे मुताल ने हम से जो वादा (प्रतिक्षा) किया था हम सच पाए है, किया तुम सब भी अपने परवरदिगार के वादा को सच पाए हो १
आप से कहा गयाः मृत व्यक्तियों को (जवाब देने के लिए) बुला रहे हो! पैग़म्बंरे अकरम (साः) ने फ़रमायाः
तुम लोग उन लोगों से अधिक (बेशि) सुन्ने वाले नहीं हो।(29)
ग़ज़ाली (ग़ज़ाली शाफई सम्प्रदाय के महान नेता) फ़रमाते हैः ( कुछ लोग सोछते है कि मृत नाबूद है.... यह सोछना मुलहीद और काफ़िर है।(30)
कमालः इमाम ग़ज़ाली मरने के बाद मृत्यु को नाबुद यक़ीन करते है और इस को कुफ्ऱ व इलहाद जानते है१!... यह बात कहाँ कही गई है।
मोहम्मदः आहयाउल उलुम(31) में इस विषय को उल्लेख़ किया है. आगर तुम इस पुस्तक को मुराजे करोगे तो मालूम हो जाए गा।
कमालः गज़ाली साहब की कथा पर आश्चर्य है!
मोहम्मदः गज़ाली साहब की कथा आश्चर्य नहीं है, बल्कि तुम हो, कि उन से अज्ञान हो इस बात पर आश्चर्य है। क्या रसूल (साः) क़लीबे बद्र के मृत्यों के ख़िताब नहीं सुने हो१ चूंकि जो व्यक्ति मर जाते है न सुनने का कोई शक्ति रख़ते है और न समझने कि शक्ति, लिहज़ा पैग़म्बर अकरम (साः) कि कथा कहना बाक़ी नहीं रहती किः पैग़म्बर अकरम (साः) ने फ़रमायाः तुम लोग उन लोगों से अधिक सुन्ने वाले नहीं हो।(32) लिहज़ा पैग़म्बर अकरम (साः) ने जो कुछ फ़रमाया है वह यह है, कि वह मरने वाले व्यक्ति तुमहारे जैसा सुन ने वाले और समझ ने वाले है, अब तुम विश्वाश (यक़ीन) किए हो१
कमालः मै हैरात में हूँ कि किस तरह तमाम सालों में इस आएत सम्पर्क गभींर चिन्ता नहीं कि ताकि अस्ल उद्देश्व को हासिल कर सकूँ और किस तरह (हत्ता एक बार भी) पैग़म्बर (साः) कि इस हदीस को प्रसिद्ध आलेम और मनुष्य व्यक्तियों से भी नहीं सुना।
मोहम्मदः अब तुम क़बूल किए हो कि शियों का कहना है कि मृत व्यक्ति मृत के बाद नाबूद ना होने का वक़्या, या अभी भी संदेह में हो१
कमालः ना, इस कहने पर संदेह नहीं कर रहा हूँ, बल्कि अपर कोई चीज़ है जो हम को पथभ्रष्ट कर रहा है।
मोहम्मदः किस चीज़ के कारण तुम पथ भ्रष्ट व हैरान में हो१
कमालः यह ग़ज़ाली साहब का इस तरह विश्वास और उस के विपरीत कहने पर मुलहाद और काफ़िर जानते है और पैग़म्बर अकरम (साः) ताकीद भी कर रहे है कि मृत व्यक्तियों जीवित व्यक्ति के उधाहरण सुनते और समझते है। लेकिन मुहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब यक़ीन रख़ते है कि इंसान मृत के बाद नाबुद हो जाते है...!
दूसरी तरफ़ मुहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब के लिए किस तरह सम्भंब हूआ और जसारत के साथ कहाः (हमारे हाथ कि लाठी पैग़म्बर अकरम (साः) से उत्तम है), क्योंकि यह लाठी इंसान को लाभ पहूँचाता है और पैग़म्बर (साः) लाभ नहीं पहूँचाते)।(33) यही विषय है कि हम को आश्चर्य किया है।
मोहम्मदः हैरान और आश्चर्य कि विषय नहीं है. बल्कि हमारे लिए उचित है कि समस्त प्रकार व्यक्तियों को क़ुरआन और रसूल (साः) के सुन्नत और आंतीत सालेह बान्दा के सदाचार व्बहार को तराज़ु से तोले, अगर उन के व्बहार और चरित्र पवित्र क़ुरआन के मुताबिक़ हो, या आंतीत व्यक्ति और सालेह बान्दा के चरित्र के मुताबिक़ हो, जान लो वह मोमिन है, लेकिन हमारे लिए यह उचित नहीं है कि दीन-इसलाम-धर्म को एक परीचित व्यक्ति के व्यबहार व चरित्र से मिलाएं, हाला अगर किसी व्यक्ति को मोमिन और पवित्र जानते है तो हमारे लिए उचित है कि उस के तमाम प्रकार चरित्र को अगरचे क़ुरआन और सुन्नत के बिपरीत व प्रकाश्व तौर पर कुफ्र व इलहाद क्यों न हो हक़ीक़त में उस को इस्लामी व्यक्ति समझे१ न इस तरह हो नहीं सकता। बल्कि किसी समय जब किसी व्यक्ति को किसी स्थान पर पथ भ्रष्ट होते हूए देख़े तो फौरन हमारे लिए उचित है कि हम उन व्यक्तियों से असंतोष्ट प्रकाश करें और सच्छे और सही हक़ीक़त विषय को अनुशरण करें।
कमालः तुमहारी बात परीपूर्ण तरीके से सही व सठिक़ है..... लेकिन अब तक इस व्यक्ति (मुहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब) पर एक दृढ़ इमान रखा था, लेकिन उसकी भूल- भ्रान्ती को मुझे एक कुफ्र व इलहाद कि तरफ़ ले जा रहा है, उसके ऊपर कुफ़्र इमान रख़ने से आगाह करने पर उस के ऊपर से हमारा इमान स्थीत हूआ, हालाकि मै उस को एक इस्लाम के नेता और रहबर मानता था और उस से दीन-इसलाम के समस्त प्रकार आहकाम को अर्जन करने के लिए एक ज्ञानी आलिम जानता था लेकिन अज से इस तरह तक़लीद से विरत रहना पढ़ेगा।
मोहम्मदः (मुहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब कि कथाएं को छोढ़ के हम सब अपने विषय कि तरफ़ चले आएं।
कमालः सहीं है. मै तुम्हारी कथा को क़बूल करता हूँ कि इंसान मृत के बाद निस्त व नाबूद नहीं होता, लेकिन कहा जाता है किः ( अल्लाह के मख़लूक़ से सहायता मागंना-अर्जन करना शिर्क़ और इस्लाम को बर्बाद करना बराबर है) लेकिन यह किसतरह सम्भंब हो सकता है कि पैग़म्बर अकरम व इमाम (अः) या किसी एक सालेहीन बन्दा से सहायता लिया जा सकता है १
मोहम्मदः जीवित व्यक्ति से दोआ मागंना या किसी चीज़ के लिए आवेदन करना या इस तरह कहूँ कि आए बाक़िर, मुहम्मद, जाफर, रिज़ा वगैरह मुझे कुछ दिनार या पैसा प्रदान करो, या हमारे लिए अल्लाह के निकट क्षमा प्रार्थना करो, या हमारे हाथ पकढ़ कर मसजिद ले चलो..... क्या शरीयत के दृष्ट से शुद्ध व जाएज़ है १
कमालः हालाकिं यह जाएज़ व शुद्ध है।
मोहम्मदः जब तुमहारे निकट यह कथा प्रमाण हो चुकी है कि मृत इंसान जीवित इंसान के उधारण सुनता है तब उस से किसी चीज़ का आवेदन करना या मागंना किया माना रख़ता है १
कमालः अपने माथा को बुलन्द करके कहा, इसतरह है जैसा तुम कह रहे हो तब सही है.
मोहम्मदः पैग़म्बर अकरम (साः) और अपर सालेहीन बन्दों से सहायता कामना करने के समंधं कोई दूसरी दलील व प्रमाण हमारे निकट उपस्थित है।
कमालः वह दलील क्या है १
मोहम्मदः नबी करीम (साः) के सहाबा(34) रसूल अकरम (साः) के जीवित अबस्था और उनकी मृत्यु के बाद उनके साहाबा उन से सहायता मागां करते थें। हत्ता पैग़म्बर अकरम (साः) जीवित अबस्था में अपने सहाबा और अपर दोस्तों को इस काम-कार्य से निषेध घोषणा नहीं फ़रमाते थें, अगर अल्लाह व्यतीत अपर व्यक्ति से सहायता कामना करना शिर्क है, विना संदेह के आप इस कार्य से यक़ीनि तौर पर निषेध फ़रमाते।
मोहम्मदः उधाहरण के तौर पर कई उधाहरण पेश करता हूँ। (बिहक़ी)(35) व (इब्ने अबी शैबा) सही दलील और प्रमाण के साथ विबरण किया और आहमद इब्ने जैनी दैलान भी रीवाएत कि है, किः ( उमर की ख़िलाफ़त के यूग में, जनसाधारण जनता व्यक्ति ख़रा (कहत) में असहाय हो गया था (बिलाल इब्ने हर्स). रसुल (साः) की कब्र के निकट जाकर कहाः ए रसुले ख़ुदा अपनी क़ौम के लिए अल्लाह से पानी के लिए प्रर्थना करे ताकि (भूक और ख़रा से दूर रहे) क्योंकि जनसाधारण जनता व्यक्ति नाबूद में गिरफ़्तार हो गए है)(36)
हम सब जानते है कि बिलाल एक यूग तक हज़रत रसूल (साः) के पबित्र ख़िदमत (सेवा) और उन के साहाबा में से थे और इस्लाम के समस्त प्रकार विधान-क़ानून को बिना माध्यम अर्जन किया है अगर पैग़म्बर अकरम (साः) से सहायता कामना करना और उन से मदद मागंना शिर्क होता बिलाल यक़ीनन इस काम को अंजाम न देता, और इस तरह के काम से विरत रहते, अगर आप इस तरह करते अपर साहाबा भी उस काम से यक़ीनन निषेध करते, और यही एक दृढ़ विषय है कि पैग़म्बर अकरम (साः) से सहायता कामना करना एक मुस्तहकम दलील व प्रमाण है।
बेह्क़ी उमर इब्ने ख़त्ताब से वर्णन किया है किः रसूले ख़ुदा (साः) इर्शाद फ़रमाते है जिस समय हज़रत आदम (अः) भुल-भ्रान्ती में लिप्त हो गए उस समय कहाः

يا رب أسئلک بحق محمد (ص) إلا ما غفرت لی...؛

ए अल्लाह, तुम से प्रर्थना चाहता हूँ मुहम्मद (साः) का शपथ दे कर मेंरी भूल-भ्रान्ती-ग़ल्तियों को क्षमा करना...।(37)
इस विना पर अगर पैग़म्बर अकरम (साः) से सहायता व मदद कामना करना हराम व शिर्क होता यक़ीनन हज़रत आदम (अः) इस तरह के काम-कार्य अंजाम न देता।
अपर एक हादीस में घोषणा हूआ है किः (जिस समय मन्सूर दवानक़ी हज के लिए भ्रमण किया उस समय मन्सूर दवानक़ी हज़रत रसूल ख़ुदा (साः) के क़ब्रे मुबारक पर तशरीफ़ ले गए और उस स्थान पर मालिक(38) (मालिक सम्प्रदाय के महान नेता) से कहाः ए अबु अब्दुल्लाह, हम सब क़िब्ला कि तरफ़ अपना चेहरा करके ख़ढ़े हो जाए और अल्लाह के दर्बार में प्रार्थना करें इस शर्त के साथ कि हम सब रसूले ख़ुदा (साः) के क़ब्र कि तरफ़ अपना चेहरा करें १
मालिक ने कहाः क्यों पैग़म्बर अकरम (साः) तुमहारे और तुमहारे पिता हज़रत आदम (अः) अल्लाह के दर्बार में माथा निचुं न करे १ उस तरफ़ अपने चेहरा करो और उन को अपना शाफ़ी क़रार दो (विना शक व शुबहा) ख़ुदा बन्दे आलम उस की शफ़अत को तुमहारे लिए क़बूल करेगें, क्योंकि ख़ुदा बन्दे आलम ईर्शाद फ़रमायाः

(....و لو أنهم إذ ظلموا أنفسهم جآءک فاستغفروا الله واستغفر لهم الرسول لوجدو ا الله توابا رحيماً)

जिस समय वह सब अपने नफ़्स पर ज़ुल्म करते थे, तुमहारे निकट यक़ीनन आते थे और अल्लाह से क्षमा प्रार्थना करते थे और पैग़म्बर अकरम (साः) भी उन व्यक्तियों के लिए क्षमा प्रार्थना करते थें, यक़ीनन ख़ुदा तौवा क़बूल करने वाले और मेंहेरवान है।(39)
इस इबारत का माना यह है कि पैग़म्बर अकरम (साः) से साधना कामना करना जाएज़ व शुद्ध है बल्कि मुस्तहब्बे मुअक्क़दा भी है। (दर्मी) अपनी सही ग्रन्थ में (अबुल ज़ुज़ा) से नक़्ल करते हैः कि (जिस समय मदीना शहर के जनसाधारण व्यक्ति ख़रा में गिरप़्तार हो गए और इस गिरफ़्तारी के कारण आएशा के निकट नालीश ले गए,आएशा कहीः तुम सब अपने अपने मन को रसूले ख़ुदा (साः) के क़ब्र कि तरफ़ करो और इस तरह अल्लाह से प्रार्थना करो कि तुमहारे और अल्लाह के दर्मियान कोई चीज़ या पदार्थ उपस्थित न हो और रसुले ख़ुदा (साः) को अल्लाह के निकट अपना शफ़ाअत क़रार दो) वह जनसाधारण व्यक्तियों ने इस तरह किया और चले गए इस के नतीजे में आकाश से पानी बर्सा, और तमाम प्रकार घास सबज़ी में परिवर्तन हो गए, ऊट इस तरह चरण किया कि अधिक से अधिक चर्बी और मोटा हो गए और उस बर्स को (मोटा बर्स ) रख़ा गया।(40)
जो कुछ बयान किया गया है अधिक से अधिक रिवायतें पूस्तकों में उपस्थित है जो पैग़म्बरे अकरम (साः) से साधना मागंना और उन से मदद कामना करना जाएज़ व शुद्ध है कि पैग़म्बरे अकरम (साः) की मृत के बाद का वाक़ीआ और धटनाएं पर प्रमाण कर रहा है. इस विना पर पैग़म्बरे अकरम (साः) से साधता कामना करना जाएज़ था, और जायोज़ है हराम व शिर्क नहीं है. और इसी तरह के उधाहरण इमाम और फरिश्ते व सालेहीन बन्दों से साधना कामना करना शुद्ध है अगर इन व्यक्तियों से मदद कामना करना हराम व ना-जाएज़ हो यहाँ तक कि (यक़ीनन) पैग़म्बरे अकरम (साः) से सहायता व मदद कामना करना ना-जाएज़ है. और अगर जाएज़ हो मात्र पैग़म्बर अकरम (साः) से नहीं बल्कि समस्त प्रकार अल्लाह के सालेह बन्दों से जाएज़ हिसाब किया जाएगा।
कमालः अश्चर्य विषय है किः जो हदीस व रिवायतें जो तुम बयान किए हो अभी तक मैने सुना था और न देख़ा था।
मोहम्मदः इस सूरत में अगर हदीस व रिवायतें कि पूस्तकें पर्या लोचन करोगे तो यक़ीनन अधिक से अधिक रिवायतें व हदीसें प्रदर्शन करोगे कि पैग़म्बरे अकरम (साः) से साधता कामना करना जाएज़ और शुद्ध भी है। जो कुछ तुमहारे लिए बयान किया हूँ. चुकि रात कि शबनम समुद्र के सामने कुछ नहीं है इस समय एक नतीजे में पहुँचेंगे कि सालेह बन्दों के सम्बधं ज़्यादा ज्ञान नहीं रख़ते हो।
कमालः अधिक से अधिक हदीसों कि पूस्तकें पर्या लोचन करने का शौक़ है लेकिन मुझे विभिन्न प्रकार के कार्य इस काम से विरत रख़ा है।
मोहम्मदः तुम हदीसों कि ज्ञान ज़्यादा नहीं रख़ते हो क्या यह कथा सठीक है कि मोहम्मदः इब्ने अब्दुल वहाब जो कुछ शिया सम्प्रदाय के सम्पर्क एक दुशनाम व अपवाद दिया है उन व्यक्तियों को तुम शिर्क़ कह कर अपवाद देते हो१ यह काम सठिक नहीं है अगर मुझे अनुमति देते हो तो मै तुम से कुछ बयान करुँ।
कमालः हसंते हूए अपना होटों को फैला कर कहाः जो कुछ तुमहारे दिल में है बयान करों हम सब आपस में दोस्त है इस लिए इस विषय को तुमहारे सामने रख़ा है ताकि तुमहारे ज्ञानों से मै भी कुछ ज्ञान हासिल करुँ।
मोहम्मदः यक़ीनन तुम क़ुराएश के काफिर जैसे हो क्योकिं वह सब अपना पिताजी-दादाजी के बुत परस्त के बहाना देकर कहते थेः

(...إنا وجدنآ آبائنا على أمة و إنا على آثارهم مقتدون)

हम सब अपने पितायों को बुत के रास्ते पर देख़े है और उन्ही को अनुसनण करते है।(41)
वह लोग बुत परस्ती को अपना सही व सठिक रास्ता जानते थे. जानते हो क्यों ख़ुदा बन्दे आलम ने उन को सर्ज़नीश क़रार दिया था१ इस लिए उन लोगों को सर्ज़नशीश क़रार दिया था कि. पैग़म्बरे अकरम (साः) के वाणी व कथाएं पर कान नहीं दिया करता था ताकि उन के सही कहने और न-कहने पर फायदा हासिल करें और उसी तरह अपने बुत परस्त पर दृढ़ रहता था।
मै गभींर मन से तुम से निवेदन कर रहा हूँ, कि अपने पिताजी के रास्ता को अनुसरण न करों बल्कि सही और सठिक चिन्ता के साथ हक़ीक़त को हासिल करने के लिए दृढ़ रहो और अपनी जीवन को उसि सही राह पर चलाने के लिए कोशिश करो और अधिक से अधिक हदीसों की पूस्तकें पर्यालोचन करने कोशिश करो तो मालूम हो जाए गा. कि अपर धर्मों कि पैग़म्बर अकरम (साः) और अल्लाह के सालेहीन बन्दों से साधना कामना करना, अपर समस्त प्रकार सम्प्रदाय के दृष्ट से सम्पूर्ण पार्थक है क्या इस विषय को क़बूल करते हो१
कामालः प्रकाश्व तौर पर यह सच्चा विषय शिया और अपर मुस्लमानों के साथ है.
अब तुम बताओ कि शिया सम्पर्क जो झूटी मिथ्यांरोप और तोह्मत दिया हूँ क्या करुँ१
मोहम्मदः अल्लाह के दर्रबार में क्षमा प्रार्थना करो, और सब समय सच्ची और सठीक़ विषय को पाने के लिए चेष्टा करो ताकि ख़ुदा बन्दे आलम तुमहे क्षमा करे. और जो कुछ शिया सम्प्रदाय के विश्वाश व अक़ीदा सम्पर्क सुनो साथ ही साथ उस को पर्या लोचन करों ताकि उसकी हक़ीक़त और सही विषय से यक़ीन हासिल हो जाएं, और ताअस्सुब को अपने अदंर से दूर करो, क्योंकि रसूले खुदा (साः) ने ईर्शाद फ़रमाया हैः कि बगै़र प्रमाण व दलील के साथ किसी एक से दुश्मनी पैदा करना उसकी स्थान जहन्नुम है)
कमालः अब मै इस तरह करुँगा मूझे हक़ीक़त से आगाह करने पर धन्वाबाद आदा करता हूँ।

 

क़ब्र की ज़्यारत (दर्शन) करना

जमालः तुम शिया समुदाय क्यों बिना दलील झगड़ा और फ़साद करते हो इस से तुम लोगों को किया फ़ायदा मिलता है१
जवादः कौन सा फसाद१
जमालः वह ये कि तुम सब इमामों और औलियाऐ ईलाही की क़बरों पर जाते हो और उसे चूमते हो।
जवादः तो इस में तुम्हे कौन सा झगड़ा नज़र आ रहा है १
जमालः ये काम हराम और शिर्क है।
जवादः मै तुम से अश्चर्य अनुभब कर रहा हूँ, क्योंकि तुम अज्ञानी व्यक्तियों कि तरह कथा कह रहै हो १ मै कभी सोचता नहीं था कि तुम बिना दलील और प्रमान के बात करोगो,
जमालः तुमहारी नज़र में ये कहना मज़हब और सम्प्रदाय दुशमनि के व्यतीत कुछ नहीं है १
जवादः यक़ीनन ये व्यतीत और कोई दूसरी चीज़ नहीं है.
जमालः तुम किसतरह इस नतीजे पर पहुचे हो १
जवादः हमारी इस विषय का परिष्कार होना, और इमाम व पैग़म्बराने ईलाहि की मज़ार शरीफ़ के बिषय को परिष्कार तरीके से पर्यालोचना करना ताकि स्पस्ट तरीके से मालूम हो जाए कि कौन व्यक्ति हक और कौन व्यक्ति बातिल और पथभ्रष्ट पर है १
जमालः मै पूरी तरिके से तैयार हूँ, क्योंकि मै जानता हूँ कि क़बरबासियों की ज़ियारत करना शिर्क है.
जमालः इस बुनयाद पर मुशरीक बूतों की इबादत करते है उस से किया मिलता जुलता है.
जवादः इस बुनयाद पर शिर्क समझ रहै हो १
जमालः हाँ, चुकिं मुशरीक हजरात बुतोंके निकट जमा होते है और तुम सब क़बरों के निकट जमा होते हो।
जवादः क़बरों के निकट जमा होना क़बरों की ज़ियारत को शिर्क में मिला दिया है १
जमालः हाँ.
जवादः इस बुनयाद पर तमाम मुसलमान और समस्त प्रकार जनसाधारण मुशरीक है और तुम भि मुशरीक हो!...
जमालः क्यों और कैसे.
जवादः किया हज के भ्रमण में गए हो१
जमालः अल्लाह का शुक्र है.
जवादः मसजिदुल हराम में नमाज़ पढ़ी है.
जमालः अल्लाह का फज़्ल व करम है.
जवादः यक़ीनन तुमने देखा होगा कि समस्त प्रकार मुसलमान के चेहरा नमाज़ कि हालत में काबा घर की तरफ रहता है, लेकिन कुछ लोग मग़रीब के पिछे, और कुछ लोग दक्षिण, और कुछ लोग पूरब की तरफ करके ख़ड़े है और इस हाल में नमाज़ अदा कर रहै है.
जमालः हाँ , देख़ा हूँ, बल्कि ख़ुद भि इस तरह करते थे और जिस स्थान पर काबा घर का चेहरा देखता था उस तरफ अपने चेहरे को फेर देता था. उचित ये है कि नमाज़ को काबा घर कि तरफ मूंह करके अदा कि जाए वरना ये व्तीत नमाज़ बातिल है.
जवादः यही दलील व प्रमाण है कि समस्त प्रकार मुसलमान मुशरीक है और तुम भि मुशरीक हो.
जमालः क्यों
जवादः नमाज़ की हालत में अपने चेहरे को काबा घर कि तरफ करना जैसा कि अपने बुतों को परस्तिश करना, इस पार्थक के साथ कि वे लोग परस्तिश कि हालत में अपने चेहरा को हाथ के बने हूआ बुत कि तरफ़ करते है, और तुम नमाज़ कि हालत में पथ्थर के बने हूए घर कि तरफ मूंह करते हो.
जमालः अपने चेहरे को काबा घर कि तरफ करना और बुतोंकि तरफ करना एक बृहत पार्थक है.
जवादः एक अन्य से किया पार्थक है१
जमालः मै और अपर मुसलमान नमाज़ की हालत में अपने चेहरे को काबा घर कि तरफ करते है, इस का माना ये नहीं है कि उस बुत की अल्लाह के परिवर्तण में इबादत कर रहा हूँ, बल्कि अल्लाह के आदेश व निर्देश का पालन कर रहा हूँ, लेकिन बुत परस्तार अल्लाह के परीवर्तण में बुतों को परस्तार करते है, और इबादत की हालत में उस की तरफ मूंह करके ख़ड़े होते है, इस बुनयाद पर वे लोग इबादत कि हालत में अपने तमाम वजूद को बुतों कि तरफ़ करते है और उस की इबादत करते है लेकिन हम सब नमाज़ कि हालत में अपने समस्त प्रकार वजूद और ध्यान धारणा को अल्लाह कि तरफ़ कर लेते है, इस हिसाब से उन लोगों का काम प्रकाश्व तौर पर शिर्क है, लेकिन हम सब अपने मूंह को काबा घर कि तरफ करते है तथा अल्लाह के समस्त प्रकार आदेशों का पालन करते है किया हम सब मुशरीक है१ हमारी और उसकी इबादत में ज़मीन व आसमान का पार्थक है.
जवादः इस का अनुरुप कारण ये है कि काम करने वाले का काम शिर्क नहीं है. इस अवस्था में तुमहारा काम शिर्क है, इस दलील और प्रमाण के कारण तुमहारे काम उन लोगों के मूर्ति कि तरह होता उन लोगों की नीयत व मक़सद मूर्तियों को परस्तिश करना, ना प्रेटिकल अन्जाम देना
जमालः इसतरह है
जवादः हम शिया व अन्य मुसलमान सम्प्रदाय जब रसुल (सा0) व इमाम (अः) के मर्क़द की ज़ियारत करते है (तो उस समय हमारी नीयत) परस्तार की हिसाब से नीयत नहीं रहती, हाँ सम्भब है कि हमारे और मुशरिक के अमल को तुलना करें, हो सकता है कि हमारे और उस के दर्मियान अनुरुब व्बहार देखा जा सकता है.
लेकिन उस समय मात्र अल्लाह के उद्देश्व व्यतीत और किसी का उद्देश्व नहीं रहता, क़बर वासीयों की ज़ियारत करना हराम, और ना दूषित है बल्कि हदीस शरीफ़ में आया है किः नीयत की बुनयाद पर हर अमल व कर्मोंका का फ़ल प्रदान किया जाएगा(42) , इस हिसाब से अगर कोई अमल करें उस नीयत के अनुसार अमल का फ़ल दिया जाएगा, और अगर अल्लाह के व्यतीत कोई इबादत करे तो उस इबादत को शिर्क से हिसाब किया जाएगा, और अगर इस तरह की नीयत न हो तो वे इबादत शुद्ध और सही है, उधारण के तौर पर अगर कोई नमाज़ अदा कर रहा हो और उस के सामने-सम्मुख़ बुत रख़ा हो अगर उसकी नीयत उस बुत की हो, तो वे इबादत शिर्क, और इसतरह कि इबादत बुतवाली इबादत में हिसाब किया जाएगी, और अगर उस की नीयत बुत व्यतीत सम्पादन हो तो उसकि नमाज़ सही और बगैर शक व शुबह के क़बूल है मुशरीक हिसाब नहीं किया जाएगा ।
जमालः गंभीर चिन्ता व चेताउना के साथ कहाः हो सकता है कि जो कुछ तुम ने उल्लेख़ किया हैः वे सही और निर्भुल है हम अल्लाह के दरबार में प्रार्थना करते है कि खुदा बन्दे आलम हमारे लिये तुम को एक तकिएगाह क़रार दे, क्योंकि तुम ने हमारे लिये बहूत गुरुत्वपूर्ण बिषय को उलेलख़ किया है. चुकिं मै उभय सम्प्रदाय के दरमियान सम्प्रदाय बिद्बष के प्रभाब से सठिक रास्ते से पथ भ्रष्ट थे, लेकिन तुम से एक प्रश्न है.
जवादः पूछोः
जमालः इस समय तक जो कुछ मै समझा हूँ (इस से मालूम होता है) कि क़ब्र की ज़ियारत करना हराम नहीं बल्कि जाएज़ भी है, लेकिन इस चीज़ में कौन सि राज़दार बात छुपी है कि तुम शिया इस बिषय़ को अधिक से अधिक गुरुत्व देते हो, किया उसकी कोई प्रमाण व दलील भी है १
जवादः जियारत करना मुस्तहबे मुआक्कद है.
जमालः किया ये काम मुस्तहब है.
जवादः हाँ, मुस्तहब है, और ज़यादा ताकीद भी की गयी है.
जमालः ऐसी कोई हदीस है, जो आइम्मा (अः) और पैग़म्बरे अकरम (सा0) व सालेहीन व्याक्तियों के क़बरों की ज़ियारत के लिये प्रमाण रख़ता हो१
जवादः इस सम्पर्क अधिक से अधिक हदीस व रिवाएत उपस्थित है, इसलाम के प्रथम यूग से लेकर रसूल (सा0) का अमल और मुसलमानों के चरीत्र आज तक क़बरों के मुस्तहब सम्पर्क ताकीद व गुरुत्व के साथ बता रहा है.
जमालः इस सम्पर्क कोई रिवाएत बयान करों,
जवादः रिवाएत में आया है किः
1- पैग़म्बर अकरम (सा0) ज़ियारत के उद्देश्व से ओहद यूद्ध के समस्त शहीदों की क़बरों पर तशरीफ़ ले गए थें।(43)
2- और ये भी रिवाएत हूआ है कि आप जन्नातुल बक़ि में भी तशरीफ़ ले गए थें।
3- सोनाने निसाई, व सुनाने इब्ने माजा व आहया उल ऊलूम में हदीस है कि अबू हूरैरा पैग़म्बर अकरम (सा0) से रिवाएत कि है. आप फ़रमाते हैः

زوروا القبور فإنها تذکرکم الآخرة؛

ईर्शाद होता है किः क़र्बोबासी के ज़ियारत के उद्देश्व क़बरस्तान पर जाउ क्योंकि इस में तुम को आख़ेरत याद आएगी।(44)
4-अबु हूरैरा ने भी नक़्ल किया है.
पैग़म्बर अकराम (सा0) अपने स्वींय माता (आमेंना वहाब कि पुत्री) की क़ब्र के निकट गए, और अपनी माता की क़ब्र के निकट रोने लगे हत्ता आपके चारों तरफ़ के जनसाधारण लोग भि रोने लगें, उस समय आपने फ़रमायाः زوروا القبور فإنها تذکرکم الآخرة. . . . ؛ क़बरबासी के ज़ियारत के उद्देश्व क़बरस्तान पर जाउ क्योंकि इस में तुम को आख़ेरत याद आएगी।(45)
5-हदीसों और रिवातों के मतन में कबर परीदर्शन सम्पर्क, और उसके पद्धति सम्पर्क बर्णना हूआ हैः कि किसतरह कबरों को परीदर्शन किया जाए. जिस में से एक ये है किः अगर प्रत्येक व्यक्ति जान्नतुल बक़ी में जाए, तो कहेः

السلام عليکم أهل الديار من المؤمنين والمسلمين... ؛

सलाम हो तुम पर इस दियार में रहने वाले मुसलेमीन व मोमेनीन...।(46)
यहाँ तक जो कुछ बर्णना किया गया है यह सब मुस्तहब और मोमिन व सालेहीन की क़बरों की ज़ियारत से सम्पर्क था, और इस बिषय में भि मोमेनीन को हिम्मत दिलायी है, इस ज़ियारत सम्पर्क अधिक से अधिक रिवाएत व हदीसें उपस्थित है, जो पैग़म्बर अकराम (सा0) से बयान हूआ हैः जिस में से कुछ ईशारा हो रहा है।
1- दारे क़ुतनि, और बिहक़ी रिवाएत कि हैः कि पैग़म्पब अकरम (सा0) ईर्शाद फ़रमाते हैः من زارني وجيبت له شفاعتي؛ अगर कोई व्यक्ति मेंरी ज़ियारत करे उस व्यक्ति के लिऐ मेंरी शफ़ाअत वाजिब हो जाएगी।(47)
2-पैग़म्बरे अकरम (सा0) से ये भि रिवाएत हूआ हैः

من زارني بالمدينة محتسباً کنت له شفيعاً و شهيداً يوم القيامة؛

अगर कोई व्यक्ति अल्लाह के सन्तुष्ट के लिये मदीना में मेरी ज़ियारत करे, क़्यामत के दिन उस के लिये ग्वाह व शफीय बनुऊगां।(48)
3- नाफे इब्ने उमर से रिवाएत नक़्ल करते हैः कि पैग़म्बर अकरम (सा0) ने ईर्शाद फरमाया हैः

من حج و لم يزرني فقد جفاني؛

अगर कोई व्यक्ति हज को जाएं और मेंरी ज़ियारत न करे बास्तब वे मेरे हक़ में (जफ़ा) ज़ुल्म किया है।(49)
4- अबु हूरैरा पैग़म्बर अकरम (सा0) से नक़्ल किया है, आप फ़रमाते हैः

من زارني بعد موتي فکأنما زارني حياً؛

अगर कोई व्यक्ति मेंरे मृत के बाद ज़ियारत करे, वे ऐसा है जैसा कि हमारे जीवित अबस्था में ज़ियारत को आया है।(50)
5- इब्ने अब्बास हज़रत रसूल (सा0) से रिवाएत कि हैः आप फ़रमाते हैः

من حج و قصدني في مسجدي کانت له حجتان مبرورتان؛

अगर कोई व्यक्ति हज करे और हमारी मस्जिद में आएं, उस के लिये दो हज्जे मक़बूल और दो हज (अल्लाह के निकट दो हज) लिख़ा जाएगा।(51)
अधिक से अधिक रिवाएत उपस्थीत है जो पैग़म्बर अकरम (सा0) व मोमिन और सालेह बन्दों की क़बरों की ज़ियारत के उद्देश्व से ताक़ीद व मुस्तहब होने पर दलील व प्रमाण कर रहा है. किया ये पैग़म्बर अकरम (सा0) का फ़रमान नहीं हैः ( अगर कोई व्यक्ति हज को जाएं और मेरी ज़ियारत न करे) हमारे (हक़) और अधिकार में ज़ुल्म किया है।(52)
आपकी ज़ियारत के लिये मुस्तहब का ये प्रमाण नहीं है १ हदीस कि ईबारत किया हमारी शाफ़ाअत उस के लिये वाजिब हो जाएगी।(53) पैग़म्बर अकरम (सा0) की ज़ियारत करना मुस्तहब पर ये दलील नहीं है१।(54)
किया आपने नहीं फ़रमायाः (( क़बर वासीयों की ज़ियारत को जाओ इस से तुम को आख़ेरत याद आएगी))।(55) किया ये ज़ियारत के लिये आदेश नहीं है१ अलबत्ते ये आदेश क़बर परीदर्शन व ज़ियारत के वाजिब होने के लिये नहीं है लेकिन बिना शक व शुबह के मुस्तहब होने पर प्रमाण कर रहा है।
जमालः ये रिवाएत कहां उल्लेख़ हूई है १
जवादः हदीसों की किताबों में इस सम्पर्क रिवाएत भर मार पड़ि है. अगर उस हदीसों को तहक़ीक़ व पर्यालोचना करोगे तो मालूम हो जाएगा.
जमालः आज तक हम इस सम्पर्क रिवाएत न पढ़े थे और न सुने थे.
जवादः किया सही बुख़ारी(56) पढ़ी है १
जमालः ये पूस्तक हमारे निकट-पास उपस्थित नहीं है.
जवादः किया तुमने सही मुसलिम(57) पढ़ी है १
जमालः हमारे दादा के निकट ये पूस्तक उपस्थित थी. लेकिन उन की मृत के बाद हमारे चचा ले गए.
जवादः सोनने निसाई(58) किया है१ किया उस पूस्तक को पढ़े हो १
जमालः ये कैसी पूस्तक है १ और किस बिषय से सम्पर्क है १
जवादः हदीस की पूस्तक है.
जमालः नहीं मैने इस पूस्तक को नहीं देख़ा.
जवादः हदीसों में किया पढ़े हो १
जमालः माफ़ी के साथ कहना पड़ रहा हैः कि हम एक डाक्टरी छत्र है, और हमारे समस्त प्रकार कोशिश चेष्टा-प्रचेष्टा उस दर्सके ऊपर है ताकि हम उस बिषय में क़बूल हो सकें, अल्बत्ते हदीस पड़ने का बहूत शौक़ रख़ता हुं, लेकिन इस काम के लिये हमारे पास इतना समय नहीं मिलता है.
जवादः तुम हदीस सम्पर्क कोई पूस्तक भी नहीं पढ़े हो, और न पूस्तक कि पृष्ठा उलट-पलट कर देख़े हो. और न हदीस सम्पर्क किसी क़िस्म का ज्ञान रख़ते हो, तुमहारे लिये ये सम्भब नहीं है कि पैग़म्बर अकरम (सा0) व इमाम (अः) की ज़ियारत (ज़ियारत करने वालों) को निन्दित करो १
तुमहारे पास कोई ज्ञान नहीं. जानते हो कि अहले क़ब्र की ज़ियारत पड़ने को शिर्क कहना किसी क़िस्म की कोई दलील व प्रमाण नहीं रख़ता है१
जमालः जो कुछ हमारे पिता, दादा, और दोस्तों से आज तक क़बर बासीयों की ज़ियारत सम्पर्क सुना है मात्र ज़ियारत करने वालों को निन्दित व्यतीत कुछ नहीं सुना है। हत्ता इस सम्पर्क जो रिवाएत व हदीसें बयान किए हो, हमारे ऊपर कोई प्रभाब नहीं पड़ा.
जवादः मानव व जनसाधारण व्यक्तियों के लिये उचित है कि सब समय सच्छे और सठिक बिषय पर ज्ञान हासिल करने के लिये चेष्टा करना चाहिए, और (तमाम प्रकार की किताबों को ) किताबों को पड़ना व बर्रसी करना चाहिए ताकि ऐसा अक़ीदा व विश्वास हासिल हो जो ख़ुदा बन्दे आलम चाहता हो. दूसरों के कहने और अ-साधारण और अ-सठिक बातों पर ध्यान मत देना.
जमालः मै क़बूल करता हूँ कि पैग़म्बरे अकरम (सा0) के क़बर की ज़ियारत करना, और हमारे इमाम व मोमेनीन की क़बर की ज़ियारत करना एक नेक सदाचार है. न मात्र मुस्तहब और ताकिद है, बल्कि इस बिषय के लिये कहा भी गया है.
जवादः मै तुम से एक अबेदन करता हूँ.
जमालः तैयार हूँ तुमहारे दर्रख़वास्त को सुनूँ ,बोलो किया है.
जवादः बड़े क्षमा और माफ़ी के साथ कह रहा हूँ. और वे ये है कि प्रत्येक बातों और झूटी बिश्वाश पर तुमहारा जीवन ख़राब न हो, लेकिन सही इतेक़ाद व बिश्वाश पर, तो उस समय तुमहारे लिये कामियाबि का कारण होगा.
जमालः एक यूग में क़बूल करता था कि क़बरों की ज़ियारत करना शिर्क है. लेकिन बिभिन्न प्रकार हदीस और रिवाएत द्बारा मालूम हूआ कि मुस्तहब्बे मुआक्कदा है, और इस सार पर पहूचा है कि हमारा कर्तब है कि इस बिषय सम्बन्ध और मताभेद बिषयों को मुताले करके बर्रसि क़रार दे और तुमहारे हिदाएति बिषयों को भबिष्वत में कार्यों पर लागाएं. इस बिषय सम्पर्क बातें जो हमारे पिताजी ने हमारे ज़हिन में डाल दिया था, इस बिषय पर यक़ीनन गुफ़्तुगु करेगें ताकि वे भी सही और सठिक रास्ते को जानें (और पथ भ्रष्ट से निजात हासिल करें) और अपने पथ भ्रष्ट विश्वाश से परीत्रीण दिलाकर हिदाएत कि तरफ़ क़दम बड़ाएं.
जवादः धन्यवाद.
जमालः तुमहारे रौशन दलील-प्रमाण हमारे हिदाएत के लिये जो बातें सम्पादन हूई है, तुमहारा शुक्र गुज़ार हूँ.

 

महिला के साथ मुतआ (विवाह) करना

अब्दुल्लाहः समस्त प्रकार मुसलमान अबसार विवाह) को हराम व निषेध पर एकत्रित व इत्तेहाद है, क्यों तुम सब शिया इस विवाह को जाएज़ व शुद्ध जानते हो १
रिज़ाः उमर इब्ने ख़त्ताब के कहने के मुताविक़, कि (रसूले ख़ुदा (साः) उस विवाह को (अबसार विवाह को) हलाल व शुद्ध जानते थे... यही कारण है कि हम लोग इसे जाएज़ समझते है.
अब्दुल्लाहः पैग़म्बरे अकरम (साः) ने किया फ़रमाया है १
रिज़ाः (जाहिज़), (क़ुर्रुवी), (सर्ख़सि हनफ़ी), (फ़ख़रे राज़ी) अहले सुन्नत के प्रसिद्ध पेशवा और नेता ने इस कथा को नक़्ल किया है किः उमर ने स्वंय ख़ुतबा में फ़रमाया है किः

((متعتان کانتا علی عهد رسول الله (ص) و أنا أنهی عنهما و أعاقب عليها: متعه الحج، و متعة النساء؛))

दो प्रकार की महिला-औरत (अबसार विवाह) रसूल (साः) के यूग में (जाएज़ व शुद्ध) था लेकिन मै उस को निषेध घोषणा करता हूँ और उस कार्य-काम करने वालों को शास्ति प्रदान करुँगां. महिला-औरत हज(59)
महिला के साथ मुतआ करना (विवाह)(60) तारीख़े (इब्ने ख़ुल्लकान में आया है किः
उमर इब्ने ख़त्ताब ने फ़रमायाः ( दो प्रकार की महिला-औरत रसूल (साः) व अबुबक्र के यूग में जाएज़ व (शुद्ध) था लेकिन मै उस को निषेध घोषणा करता हूँ)।(61)
तुमहारे दृष्ट में इस विषय संम्बधं-सम्पर्क किया है १ किया उमर का कहना कि (दो प्रकार की महिला जो कहा गया है रसूल (साः) के यूग मे जाएज़ और शुद्ध था.) यह कथा झूटी है या सच्छी १!
अब्दुल्लाहः अल बत्ते उमर सठिक फ़रमा रहै है १
रिज़ाः इस विनापर, किया पैग़म्बरे अकरम (साः) के वाणी को परित्याग करना और उमर के कथा पर कोई विबरण रख़ती है १
अब्दुल्लाहः नहीं उमर इब्ने ख़त्ताब इस काम के लिए विस्तृत वयान करेगें।
रिज़ाः अर्थात ( हालाले मुहम्मद क़यामत के दिन तक हलाल और हरामे मुहम्मद क़यामत के दिन तक हराम है)।(62) किया अर्थ रख़ता है कि इस विषय पर समस्त प्रकार इस्लामी सम्प्रदाय के ज्ञानीयों प्रमाण व्यतीत एकत्रित दृष्ट रख़ता है।
अब्दुल्लाहः कुछ चूप रहने के बाद रिज़ाः कि तरफ़ अपना दृष्ट करके कहां सही कह रहै हो, लेकिन किस तरह ( उमर इब्ने ख़त्ताब) दो प्रकार मुतआ को निषेध घोषित किया और किस प्रमाण के साथ हराम क़रार दिया है १
रिज़ाः यह फ़तवा उमर के स्वयं तरफ़ से था अल बत्ते अगर कोई इज्तेहाद प्रदान करे और वे इज्तेहाद सुन्नत और नस के विपरीत हो किसी प्रकार से क़ाबिले क़बूल नहीं है और न-होगा.
अब्दुल्लाहः अगर यह इज्तेहाद उमर जैसे उधारण व्यक्ति से भी हो!१
रिज़ाः अगर उस से भी कोई महान व्यक्ति से भी क्यों ना-हो ध्यान देना जरुरी नहीं है. लेकिन यह बताउ तुमहारे दृष्ट में पैग़म्बरे अकरम (साः) के कहने पर इताअत व फ़र्माबर्दारी- तक़्लीद करना ज़रुरी है या उमर के कहने पर१
अब्दुल्लाहः किया क़ुरआन मजीद में ऐसी कोई आयेत मुतआ (अबसार विवाह संम्बधं पर) जाएज़ होने पर कोई आयेत उपस्तित है १
रिज़ाः हाँ, अल्लाह पाक पवित्र क़ुरआन मजीद में ईर्शाद फ़रमा रहै हैः

(...فما استمتعتم به منهن فأتوهن أجورهن فريضة)

जिन महिला के साथ (अबसार विवाह) किए हो उन की मैहैर को वाजिब विवाह के प्रसंग या उनवान से प्रदान करो।(63)
मर्हूम (अल्लामा आमैनी) स्वयं किताबों में अहले सुन्नत के अधिक से अधिक प्रसिद्ध किताबों से प्रमाण व दलील लाए है, जैसा कि मुस्नद इब्ने हम्बंल, (हम्बेंली सम्प्रदाय के महान नेता व पेशवा ) व..... इन व्यक्तित्वपूर्ण व्यक्ति के पूस्तक से समस्त प्रकार महिला- संमधं आयातें (अबसार विवाह संमधं) व शान-ए नुज़ूल को योग करके फ़रमाते है, कि यह सब तमाम प्रकार आयातें महिला-औरत संमबधं है. जो शुद्ध और जाएज़ होने पर प्रमाण कर रहै है।(64)
अब्दुल्लाहः इस समय तक इस विषय-प्रसगं-संम्बधं मै कुछ नहीं जानता था.
रिज़ाः जो कुछ मै तुम से वर्णना किया हूँ यक़ीनन महत्पूर्ण पूस्तक व गुरुत्वपूर्ण पुस्तक (अल्ग़दीर) पर्यालोचन करने के बाद मिलेगा कि किया हलाले ख़ुदा व मुहम्मद (साः) को उमर के निषेध घोषित करने के साथ परित्याग करो गे १!
अपर तरफ़ यह है किः हम सब किस व्यक्ति के उम्मत है, उम्मते पैग़म्बरे या उम्मते उमर १!
अल बत्ते हम सब उम्मते पैग़म्बरे (अः) है और उमर की फ़ज़िलत भी उम्मते पैग़म्बरे अकरम (साः) से भी होनी चाहिए।
रिज़ाः वह कौन सी चीज़ है कि तुम को पैग़म्बरे अकरम (साः) के वाणी को क़बूल करने से दूर रख़ा है १
अब्दुल्लाहः तमाम मुस्लमानों का महिलाके साथ मुतआ के हराम होने पर एकत्रित होना इस विषय को मुझे आश्चर्य किया है।
रिज़ाः इस विषय संम्बधं पर तमाम प्रकार मुस्लमान का एकत्रित दृष्ट नहीं है.
अब्दुल्लाहः किस तरह एकत्रित दृष्ट नहीं है १
रिज़ाः जैसे कि तुम ने अभी अभी कहाः और उस को क़बूल भी किया, कि शिया हज़रत (अबसार विवाह को) अर्थात महिला के साथ मुतआ करना जाएज़ व शुद्ध जानते है.
शिया हज़रत तक़रीबन पृथ्वी में अधा मुस्लमानों में से है, तक़रिबन एक हज़ार मिलियोन(65) व्यक्ति है. लेकिन यह सब शिया जनसाधारण व्यक्तियों उस महिला-औरत के साथ मुतआ करना हलाल व शुद्ध जानते है, अपर कोई एकत्रित दृष्ट उपस्तथत नहीं रख़ता.
इस से भी अधिक उदाहरण और उत्तम मिसाल है, कि इमाम मासूम (अः) ख़ान्दाने पैग़्म्बर अकरम (साः) थें और पैग़्म्बर अकरम (साः) ने भी उन व्य्कति को नूह (अः) के नौका किश्ती का उधारण दिया था।

((مثل أهل بيتی فيکم کمثل سفينة نوح، من رکبها نجی و من تخلف عنها غرق؛ مثل اهل بيت))

तुमहारे दर्मियान हमारे अहले बैत (अः) के उदाहरण, नूह (अः) के नौका के उधारण जैसे है, जो व्यक्ति उस पर सवार हूआ परित्रान पाया, और जो व्यक्ति अस्विकृती कि वह पधित हूआ,(66)
आप यह व्यतीत अपर हदीस में ईर्शाद फ़रमाते हैः

((انی تارک فیکم الثقلين کتاب الله و عترتی اهل بيتی، و انهما لن يفترقا حتی يردا علی الحوض))

मै तुमहारे सामने दो मूल्यवान वस्तु (अमानत के तौर पर) छोढ़ कर जा रहा हूँ, एक अल्लाह के पवित्र ग्रन्थ अपर मेरी अहले बैत, यह दोनो कभी एक अपर से पृथक नहीं होगें, और हौज़े कौसर के निकट हमारे निकट साक्षात करेगें।(67)
इन व्यक्तियों (अहले बैत (अः) की तक़्लीद करना तथा परित्रान पाना और अल्लाह के निकट पहूँचने के एक माध्ययम है और इन व्यक्तियों के व्यतीत किसी एक को स्वीकृति प्रदान करना तथा पधित और पथभ्रष्ट का रास्ता व कारण है ।
मुतआ विवाह को जाएज़ और मन्सुख़ ना-होना जानते थें और शिया भी इन समस्त प्रकार विषय की तक़्लीद करते है और उस पर भि अमल करते है. हज़रत अली (अः) एक रिवाएत में ईर्शाद फ़रमाते हैः

(لولا أن عمر نهی عن المتعه ما زنی إلا شقي؛)

अगर उमर (राः) महिला के साथ मुतआ को निषेध घोषणा न करता विना संदेह अत्वाचारी व्यक्ति (शक़ी) व्यतीत कोई ज़िना में लिप्त (मुब्तिला) न होता)(68)
हज़रत अली (अः) के मूल्यवान वाणी द्बारा इस का अर्थ यह निकलता है कि उमर की तरफ़ से महिला के साथ मुतआ की घोषणा हराम क़रार देना हराम का कारण बना है. ताकि जनसाधारण व्यक्ति महिला के साथ मुतआ न करे और अधिक से अधिक ध्यान उस मुतआ की तरफ़ न दे और यह व्यतीत जिस के लिए मुमकिन नही है कि सारे जीवन के लिए अपना स्त्री रख़े वह यक़ीनन असहाय हो कर ज़िना में लिप्क हो जाए गा (और अपने दामन को अ-पवित्र करे गा)।
इस के बावजूद अधिक से अधिक मुस्लमानों के नेता और रहबर मुतआ विवाह को जाएज़ और शुद्ध जानते है और बहूत सारे साहाबा-ए किराम, व ताबेईन मुस्लमान भी है कि पैग़म्बरे अकरम (साः) के वाणी और क़ुरआन से दलील के साथ उमर के मुतआ का निर्देश को परित्याग कर दिया है. लिहाज़ा अपर कोई स्थान नहीं है कि समस्त प्रकार मुस्लमान इस मुतआ पर एकत्रित दृष्ठ रख़ते है। और कौन सी दृष्ट पर तमाम प्रकार मुस्लमान एकत्रित नज़र करेगें १
इस स्थान पर कुछ व्यक्तियों ने मुतआ विवाह को जाएज़ और क़बूल भी किया है, जिन व्यक्तियों का नाम और उन के बाणी को भी यहाँ उल्लेख़ कर रहा हूँ।
1- इम्रान इब्ने हसीन, आप फ़रमाते हैः कि आयते ((मुतआ)) पवित्र कुरआन ग्रन्थ मे आया है और कोई अपर आयत इस पवित्र आयत को नस्ख़ नही कि है, हज़रत रसूले ख़ुदा (साः) ने हम सब को निर्देश फ़रमाया है, इसलिए हम सब ने भी उन के साथ (हजजे) तमत्तु अंजाम दिया है यंहा तक की अप इस पृथ्वी त्याग किया लेकिन हम सब को इस कार्य से निषेध घोषणा नहीं किया ( लेकिन एक व्य्कति ) अपकी मृत के बाद ( उमर इब्ने ख़त्ताब आप की मृत के जो कुछ अपने दिल व मन चहा बयान किया है.
2- जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह व अबु साईद ख़ुदरी वह दो व्यक्ति फ़रमाते हैः कि उमर की ख़िलाफ़त के दर्मियान मुतआ करते थे ताकि उमर इस घटनाए ( उमर इब्ने हरीस) जनसाधारण व्यक्तियों को इस कार्य से निषेध घोषणा करे.
3- अब्दुल्लाह इब्ने मसऊदः इब्ने हज़्म स्वींय (अल महल्ली) और ज़र्क़ानि स्वींय पूस्तक (शरहुल मुअत्ता) अब्दुल्लाह इब्ने मसऊद को उन व्यक्तियों में से उपाधी दि है कि जिन व्यक्तियों ने मुतआ (अबसार विवाह) को जाएज़ और मुबाह जानने पर प्रमाण किया है। उदाहरण के तौर पर हाफेज़ाने (हदीस) भी इस रिवाएत को भी रिवाएत करके कहा हैः ग़ज़वह में रसूले ख़ुदा (साः) के साथ यूद्ध में व्यस्त रहते थे लेकिन (स्वींय स्त्री को अपने साथ) नहीं रख़ते थे, हम सबने पैग़म्बरे अकरम (साः) से कहाः ए- रसूले ख़ुदा हम सब अपने को ख़तना करे१
वे सुमहान व्यक्ति इस कार्य से विरत रख़ कर निर्देश प्रदान किया ताकि ऊज़रत देकर एक निर्दष्ट समय तक अपना स्त्री निर्वाचन करे अर्थात (मुतआ) करे) उस के बाद अपने इस आयेत को अध्यन कीः (जो चीजे़ ख़ुदा बन्दे आलम ने जाएज़ क़रार दिया है उस को हराम क़रार मत दो))(69) -
4- अब्दुल्लाह इब्ने उमर
अहमद इब्ने हम्बल ( हम्बेली सम्प्रदाय के महान नेता) सही प्रमाण के साथ अब्दुर रहमान इब्ने नआम (या नाईम) आरज़ी रिवाएत किया है किः ( मै अब्दुल्ला इब्ने उमर के निकट था कि एक व्यक्ति ने मुतआ प्रसगं उस से प्रश्व किया आपने कहाः अल्लाह का शफ़थ देकर कहता हूँ किः रसूल (साः) के यूग में ज़िनाकार नहीं थे।(70) ( बल्कि अपनी नियाज़ को (अबसार विवाह के माध्यम (मुतआ द्बारा) पूरा करते थे)।
5- सल्माह इब्ने ऊम्मियह इब्ने ख़ल्फ़
इबने हज़्म स्वींय पुस्तक (अल महल्ली) व ज़र्रकानी अपने स्वींय पुस्तक (शरहुल मुतआ) वेह दोनो व्यक्ति ने नक़्ल किया है किः (अबसार विवाह) व मुतआ को जाएज़ व मुबाह जानते थे।
6- माअबाद इब्ने ऊम्मियाह इब्ने ख़ल्फ़
इब्ने हिज़्म फ़रमाते है किः माअबाद इब्ने ऊम्मियाह इब्ने ख़ल्फ़ (अबसार विवाह) मुतआ को मुबाह व जाएज़ व शुद्ध जानते थें।
7- ज़ुबैर इब्नुल आवाम
(राग़ीब) फ़रमाते है किः अब्दुल्लाह इब्ने ज़ुबैर, इब्ने आब्बास को मुतआ को जाएज़ जानने पर उस की प्रसंसा किया है। इब्ने आब्बास उस से कहाः तुमहारी माता से प्रश्व करो कि किस तरह तुमहारे पिता व माता आतिश दान मे आग लगाई है ( अर्थात, वे दोनो व्यक्ति किस तरह एक अपर से संगम किया था)१
इस वक़्या के संम्बधं अपने माता से प्रश्व किया उस की माता ने उत्तर मे कहाः तुम को (अबसार विवाह के माध्यम) इस पृथ्वी मे लायी हूँ।(71)
यह महत्पूर्ण वक़्या और घटना के माध्यम प्रमाण होता है कि ज़ुबैर के दृष्ट में (अबसार विवाह) तथा मुतआ जाएज़ था।
8- ख़ालिद इब्ने मुहाज़िर इब्ने ख़ालीद म्ख़ज़मि
वेह एक व्यक्ति के निकट बैठा हूआ था, एक व्यक्ति आया. और उस से मुता संम्बधं मे प्रश्व किया. ख़ालिद उस विवाह को जाएज़ और मुबाह जानता था. इब्ने अबि उमरह अन्सारी उस से कहाः अहिस्ता बोलो ( क्योंकि इस प्रकार का सरल फत्वा दे रहै हो१)
ख़ालिद ने कहाः अल्लाह की शफ़थ दे कर कह रहा हूँ, कि इस प्रकार कार्य परहैज़गार व्यक्ति के ज़माने भी अंजाम देते थें।(72)
9- उमर इब्ने हरीस
हाफिज़, अब्दुर रज़्ज़ाक़ सवींय ग्रन्थ ( मुसन्नफ़) मे वर्णना किया है किः (अबु अल ज़ुबैर) ने हमारे लिए नक़्ल किया है कि जाबिर ने कहाः उमर इब्ने हरीस कूफे में प्रवेश किया, और एक कनीज़ के साथ मुतआ किया, हलाकिं वेह कनीज़ बर्दार थी उमर के निकट ले आए उमर इस घटना को उम्रु से प्रश्व किया और उस को ताईद किया. और यही कारण था कि उमर ने इस मुतआ को अशुद्ध क़रार दिया।(73)
10- ओबै इब्ने काअब
11-रुबिआ इब्ने उमैयाह
12-समीर ( या सुमराह) इब्ने ज़ुन्दूब
13- साईद इब्ने जुबैर
14- ताऊस यामनी
15-अता अबु मुहम्मद मदनी
16- सदी
17- मुजाहिद
18- ज़फ्र इब्ने औस मदनी
और अपर सम्मानी सहाबा व सम्मानी मुस्लमान भि उमर के इस इज़्तेहादी फतवा को बातिल घोषणा और निंदित किया है।
ए-अब्दुल्लाह, इन समस्त प्रकार बिस्तृत तफ़्सील सुन्ने के बाद भि मुस्लमानों के एकत्रित दृष्ट पर इमान रख़ते हो १
अब्दुल्लाहः क्षमा चाहता हूँ. जो कुछ तुमहारे दर्मियान वयान किया हूँ, या सुना था, लेकिन इस विषय संम्बधं हमारा कोई पर्या लोचन नहीं था, ( या नहीं था) लेकिन इस नतीजे पर पहूँचा हूँ कि हम सब को चाहिए सही तरीके से पर्या लोचन करके अपने मन से जातिय या धार्मिक पक्षपत को परित्याग करके सही और सालिम विषय संम्बधं को क़बूल करे।
रिज़ाः तुम क़बूल किए हो कि मुतआ जाएज़ और मुबाह है १
अब्दुल्लाहः मै ने क़बूल किया है कि मुतआ को हराम व निषेध घोषणा करने वाला ख़ुद अपने से फ़त्वा प्रदान किया और अपने ऊपर अमल किया है, लेकिन पवित्र क़ुरआन मजीद ने इस मुतआ को जाएज़ और उस आएत को मन्सुख़ क़रार नहीं दिया है. और उमर जैसे व्यक्ति और उस से बढ़े महान व्यक्ति अल्लाह के निर्देश परिवर्तन कर नहीं सकता लेकिन मै इस बात पर अश्चर्य हूँ कि उमर ने (राः) इस फ़त्वा को किस तरह अपने से सादिर किया है१
अगर मुमकिन हो सके हमारे लिए कोई (या) कई किताबें परिचय करो जो किताबे इल्म व ज्ञान से भर मार हो और सम्प्रदाय के बहस-दुश्मनी से पवित्र हो ताकि मै उस पूस्तक को पर्यालोचन करुँ और हक़िक़त से अधिक से अधिक परिचित लाभ करुँ.।
रिज़ाः (अलग़दीर) अल्लामा अमिनी, ( अननस् वाल इज्तेहाद)) व अल फुसुलूल मुहिम्मह) मर्हूम शर्फ़ुद्दीन व (अल मुतआ) उस्ताद तौफिक़ुल फकीकि, वगैरह यह सब किताबे उपस्थीत है।
यह सब पुस्तकों को गंभीर पर्यालोचन करना तो उस समय मालूम होगा कि हक़िक़त किया है.
अब्दुल्लाहः यक़ीनन मे इस कार्य को अंजाम दूगां और ख़ुदा बन्दे आलम से मै तुमहारे लिए दुआ व प्रार्थना करुगां.
रिज़ाः यहाँ एक समस्या व कठिन मुश्किल देख़ाई दे रही है और वह यह है कि अहले सुन्नत वल जमाअत उमर के फ़त्वा जो मुतआ के संम्बधं है.
अब्दुल्लाहः समस्या किया है१
रिज़ाः उमर तारीके मुतआ व हज्जे मुतआ को निषेध घोषणा क़रार दिया है. लेकिन अहले सुन्नत मुताए-हज को जाएज़ व शुद्ध जानते है लेकिन मुताए- महिला को हराम १ अगर उमर का फ़त्वा सही है, हर दो मुतआ हराम व निषेध होनी चाहिए। और अगर उस का कहना बातिल व अ-शुद्ध है, हर दो मुतआ सही व शुद्ध होना चाहिए।
अब्दुल्लाहः किया अहले सुन्नत वाल जमाअत मुताए-हज को जाएज़ व शुद्ध जानते है१
रिज़ाः हाँ, इस सूरत में कि जिस समय तुम उन की तमाम प्रकार प्रसिद्ध पूस्तकों को पर्या लोचन करोगे तो उत्तम तरिके से ज्ञान मे बृद्ध पाएगा कि सही व ग़लती किया है.
अब्दुल्लाहः आपका धन्यवाद,

سبحان ربک رب العزة عما يصفون و سلام علی المرسلين والحمد لله رب العالمين

 

अलमोराजेआत

अलमोराजेआत एक ऐसा मुल्यवान ग्रन्थ है, कि जिस ग्रन्थ को सैय्यद अब्दुल हूसैन शर्फ़ुद्दीन और (सलीमुलबर्सी) एक ज्ञानी व्यक्ति जो उस समय के अलहज़हर (मिस्र) योंनिवर्सिटी (सुन्नी धर्म) के अध्यापक्ष थें, इन दो ज्ञानी व्यक्तियों के बीच विभिन्न प्रकार (चिठी-पत्र के) लेन देन के माध्यम इमामत और अहलेबैत (अः) के संबंधित जो गवेषणा हुई है। सार के तौर पर यह गवेषणा पूस्तकत की सूरत में उन दो व्यक्तित्व के बीच जो रदो बदल हूई है. अज़हर भर्सिटी के अध्यापक्ष शिया धर्म को क़बूल करके प्रचार किया कि शिया धर्म उसूले दीन और फ़ुरुए दीन में इमामत और रिसालत (सा0) के पवित्र परीवार को अनुसरण व पैरुवी करते है। ( इस में किसी प्रकार का कोई संदेह का कोई अबकाश नहीं है)

शियों ( बारह इमामी ) की हक़ीक़त
यह पूस्तक डॉक्टर असअद वहीद क़ासिम एकादेमि की तरफ़ से गवेषणा हो कर मूद्रित हूई है। डॉक्टर असअद वहीद क़ासिम फ़िलिस्तीन देश (गज़्ज़ह) के बासिन्दा है. यह पूस्तक शिया सम्पर्कित में है. (आपका शिया धर्म क़बूल करने का मूल कारण) यही पूस्तक है कि आप (असअद) शिया धर्म और मज़हबे अहलेबैत (अ0) को क़बूल किया है।
इस ग्रन्थ के लेख़क, स्वींय ग्रन्थ को अहलेसुन्नत वाल जमाअत कि प्रसिद्ध ग्रन्थों के दलील और प्रमाण के माध्यम अपनी पूस्तक में शिया धर्म को हक़ प्रमाण क़रार दिया है. डॉक्टर असअद अल मजल्ला (अल मनीर)।(74) में एक मुसाहिबा दिया था उस मुसाहिबा में कहा था कि.
जिस समय मै ने सही बुख़ारी, की विभिन्न प्रकार दलील-प्रमाण के माध्यम, शिया की हक़ीक़त को प्रमाण किया, वहाबीयों ने हमारे और हमारे सहायता के ऊपर फ़तवा प्रदान किया।
(( कि रसूल (साः) की मृत के बाद वह घटना मुसल्मान के ऊपर चली गयी, ( 5 धर्म सहीं कहा गया))
हम को और हमारे सहायता करने वालों को कहता थाः कि इस्लाम-धर्म के लिये जितनी कठिन भय यहूदी से है उस से भी अधिक शिया धर्म से है. लेकिन इस के बावजूद मैने हक़ीक़त को पालिया।
उस के बाद (हमारे बाद) हदीसे (मंज़िलत)।(75) इस हदीस में हज़रत अली (अ0) को वसीए-रसूल और बिला फ़स्ल ख़िलाफ़त पर ताकीद कि गई है।
शिया धर्म में, विश्वास, अक़ीदा, साफ़ व शफ़्फ़ाफ़ यूक्ति-दलील-प्रमाण मंतेक़ी के साथ है। अहकाम, (यह सब) एक स्तरपर अख़लाक़ी व मानवी को एक बुलन्द स्थान क़रार दिया गया है।

(जिस समय नौका-किश्ती पर (परीत्राण) के लिये बैठा
यह पूस्तक एक गवेषणाकारी उर्दुन के माध्यम, (जिस का नाम) मर्वान ख़लीफात, जो उर्दुन शरीअत भर्सिटी से फारिग़ हो कर शिया धर्म को क़बूल करने के बाद लिख़ते है. कि शिया धर्म के प्रथम (अर्थात शिया होने से पहले), अपने और अपने दोस्त के दर्मियान बहूत सारी गवेषणा हूई. जिस विनापर हम को मजबूर किया कि शिया धर्म के सम्पर्कित गवेषणा करुँ। बिल अख़र, शिया धर्म सही व हक़ीकि, और विभिन्न प्रकार ईलाही धर्मों के (शिया धर्म को) प्रतिनिधी क़रार दिया गया है। और इस पूस्तक में आप वहाबी और उन के क़वानीन-विधान और द्बिनी प्रतिष्ठान के ऊपर. और सुन्नी के अपर विषय के ऊपर भी तंक़ीद कि है. आप विश्वास करते है कि सुन्नी के विभिन्न प्रकार द्बिनी प्रतिष्ठान में सही ज्ञानी तअलीम और ज्ञान की ज़रुरत है ताकि इस्लाम-धर्म और आपने जैसे फ़िक्र करने वाला सही तरीके से इस्लाम को साबित व प्रमाण कर सकें।

(...हमारा भ्रमण सुन्नी से शिया तक)
इस पूस्तक को लिख़ने वाला एक रिपोटर (संवादिक), जिस का नाम सालेह अल वर्दनी) वह व्यक्ति इस पूस्तक में शिया अहलेबैत (अ0) धर्म को क़बूल करने के कारण और विभिन्न प्रकार की समस्याओं को बयान करके फ़रमाते है. कि मै ने विभिन्न प्रकार दलील-प्रमाण के माध्यम प्रमाण किया है कि मज़हबे अहलेबैत (अ0) सही व शुद्ध धर्म है। (इस धर्म में किसी प्रकार का कोई शक व संदेह नहीं है) कि ख़ुदा बन्दे आलम जिस धर्म को निर्दष्ट व पसन्द क़रार दिया है। वह ज्ञानी व्यक्ति अपर ग्रन्थ भी इस विषय संबंधित लिख़ा है, जिस ग्रन्थ में प्रत्येक विषय सम्बधं उदाहरण के तौर पर, अतीत इतिहास, आक़ाइद, विश्वास व इस्लाम धर्म के संबंधित। अल मजल्ला अलमनीर।(76) में एक मुसाहैबा दिया था जिस मुसाहिबा का मूल विषय को उल्लेख़ कर रहा हूँ।
सुन्नी धर्म के लिये (ज्ञान-तअलीम की बहूत ज़रुरत है) ताकि वह लोग सहाबाए रसूल (स0) के अपवाद से परीत्राण हासिल करें।
सुन्नी धर्म, एक निर्वाचन किया हूआ उम्मत व क़ौम है, वह लोग मुस्लमान के अन्दर सोलह-शान्ति सृष्ट करने में बल नहीं रख़ती. (बल्कि इस काम से उन लोगो की सफलता नहीं मिली है)।
मै सुन्नी धर्म की फ़िक्र से शिया धर्म तक पहँचा हूँ, न शिया की फ़िक्र से. जिन व्यक्तियों ने शिया धर्म को क़बूल किया है वह लोग अपने परिवार कि तरफ़ से तिरष्कारीत है. और अपने रोज़ी रोजगार में चेष्टा कर रहा है ताकि अपनी भूक व प्यास को किसी भी तरीके से निभाए.
शिया, धर्म के अक़ीदे को सम्मान प्रदर्शन किया है, और बाबे इज्तिहाद को सब समय के लिये ख़ुला रख़ा है लेकिन यह धर्म (अन्यय व अत्याचारी सरकार के साथ) किसी भी तरीके से साज़िश नहीं करती लेकिन इस के विपरीत सुन्नी धर्म है।
शिया धर्म, के समाज और यूक्ति मंतेकी के साथ है, और उसकी आज़ादी फ़िक्र व सदाचार सुन्नी धर्म से अधिक से अधिक उत्तम और बेह्तर है।

मज़हबे अहलेबैत (अ0) को क्यों निर्वाचन किया हूँ १
शैख़ मोहम्मद मरई अंतकी, (सीरिया के विचारपति में से एक प्रसिद्ध विचारपति है) वह ज्ञानी व्यक्ति इस ग्रन्थ को लिख़ने वाला है. वह व्यक्ति सुन्नी धर्म (शाम) के एक महान आलिमें द्बीन जो शाफ़ी धर्म का अनुसरण करने वाला है, वह महा ज्ञानि व्यक्ति शिया धर्म को विभिन्न तरीके से गवेषणा करने के बाद शिया धर्म को क़बूल किया है. (वह इस कारण पर शिया हूआ) क्योंकि गवेषणा करने के बाद मालूम हूआ कि एक मात्र अहलेबैत (अ0) है जो इस्लाम को सहीं तरीके से इस्लाम-धर्म के विभिन्न प्रकार अहकाम और विधानों को तफ़सीर व बिस्तृत के साथ बयान करने वाला है।

(खोइ हुई हक़ीक़त)
इस पूस्तक के लेख़क प्रसिद्ध आलिमें दीन शैख़ मुतसीम सैय्यद अहमद. आपके विभिन्न प्रकार ग्रन्थों का गवेषणा करने के बाद आप को मालूम हूआ कि एक मात्र सहीं व हक़ीक़ि आक़ाइद व विश्वास सठिक धर्म अहलेबैत (अ0) का रास्ता है, और इस नतीजे पर पहूँचने के बाद फ़रमाते है कि इस से पहले मै पथ भ्रष्ट था लेकिन मै अभी सही राह व विश्वास पर पहूँच गया हूँ. और शिया धर्म को सही निर्वाचन किया भी हूँ। अगर हक़ीक़त में देख़ा जाए मै अपने को परित्राण दिलाने के लिये दरीया के साहिल (कुल) पर पहूच गया हूँ।

शबहाए पेशावर
पेशावर, पाकिस्तान देश के एक प्रसिद्ध शहर का नाम है. जिस शहर में चार प्रसिद्ध आलिम व ज्ञानी व्यक्तियों के बीच (सुन्नी व शिया रुहानी सैय्यद मोहम्मद मुसव्वभी शीराज़ी, आपका प्रसिद्ध नाम (सुल्तानुल वाएज़ीन) है. पाकिस्तान के विभिन्न प्रकार मुद्रित आख़बारों ने इन विभिन्न प्रकार ज्ञानीयों के रददो बदल गवेषणा को मुद्रित किया था नतीजे में विभिन्न प्रकार गवेषणा और मुनाज़िरा को मुद्रित किया जिस में से कुछ व्यक्तियों के शिया धर्म को क़बूल करने के सम्पर्क मुद्रित किया था. यह विभिन्न प्रकार गवेषणा और मुनाज़िरा को मर्हूम सुल्तानुलवाएज़ीन के माध्यम स्वींय ग्रन्थ में संग्रह किया और उस पूस्तक का नाम रख़ा गया (शबहाए पेशावर)।
सुल्तानुलवाएज़ीन साहब के अपर ग्रन्थ भी है जिस पूस्तक का नाम (फ़िर्काए नाजियाह्) है, जिस पूस्तक में आपने और आपने छत्रों के बीच शिया होने के संबंधित जो गवेषणा हूई थी, उस ग्रन्थ में जमा किया गया है।

(रसूल (सा0) के पवित्र परीवार के आमने सामने होना)
आहलेबैत (अ0) के बीच में उमाया बंश का राज़नीति व चेष्टा यह था कि किसी भि तरिके से अहलेबैत (अ0) से हूकुमत और राष्ट्र को छीन लिया जाए, इस विषय संबंधित एक उर्दुनी वकील, जिस व्यक्ति का नाम आहमद हूसैन याक़ूबी, जिस ने इस सम्पर्कित एक पूस्तक लिख़ा है, वह फ़रमाते है कि यही विषय था कि मुझे शिया धर्म क़बूल करने पर असहाय होना पढ़ा उस व्यक्ति की अपर पूस्तक भी है जिस पूस्तक का विषय (सुन्नी और शिया) संबंधित में है। उस का एक मुसाहिबा हूआ था मजल्ला (आलमनीर)।(77) वह स्वींय मुसाहिबा में शिया होने के कारण बयान करते है . जिस में से कुछ मुल्यवान कथा पेश कर रहा हूँ.
कौन व्यक्ति और गबेषणाकारी है कि आहलेबैत (अ0) व्यतीत किसी और धर्म को अनुसरण करते हो१
मै इश्वर से शफत वन्दा हूँ कि जब तक जीवित रहूँ हक़्क़ानियते अहलेबैत (अ0) को संरक्षण करता रहूँगां।
किया मुसल्मान यह कथा क़बूल करते है कि रसूल (स0) बुतों के लिये जन्तु को बली दान करके उस बली दि हूई माँस को ख़ाया१ हलाकि इस विषय को बुख़ारी साहब ने स्वीय ग्रन्थ में उल्लेख़ किया है।

इमाम हूसैन (अः) ने मुझे शिया किया है१
इस पूस्तक का लेख़क एक रिपोटर (संवादिक), मग़रेबी है, जिस व्यक्ति का नाम इद्रीस अल हूसैनी जिस ने शिया धर्म और अहलेबैत (अ0) की हक़्क़ानीयत को अनूसंधान क़रार देके मज़हबे अहलेबैत (अ0) को प्रमाण किया और अपने को एक हक़ीकि शिया कहके प्रचार किया. और इन पवित्र परीवार के साथ अत्याचारी करने वालों को बढ़ी हिम्मत के साथ बदनाम और कुख़्यात का एक उपाधि क़रार दिया है। वह व्यक्ति अल मजल्ला (अल मनीर)(78) में एक मुसाहिबा दिया था जिस मुसाहिबा का कुछ मूल उद्दश बयान कर रहा हूँ.
मुझे स्वाधिन बयान करने का निर्देश दें, ताकि मै इस पृथ्वी के समस्त प्रकार लोगों को शिया करुँ। अहलेबैत (अ0) का इनक़लाब व क़्रान्ति के नतीजे आज इस पृथ्वी पर प्रदर्शन कर रहा हूँ।
शिया धर्म, मिअराज का एक रुह् है, और भविष्य की चिन्ता करने वाला है.
हाँ, इमाम हूसैन (अ0) ने मुझ को शिया किया है. लेकिन मै अभी भि सुन्नी हूँ। इस पार्थक के साथ कि रसूले ख़ुदा (स0) ने जो मुल्यवान वाणी व हदीसें बयान की है उस (बयान किए हूए हदीसों की पैरुवी कर रहा हूँ)।

(आहलेसुन्नत वलजमाआत के दृष्ट में सुलफ़ी)
मोहम्मद अल् कसीर, एक मग़रिवी गबेषणाकारी मज़हबे आहलेबैत (अ0) को क़बूल किया है, जिस ने स्वींय गबेषणा के माध्यम (सुलफ़ी) धर्म) के संबंधित स्वींय पूस्तक में विबरण के साथ उन लोगो के विश्वाश को बयान किया है. यह व्यक्ति इस विषय पर ताक़ीद के साथ फ़रमाते है कि ( सुलफ़ी वहाबी) सून्नी धर्म ने शिया मज़हब से पहले उस ( सुलफ़ी वहाबी) को बातिल घोषित क़रार दिया है।

फिलिस्तीनि नेता मोहम्मद शुहादह के साथ मुसाहिबा
मोहम्मद शुहादह, फ़िलिस्तीन जिहादी दल के एक प्रसिद्द व महान नेता शिया होके मज़हबे अहलेबैत (अ0) को एक उत्तम धर्म के हिसाब से क़बूल कर लिया, बिल अख़र आप अंतर भरी हूई दुश्मनी दल के आमने सामने होके मिन जुमला मजल्ला सौदी (अल मजल्ला) जो मजल्ला लन्दन में मूद्रित होता है, उस मजल्लाह में आपने एक मुसाहिबा दिया और (मजल्लाह अल मनीर)(79) और मुसाहिबा का मूल विषयों में से कई विषय नीचे बयान कर रहा हूँ.
मै इस लिए शिया हूआ कि हज़रत अली (अ0) को एक अत्याचारित व्यक्ति व मज़लूम पाया. और शिया सम्पर्क कुछ ज्ञान मालूम न रहने के कारण मै इस समय तक सुन्नी था. लेकिन मै निश्चित हूँ कि मै कोई शेष व्यक्ति न रहूँ कि कहै ( मै हिदाएत पाया हूँ)।(80) और मज़हबे अहलेबैत (अ0) को फ़िलिस्तीन देश में प्रचार करने का जान-प्राण देके चेष्टा करता रहूगां और ख़ुदा बन्दे आलम से यह प्रार्थना करुगां कि मुझे इस राह में कामियाबी दिलाएं. और हमारे मौला हज़रत आक़ा साहैबुज़ ज़मान (अ0) से गम्भीर प्राण से प्रार्थना कर रहा हूँ कि या महदी आप हमारी फ़रीयाद को सुने क्योंकि वह यूग अचुका है।

सुन्नी व शिया के दृष्ट में शरीअत को दफाअ करना
मिस्र के एक प्रसिद्ध मौलाना शौख़ हसन शुहाथह् का मुसाहिबा
शौख़ हसन शुहाथह् , अल अज़हर योनिवर्सिटी के एक महा ज्ञानि व्यक्ति, शिया धर्म को कबुल करने के बाद मिस्र सुन्नी मौलानाओं के दर्मियान विशेष करके क़ाहिरा में एक अशांती फ़ैल गई थी. और उस व्यक्ति के सम्पर्क मिस्र के समस्त प्रकार अख़बारों ने जनसाधारण को उन व्यक्ति पर हमला करने की हिम्मत दिलाया. विल आख़र उस देश के राष्ट्र सरकार ने उन को एक अपवाद देकर (साहाबा के ऊपर अपवाद) जेल ख़ाना में बदं कर दिया, क्योंकि आप नमाज़े जुमआ के ख़ुतबे में समस्त प्रकार हक़ाइक़ को जनसाधारण व्यक्तियों के सामने बयान किया करते थे ।
मजल्लह् अल मनीर(81) उन से एक मुसाहिबा लिया था जिस मुसाहिबा का मूल विषय को आपके सामने उल्लेख़ कर रहा हूँ।
प्रकाश्य के तौर पर हज़रत अली (अः) के साथ जो दोस्ति रख़ा था वेह यहाँ समाप्त हो गया. लेकिन एक जिसमे हमारे लिये संम्भब है कि उस महान नेता के पवित्र ख़िदमत में पुरुष्कार के तौर पर एक हदिया पेश करुँ।
मिस्र देश में आशूरा के दिन इँद पालन किया जाता है. और उस दिन को आनदं किया जाता है में अपनी तमाम जीवन को फ़रीयाद में लागाया और गले के हल्क़ को बहार किया कि किस्तरह मूमकिन है कि जिस दिन रसूल (स0) के प्रिय पूत्र शहीद हो गए और उस दिन को ख़ुशी मनाई जाए।!१
धारावाहिक के तौर पर प्रमाण हूआ है कि मुअबिया हत्याकारियों के नेता है. इस सूरत में किस तरह मुमकिन है कि एक बातिल व्यक्ति को इस जुमले के साथ ( मअबिया को अपने लिये सैय्यद व सर्दार अनुसरण करुँ किया इश्वर उस से सन्तूष्ट है किया मुमकिन है कि उस को एक मानव में हिसाब करुँ)।


[1] शैख़ तुसी. इख़तियारे मारेफतुर्रिजाल, जिल्द 1, पृष्ठ 211, शाजान इब्ने जिब्राइल कुम्मी, अलफ़जाएल, पृष्ठ 121, अली इब्ने यूनुस आमुली,
अस् सिरातुल मुस्तक़ीम, जिल्द 1, पृष्ठ 209, हूसैन इब्ने सलेमान हिल्ली, अल मुख़्तसर, पृष्ठ 94, सैय्यद हाशीम बहरानी, हिलयातुल अब्रार, जिल्द, 2, पृष्ठ 410 व बिहारुल अनवार, जिल्द 27, पृष्ठ 143, और जिल्द 35, पृष्ठ 345, और 346, (कम श्ब्दार्थ के पार्थक के साथ)।
[2] पैग़म्बर अकरम (साः) ने फ़पमाया हैः
(علی مع ا لحق والحق مع علی یدور معه حیثما دار)
(अली सच्छे के साथ है और सच्छे अली के साथ है ( और सब समय सच्छे अली के साथ है) कहीं भी अली हो हक़ वहाँ वहाँ है (मुहक्क़ बहरानी हदायेकून नाज़ेरह, जिल्द 8, सफेह 512. और यह भि फ़रमाया हैः
(يا علي، أنت و شيعتک هم الفائزون يوم القيامة)،
ए-अली तुम और तुमहारे शिया, क़यामत के दिन कामीयाब हो। शैख़ तुसी. इख़तियारे मारेफतुर्रिजाल, जिल्द 1, पृष्ठ 211.
[3] हदाएक़ुनन्ज़रह, जिल्द8, पृष्ट512.
[4] शैख़ तुसी. इख़तियारे मारेफतुर्रिजाल, जिल्द 1, पृष्ठ 211.
[5] सूराः बक़रा, आयेत नम्बंर 111.
[6] सूराः नहल आयत नम्बंर 125.
[7] हमारे निकट इस का कोई प्रमाण नहीं है कि यह पूस्तक कितनी बार मुद्रित पाई हे. क्योकि विभिन्न प्रकार देशों में मुद्रित हूई हे। और इस पूस्तक का अनुवाद अरवी में आठ बार मुद्रित हूई हे।
[8] सही बुख़ारी, जिल्द 1, पृष्ठ 128, हदीस 328, किताबुत्तैयम्मुमः
جعلت لي الأرض مسجداً و طهوراً؛
सही मुसलिम, जिल्द 2, पृष्ठ 9, हदीस 5,
کتاب المساجد و مواضع الصلاة: جعلت لي الأرض مسجداً و طهوراً؛ و مسجداً؛
सोनने तिर्मेज़ी, जिल्द 2, पृष्ठ 131, अध्याय 36, हदीस 317,
ما جاء أن الارض کلها مسجد الا المقبرة والحمام؛
शैख सदूक़, मनला यहज़ीरीहुलफक़ीह, जिल्द 1, पृष्ठ 155, अध्याय 38, हदीस 1,
المواضع التی تجوز الصلاة فيها والمواضع التی لا يجوز فيها،
शैख हुर्रेआमली, वसाएलुश्शिया, जिल्द 2, पृष्ठ 969-970, अध्याय 7, हदीस 2, जवाज़ुजत्तैमुम बिततुराब....
[9] शराएउल इस्लाम, अल्लामह हिल्ली, जिल्द 1, बहैसे मुस्तहबे सिजदा.
[10] रसूले ख़ुदा (स.अ.) से रिवायत हैः कि मेरा नवासा हुसैन कर्बला नाम की सर ज़मीन पर दफ्न होगा, जो एक गुरुत्वपुर्ण ज़मीन का हिस्सा है (कुब्बतुल इस्लाम) (सिपहरे इस्लाम) कि ख़ुदा बन्दे आलम ने मोमेनीन को परित्राण दिलाया है जो लोग नूह (अः) के तुफान के साथ थें, इस सम्बन्ध में हज़रत इमाम बाक़िर (अ.स.) भी फ़रमाते हैः कि गाज़ेरिया (कर्बला का (अपर) दुसरा नाम है) ये एक ऐसी जगह है, कि जहां हज़रत मुसा इब्ने इमरान ने अल्लाह से बातें कीं, और नुह (अ.स.) ने अल्लाह से दूआ मांगी, और यह सिर ज़मीन अल्लाह के निकट एक मुल्यवान सर ज़मीन है, अगर ये ज़मीन ऐसी न होती तो खु़दा बन्दे आलम कभी भी इस सर ज़मीन पर अपने ओलिया की क़ब्र का स्थान क़रार न देता ( दो सौ पैग़म्बराने ईलाही और दो सौ पैग़म्बरों के जानशीन कर्बला में मदफून हैं) ल्हज़ा गाज़ेरिया (कर्बला) में हमारी क़बरों की ज़ियारत करो, ख़ुदा बन्दे आलम ने काबा को अपना घर बनाने से 24 हज़ार साल पहले कर्बला को एक शान्तिपुर्ण स्थान क़रार दिया था, और मुबारक नाम क़रार दिया था, ज़मीने कर्बला और फुरात का पानी यह प्रथम पानी और ज़मीन है कि ख़ुदा बन्दे आलम ने उस ज़मीन और पानी को पवित्र और मुक़द्दस क़रार दिया है।
इब्ने कौलवैह जाफर इब्ने मोहम्मद क़ुम्मी (र.अ.) कामिलुज़्ज़ियारात (मृतः 368 क़मरी) पृष्ठ 444, अध्याय 88 फज़िलते कर्रबला)।
अली इब्ने अबि असा भी फ़रमाते हैं (रासे जालुत अपने पिता से नक़्ल करते हैः वह जिस समय कर्बला पहुँचते थे तुरन्त कर्बला से निकल जाते थे. मै ने पुछाः क्यों आप कर्बला से तुरन्त निकल जाते हैं आप फरमाते हैं कि इस सर ज़मीन पर पैग़म्बर के नवासे हुसैन को क़त्ल किया जाएगा इस लिए मै इस जगह से निकल जाता हूँ कि कहीं मै भी क़त्ल न हो जाऊँ, जिस समय इमाम हुसैन (अ.स.) क़त्ल हुए हम ने कहा कि यह वही घटना है जिस को मैं उस समय कहा करता था।
हमारे पिता ने कहाः जिस समय वह उस कर्बला से गुज़रते थे तो आहिस्ता आहिस्ता क़दम रख़ते थे, (तारीख़े तबरी, जिल्द 5, पृष्ठ 393, घटना का साल 60 हिजरी, वाल कामेल फित्तारीख़, जिल्द 4, पृष्ठ 90 घटना का साल 61 हिजरी,)।
[11] मिस्बाहुलमुतहज्जिद में माविया (इमाम जाफरे सादिक़ (अः) के छत्र) से रिवायत है किः इमाम जाफर सादिक़ (अ.स.) के निकट हरे रगं का एक कपड़ा था आप इस कपडे़ में इमाम हुसैन (अ.स.) के क़ब्र की मिट्टी को रखते थे और जिस समय नमाज़ का समय होता था तो उस मिट्टी को जानमाज़ पर रख़ कर उस पर सजदह किया करते थे और कहते थेः
السجود علی تربة الحسين (ع) يخرق الحجب السبع؛
[12] कामिलुज़ ज़ियारात, पृष्ठ 274.
[13] आहले सुन्नत वल जमाअत के ज्ञानी व्यक्तियों ने, शिया सम्प्रदाय को इस तरह प्रसंसा क्या हैः कि शिया उन व्यक्तियों को कहा जाता है, जो फ़क़त व फ़क़त हज़रत अली (अ0) को, जिस पर ख़ुदा बन्दे अलम ने अपना राज़ी क़रार दिया है उस को (अली (अ0) पैरुवी करते है. चाहे वेह पैरुवी प्रकाट-प्रकाश के तौर पर क्यों ना-हो। और राज़ के तौर पर क्यों ना- हो। हज़रत अली (अ0) को अपने दिल व जान से पैरुवी करते है और उस के इमामत और ख़िलाफ़त को (नस) के बुनियादी पर या वसीयत के विनापर जानते है, या पैरुवी करते है। शिया हज़रत विश्वास रख़ते है कि एक मात्र इमामत का दायित्व उन के औलाद से मुनहसिर है. और अगर इमामत व ख़िलाफ़त उन के हाथ से बाहर हो जाए, विना शक व शुबह के यह दुश्मनी का एक प्रभाब और ज़ुल्म व सितम का एक प्रगंडा का प्रभाब है।
अपर तरफ़ वेह लोग यक़ीन रख़ते है कि तक़ैयाह पर भी इमान रख़ते है (( शहरस्थानी, अल मिलल वल नहल, जिल्द 1, पृष्ठ 146-147, अध्याय-परिच्छेद 6) ।
शीया सीग़ह का जमा (बहुवचन) (अशइया) है. जो एक शख़्छ या एक व्यक्ति या एक कौम को कहा जाता हे। लेकिन सदरे इस्लाम में एक मात्र शीया शब्दार्थ हज़रत अली (अ0) के पैरुकार या उन के ख़ादांन वालों के लिए मख़सूस हूआ है. शीया (عامه) के बराबर में (साधारण) या (ख़छ्छा) विशेष कहा जाता है. (ख़छ्छा) शब्दार्त यह हे कि अपने निकट वाली रिश्तेदार को कहा जाता हे अज़ बावे (तग़्लीब) अली (अ0) के चाहने वालों को कहा जाता हे और शीया श्ब्दार्थ बहूत क़दीम व पुराना है।
मरहुम ( शैख़ मोहम्मद हुसैन काशीफ़ुल ग़ीता) फ़रमाते है ( शीया सब्दार्थ सदरे इस्लाम से लेकर आज के यूग तक बराबर चलते हूए आरहा है. और इसका प्रमाण यह हे कि अहले सुन्नत और उन के पेशवा ने परस्पर और धरावाहिक के साथ व मुतावतीर रिवायत के वासिता के माध्यम नक़्ल क्या है जिस में किसी प्रकार का कोई शक संदेह नहीं है और ना है। उधारण के तौर पर सियूती (राः) अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ में इस आयत के विबरण (اولئک هم الخيرالبرية) में प्रकाश क्या है किः (वह सब उत्तम और अल्लाह के श्रेष्ठ मख़लुक़ है) सुरा बैआना, आयेत नम्बंर 7) की ब्यख्या में लाया है कि , वह फ़रमाते है ( इब्ने असाकीर) जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह से नक़्ल किया है कि. मै पैग़म्बरे अकरम (सा0) के निकट बैठा हूआ था इत्तेफक़ से हज़रत अली (अ0) ने प्रवेश क्या. आपने फ़रमायाः अल्लाह का शफ़थ देकर कहता हूँ जिस के हाथ में हमारी जान है उस की क़सम (यह व्यक्ति अली) और उसके पैरुकार क़्यामत के दिन कामियाब होगें)) इस फ़र्मान के बाद एक आयेत नाज़िल हूई (अद दुर्रुल मंसूर फ़ि तफ़्सीरे किताबुल्लाह हिल मंसूर)।
(इब्ने हिशाम) बयान करते है किः अरब क़ौम या मुसल्मान सक़ीफा के दिन से दो प्रकार भाग में विभक्त हो गए. एक शीया अपर सुन्नी.... (मोहम्मद अबु ज़हरह) इस सम्पर्क फ़रमाते है किः शीया एक क़दीम सम्प्रदाय और राज़नैतिक दल है जो उसमानी ( ख़िलाफ़त) के आख़री यूग में ज़हूर हूआ है और हज़रत अली (अ0) के ख़िलाफ़त के यूग में अधिक से अधिक उन्नती लाभ क्या है. चुकिं इस उन्नती की कारण यह है कि जैसे जैसे हज़रत अली (अ0) जनता के साथ सम्पर्क गंभीरता के साथ करने जाते थे उसी तरह अपके दोस्त और दीन्दार और (आपके ज्ञानों में से लोग ज्ञान लेते थे) ज़्यादा होता जाता था ( तारीख़ेल मज़ाहिबुल इस्लामिया)।
(इब्ने अबिल हदीद) स्वींय ग्रन्थ तफ़्सीरे शरहे नहज़ुल बलाग़ह में लाया है किः ( एक शिया व्यक्ति को मुविया की हुकूमत में तर्ज़ीह देता था कि ( किताब) ( यहूदी व मसीही व.....) पढ़हा जाएं, लेकिन शिया के उनवान से नहीं और ना शिया का नाम लिया जाए क्योंकि शिया का मुशख़्खछ और आहले बैत (अ0) के फज़ाएल और उन के ज्ञानों से बिदअत सृष्टि करने वाला उन के पबित्र जीवन और सदाचार आख़लाक़ से बिदअत से दूरी रहेगा, क्योंकि पाक पबित्र वह लोग है जो उन के पबित्र और नेक आख़लाक़ से अपने जीवन को आरास्ता क्या है) शैख़ मोहम्मद ख़लिलुज़ जैन, तारीख़ुल फ़ेर्कुल इस्लामिया. पृष्ठ 108-109)
सुन्नत (नुन) के साथ तश्दीद इस का अर्थ यह है कि नियम-क़ानुन- पद्धति- रवीश और तरीक़ा को भी कहा जाता है। लेकिन अपर सम्प्रदाय के निकट अपर माना पहचाना गया है. लेकिन फ़िक्ह व हदीस शास्त्र के निकट, पैग़म्बरे अकरम (सा0) के क़ौल, फेल, अमल, आदेश, निर्देश को कहा जाता है, लेकिन शेष यूग में अर्थात ( सदरे इस्लाम के बाद) सुन्नत शीया के बराबर में कहा जाता हे या क़रार दिया गया है। अहले सुन्न्त वाल जमाअत, (ख़ासान) के मुक़ाविल में ऊर्फ़े आम्मे मक्तब (इब्ने तैमिया) हम्बंली सम्प्रदाय के नेता (हम्बंलीहा) सुन्नत) अर्थात अली और उसमान के दोस्त को कहा जाता है और उमर व अबुबक्र को अधिक सत्य व अधिकार दिया जाता है।
विभिन्न मुस्लमान सम्प्रदाय होने के कारण कुछ मुस्लमान यह यक़ीन रख़ते है किः (सुन्नी) उन हज़रात को कहा जाता है कि (शैख़ैन) (अबुबक्र व उमर) को मुहब्बत करने वाले को कहा जाता है। और वेह दोनो व्यक्तियों को पैरुवी करते है और यह (भी) कहा जाता है किः (सुन्नत अबुबक्र व उमर के लिए) है, तारीखुल फ़ेरक़ुल इस्लामीया, पृष्ठ 44 – 45।
[14] सूराः हज, (22) 32.
[15] सूरए हज, (22) 32.
[16] सूरए हज, (22) 32.
[17] सूरा इस्रा अयेत नम्बंर 26-27.
[18] इब्ने ख़ल्लदून, अब्दुर रहमान इब्ने ख़ल्लदून हज़रमी, 723 क़मरी. तुनीस का है दर हक़ीक़त वे (अशबिलिये) (सिवल) (इसफ़ानियाह है) (इब्ने ख़तीब) अपनी किताब (अल इहाता फ़ि अख़बार गरनाता) वे इस तरह के परिचय है कि (वे इब्ने ख़ल्लदून) वे मग़रीब देश से समंधं रख़ता है (बूर्रदह) को इस तरह विबरण के साथ विबरण दिया है किः वे एक मुख़स्त और हाफ़ीज़ याद किया है. अधिक से अधिक किताबें (इब्ने रशीद) को सार के तौर पर लिख़ा है और उस लाभ व फ़ायदामन्द वाली (सुलतान अबु सालिम) किताब पर विबेक और दर्शन..... प्रसगं) लिख़ा है. 808 क़मरी. मिस्र देश में मृत हूआ. उस की प्रसिद्ध किताबों में से एक किताब (तारीख़े इब्ने ख़ल्लदून) है (तारीख़े इब्ने ख़ल्लदून, जिल्द 1, पृष्ठ 353, और (दारुल अहया इत तुरासुल आरबी की पक्ष से लुबनन बेरुत में छपी है)
[19] ये किताब, प्रथम जिल्द में उस की प्रसंसा और विभिन्न प्रकार छे 6 अध्यय है कि जिस में से प्रथम अध्यय में जगंल नशीन के किर्दार, और उस के गुफ़तार और जयी और प्रसंसा समंधं लिख़ा है.
[20] तारीख़े इब्ने ख़ल्लदून, जिल्द 1, पृष्ठ 353, प्रथम किताब अध्यय 6, बाबे चहारुम, अलमसाजिद वल बुयूतुल अज़ीमा फ़िल आलीम.
[21] सूरा हज, आयेत नम्बंर 32।
[22] मिलल व नहल, अपर मुस्लमान सम्प्रदायः हसन इब्ने मूसा नौ बख़्ति (3 म हिज़री) फेरके शिया, अली इब्ने अहम्मद, प्रसिद्ध नाम ( इब्ने हिज़म जाहैरी) (जन्म456 क़मरी)
الفضل في الملل والأهواء والنحل؛
अब्दुल करीम शहरिस्तानी (जन्म 548 क़मरी) الملل والنحل، मोहम्मद ख़लीलुज़ ज़ैन तारीख़ुल फ़िरक़ अल इस्लामिया.
[23] इमाम (अः) के पबित्र नाम इस तर्तीब के साथ, अली इब्ने अबि तालिब, रसूले ख़ुदा के नवासे और बहिश्त के नेता व सर्दार, हसन व हुसैन (अः). हज़रत अली (अः) के सन्तान और उनके नो फ़रज़न्द इमाम हुसैन (अः) अल्लाह के दरुद और सलाम हो उन लोगों पर, मुतावातिर रिवायत के साथ, इमाम (अः) के ख़ानदान क़ुरैश ख़ानदान से है। जो तर्तिब के साथ आहले बैत (आ0) के पबित्र नाम उल्लेख़ किया जारहा है.
1-हज़रत अमीरुल मोमेंनीन अली इब्ने अबि तालिब (आ0).
2- इमाम हसने मुज्तबा (आ0).
3- इमाम हुसैन शहीदे कर्बला (आ0).
4- इमाम ज़ैनूल अबेद्बीन (आ0).
5- इमाम बाक़िर हज़रत मोहम्मद इब्ने अली (आ0).
6- इमाम सादीक़ हज़रत जाफर इब्ने मोहम्मद (आ0).
7- इमाम काज़िम हज़रत मूसा इब्ने जाफर (आ0).
8- इमाम रिज़ा हज़रत अली इब्ने मुसा (आ0).
9- इमाम जवांद हज़रत मोहम्मद इब्ने अली (आ0).
10- इमाम हादी हज़रत अली इब्ने मोहम्मद (आ0).
11- इमाम असकरी हज़रत हसन इब्ने अली (आ0).
12- इमाम महदि आख़ेरुज़ ज़मान (आ0)
12- इमाम ज़माना हज़रत मेहदी हुज्जत इब्नुल हसन (अज्जलाललाहू ताला फराजहुश शरीफ आ0)
[24] सही बुख़ारी, जिल्द1, पृष्ठ 3, हदीस 1, बाब 1,
کتاب ( بدء الوحي الی رسول الله ص)
फख़रे राज़ी, तफ़सेरुल कबीर, जिल्द 4, पृष्ठ 5, सूरा बक़्ररा की 112 नम्बंर आयात की तफ़सीर, तह्ज़ीबुल अह्काम, जिल्द 1, पृष्ठ 83, बाब 4, हदीस 67,
کتاب الطهاره، اوصاف الوضوء
तह्ज़ीबुल अह्काम जिल्द 4, पृष्ठ 184, बाब 44, हदीस 1.
[25] कशफ़ुल इर्तियाब, सफेह 139, (ख़ुलासतुल कलाम के नक़्ल से सफेह 230)।
[26] सूराः क़ाफ़, आयात नम्बंर 22.
[27] सूराः बक़रा आयात नम्बंर 154.
[28] सूराः आले इमरान आयात नम्बंर 169.
[29] अबु अब्दिल्लाह, मुहम्मद इब्ने इस्माईल बुख़ारी जाफी, सही बुख़ारी जिल्द 1, सफेह 462, परिच्छेद 85, हदीस 1304, किताबुल जनाएज़, मबहसे आज़ाबे क़ब्र, और इस रिवायत को भी इस तरह नक़्ल क्या हैः पैग़म्बरे अकरम (साः) किनारे क़लीबे बद्र में गुज़र कर मुशरीकिन सिपाही क़त्लों से फ़रमायाः ख़ुदा बन्दे मुताल ने जो तुम से वादा क्या था सच पाए हो१ अपके साथीयों ने कहाँ, अप मृत व्यक्तियों से कथा कह रहे है१ पैग़म्बरे अकरम (साः) ने फ़रमायाः तुम लोग ऊन लोगों से अधिक सुन्ने वाले नहीं हो। लेकिन वह लोग जवाब प्रदान करने का शक्ति नहीं रख़ते।
[30] अबु हामीद, मुहम्मद इब्ने मुहम्मद ग़ज़ली, आहयाऊल उलूम, जिल्द 4, सफेह 493, परिच्छेद 7, अध्याय वयाने हक़ीक़ते मर्ग।
[31] अबु हामीद, मुहम्मद इब्ने मुहम्मद ग़ज़ली, आहयाउल उलूम, जिल्द 4, सफेह 493, परिच्छेद 7, अध्याय वयाने हक़ीकते मर्ग।
[32] सही बुख़ारी जिल्द 1, सफेह 462, परिच्छेद 85, हदीस 1304, किताबुल जनाएज़, मबहसे आज़ाबे क़ब्र,
[33] कशफ़ुल इर्रतियाब, सफेह 139.
[34] ऊन व्यक्तियों को साहाबा कहा जाता है जो व्यक्ति पैग़म्बरे अकरम (साः) को इमानी अबस्था में ऊन को दर्शन किए हो, और मुस्लमान अबस्था में पृथ्वी से परीत्याग किए है, अगरचे जीवित अबस्था में पैग़म्बरे अकरम (साः) को इमानी अबस्था में दर्शन किए हो. और मृत अबस्था में मुर्ताद क्यों न हो।
(ر.ک: الرعاية في علم الدراية،) सफेह 339.
[35] बिहक़ी, सुननुल कुर्बा, इब्ने अबी शैबा, अल मुसन्नीफ़, जिल्द 7, सफेह 481, छाप ख़ाना दारुल फ़िक्र, बैरुत 1409 क़म्री, व आहमद इब्ने जैनी दैहलान, सिरा.
[36] अद्दर्रुस सनियाह् , सफेह 18, يا رسول الله، استسق الأمتک فانهم هلکوا.
[37] समहूदी, ख़ुलासातुल कलाम, सफेह 17, (मिस्र से छपी है 1305) और तबरानी. अलमुजमुल कबीर, जिल्द 9, सफेह 18.
[38] वह मालिक इब्ने अनस इब्ने मालिक इब्ने गैमान इब्ने ख़सील इब्ने उमर था.
[39] सूराः निसाः आयत नम्बर 64.
[40] सुनने दार्मी, जिल्द 1, सफेह 43-44, परिच्छेद.
ما أکرم الله تعالي بنبيه بعد موته.
[41] ज़ुख़रुफ़ आयत नम्बंर 23.
[42] सही अल बुख़ारी, 1,3,1, बाब1, तफ़सीरे कबीर. फख़रे राज़ि. जिल्द 4, पृष्ठ 5,
[43] सही मुसलिम, जिल्द2, पृष्ठ 63 और सोन्ने निसाई. जिल्द 3, पृष्ठ 74.
[44] सोन्ने इब्ने माजा, जिल्द 1, पृष्ठ 500, बाब 4, हदीस 1569, आहयाए उलूमुद्दीन, जिल्द 4, पृष्ठ 490.
[45] सोन्ने इब्ने माजा, जिल्द 1, पृष्ठ 501, बाब 48, हदीस 1572,
ما جاء فی زيارة قبور المشرکين
और उस स्थान पर ये रिवायत भी नक़्ल हुई है, क़बरबासीयों को प्रदर्शन करो क्योंकि इस चीज़ में तुम को आख़ेरत याद आएगी.
[46] सोन्न इब्ने माजा, जिल्द 1, पृष्ठ 494, बाब 36, हदीस 1574,
ما جاء فيما يقال اذا دخل المقابر؛
सही मुसलिम, जिल्द 2, पृष्ठ 365, बाब 35, हदीस 104,
ما يقال عند دخول القبور والدعاء الى اهلها
व मुन्तख़ाब कन्जुल ऊमाल (हाशिया मुस्नदे आहमद, जिल्द 2, पृष्ठ 89)
[47] दारे क़ुतनि सुनन. जिल्द 2, पृष्ठ 278, हदीस 194, बाबुल मवाक़ित अद्यय में रिवायत हुआ हैः और वे इस सूरत में आया है किः من زار قبري وجبت له شفاعتي अगर कोई व्याक्ति मेरी क़ब्र की ज़ियारत करे उस व्याक्ति के लिऐ मेरी शफ़ाअत वाजिब है। आहयाऊल उलूम , जिल्द 4, पृष्ठ 490-491, में बयाने जियारते –ए क़बर और मृत व्याक्ति के लिए दोआ, (हूबहू इस रिवायत-ए क़ुतनि को लाया है) आहमद इब्ने हुसैन बिहक़ि, सोन्ने अल क़ुबरा, जिल्द 5, पृष्ठ 254, पैग़म्पर अकरम (साः) से ज़ियारते –ए क़बर सम्पर्क इस तरह आया हैः
(( من زار قبري)) أو قال: من زارنی کنت له شفيعاً
जो व्याक्ति मेरी क़ब्र की ज़ियारत करे उस को शफाअत करुऊगां.
[48] आयहाउल उलूम, जिल्द 4, पृष्ठ 491, बयाने ज़ियारते क़बर और मृत व्याक्ति के लिए दोआ, मुन्तख़ाबे कन्ज़ुल उमाल (पावरक़ि मुसन्दे आहमद, जिल्द 2, पृष्ठ 392, में इस तरह आया हैः شهيداً و شفيعاً उसके लिए ग्वाह व शफीय हूगां.
[49] कन्ज़ुल उम्माल ( पावरक़ि मुस्नदे आहमद, जिल्द 2, पृष्ठ 392) इस ईबारत के साथ आया है,
(( من حج البيت)) अगर कोई व्याक्ति अल्लाह के घर की ज़ियारत के लिए जाए......))
[50] कन्ड़ुल उम्माल ( पावरक़ि मुस्नदे आहमद, जिल्द 2, पृष्ठ 392)
[51] कन्ड़ुल उम्माल ( पावरक़ि मुस्नदे आहमद, जिल्द 2, पृष्ठ 392) इस ईबारत के साथ आया हे,
(( من حج البيت)) अगर कोई व्याक्ति अल्लाह के घर को ज़ियारत के लिए जाए......))
[52] कन्ड़ुल ऊमाल ( पावरक़ि मुस्नदे आहमद, जिल्द 2, पृष्ठ 392) इस ईबारत के साथ आया हे,
(( من حج البيت)) अगर कोई व्याक्ति अल्लाह के घर को ज़ियारत के लिए जाए......))
[53] आहयाऊल उलूम , जिल्द 4, पृष्ठ 490-491, में बयाने जियारते –ए क़बर और मृत व्याक्ति के लिए दोआ,
[54] आहयाए-उलुमुद्दीन, जिल्द 4, पृष्ठ 490.
[55] सुनाने इब्ने माजा, जिल्द 1, पृष्ठ 500, बाब 47, हदीस 1569,
[56] वाए (मोहम्मद इब्ने इसमाईल) है (हफ़िज़ी अक़ली फरमाते हैः जिस समय बुख़ारी अपनि किताब (सही) को लिख़ा उस किताब को (अहमद इब्ने हम्बल) और ((याहया इब्ने मुईयान )) व अली इब्नेनुल मदीनि और अन्य व्यक्तियों के निकट प्रदान किया सब कि सब ऊन तमाम प्रकार हदीसों को प्रसंसा कि चार रिवायत व्यातीत समस्त हदीसों को सठिक क़रार दिया।
(( निसाई)) बुख़ारी के पुस्तक सम्पर्क फ़रमाते हैः उपस्थीथ किताबों के दर्मियान मोहम्मद इब्ने इसमाईल बुख़ारी की जैसि कोई किताब (उपसतीथ नहीं है) पाई नहीं जाती। ((हाकिमे निशापूरी)) फ़रमाते हैः अल्लाह रब्बुल आलमीन इसमाईल इब्ने बुख़ारी पर रहमत करे, क्योंकि वे समस्त प्रकार उसूले हदीस को जमा किया और दूसरों के लिए एक मुस्तहकम पाया (बुनयाद-ख़ुटी) क़रार दिया है. उस के बाद अगर कोई व्यक्ति काम-कार्य करना चाहे यक़ीनि तौर पर वे सही बुख़ारी से लाभ व फायदा अर्जन किया है।
[57] वाए (मुसलिम बिन हिजाज कैशरी) हो (हाफ़ीज़, अबु अली निशापूरी ने सही मुसलिम सम्पर्क में फ़रमाया हैः बिस्तृत व फ़ैला हुआ आकाश के नीचे मुसलिम इब्ने हिजाज जैसी सठिक और सही किताब इल्मे उसूल में उपस्तीथ नहीं है.
[58] वाए ( आहमद इब्ने शुएब निसाई) हो (इब्ने रशीद फहरी) निसाई की किताब सम्बधं में फ़रमाया हैः किताबे निसाई एक ऐसि सही किताब है कि (सोनन) एक मुस्तहकम और बहतरीन तालीफ़ किया है. वे दो तरीके से इस किताब को जमा किया है जिस में से (अल इलाल) किताब को अधिक से अधिक व्याबहार किया है.
[59] मुतआ हज अर्थात हाजी व्यक्ति अपने उमरा तमत्तु अंजाम देने के बाद.. अपने अहराम को उतार देते है, ताकि दो बार हज्जे तमत्तु के लिए अहराम बांधे, और उन व्यक्ति के लिए मुमकिन है कि जो चीज़ अहराम की अबस्था में निषेध घोषित थी. उस का व्यबहार करें।
[60] जाहिज़, अल बयान वात्ताबिईन, जिल्द 2, पृष्ठ 223, तफ़सीरे क़ुर्तुवी, जिल्द 2, पृष्ट 390-391. हदीस 1042, अलमबसुत. किताबे हज, अध्याय क़िरान, फख़रे राज़ि, तफ़सीरुल कबीर, जिल्द,2 पृष्ठ 167 व जिल्द 3, पृष्ठ 201-202
[61] तारीख़े इब्ने ख़ुल्लाकान, जिल्द2, पृष्ठ 359.
[62] قال رسول الله (ص) (( حلال محمد حلال إلِي يوم القيامة، و حرامه حرام إلی يوم القيامة))
सुनने इब्ने दाऊद सज़स्तानी, जिल्द1, पृष्ठ 6, अध्यय 2, हदीस 12,
تعظيم حديث رسول اله والتغليظ علی من عارضه،
उसूले काफ़ी, जिल्द 1, पृष्ट 5, हदीस 19, व वसाएलुश शिया, जिल्द 18, पृष्ठ 124, अध्यय 12, हदीस 47.
[63] सूराः निसा, आयेत नम्बंर 24.
[64] अलग़दीर, जिल्द 6, पृष्ठ 226-229.
[65] आज के यूग में पृथ्वी पर तक़रीबन मुस्लमान दो मिलयार्द से अधिक है, जिस में से अधिक से कम शिया हैं (अनवारुस साआदत) मिस्र देश के प्रधान मंत्री, क़ाहिरा में एक कान्फ्रन्स में व्यक्त किया था किः गिनतीके मुताबिक़, शिया हज़रत पृथ्वी के अधे मुसलमानों में से है.
[65] विहारुल अनवार, जिल्द10, पृष्ठ 111, हदीस 1.
[67] मुस्नद इब्ने हम्बंल, जिल्द 3, पृष्ठ 17, 26 व 59,जिल्द 4, पृष्ठ 367.
[68] मोहम्मद इब्ने मुल्सिम इमाम मोहम्मद बाक़िर (अ0) व जाबिर इब्ने अब्दुल्लाह नक़्ल करते है कि- मुस्लमान हज़रत रसूल (साः) के साथ यूद्ध में गए और रसूले ख़ुदा (साः) (अबसार विबाह ) को उन व्यक्तियों के लिये मुताअ को शुद्ध क़रार दिया और उस को हराम क़रार नहीं दिया, हज़रत अली (अ0) फ़रमाते हैः (अगर ख़त्ताब के पूत्र (उम्र) हम से हूकुमत लेने में सब्क़त न करता अत्वाचारी व्यक्ति व्यतीत कोई ज़िना न करता, (बिहारुल अनवार, जिल्द 100, पृष्ठ 314 अध्यय 10, हदीस 15, तफ़्सीरे मजमअऊल बयान जिल्द5, पृष्ठ 9, सही सम्द के साथ।
[69] सुराः मायेदा आयात नम्बंर 87..... .
ولا تحرموا طيبات ما احل الله لکم
[70] मुस्नदे आहमद, जिल्द2, पृष्ठ 95.
[71] अल मुहाज़िरात, जिल्द2, पृष्ठ 94.
[72] सही मुस्लि1म. जिल्द 3, पृष्ठ 197-198 अध्यय 3, निकाहूल मुतअ, सुननुल कुब्रा, जिल्द 7, पृष्ठ 205. अध्यय निकाहल मुतअ.
[73] फत्हूल बारी, जिल्द 9. पृष्ठ 141.
[74] मजल्लह, (अल मनीर) शुमार 8, शवाल 1421 क़मरी.
[75] ........قد قال رسول الله (ص) أنت منی بمنزلة هارون من موسی إلا أنه لا نبی بعدی.و
उसूले काफ़ी, जिल्द 8, पृष्ठ 106. और अधिक से अधिक प्रमाण व मसादिर शिआ और सुन्नी के प्रसिद्ध ग्रन्थों से है (या उपस्थित है)।
[76] मजल्लाह अल (मनीर) शुमार 22, जिल हिज्जह 1422 क़मरी.
[77] शुमार 10, 1421 क़मरी जिलहज.
[78] शुमार , ज़िलहिज्जह 1421 क़मरी.
[79] शुमार 7, माहे रम्ज़ानुल मुबारक क़मरी.
[80] मुमकिन है इन का इशाराह (सुम्मा तदह तो) लिखने वाला मोहम्मद समावी तीजानि, कि स्वींय किताब में शिया होने के कारण बयान किया है.
[81] शुमारह 11, 1422 क़मरी.